आंदोलनजीवी शब्द आखिर आया कहाँ से और यह किसी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज़ में कैसे दर्ज हो गया? यह तीखा सवाल किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस पीठ ने उठाया है जो पत्रकार सत्यम वर्मा पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) की वैधता परख रही है। मामला अप्रैल 2026 में नोएडा के मज़दूर आंदोलन से जुड़ा है, जहाँ न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर 8 अप्रैल से शुरू हुआ प्रदर्शन 13 अप्रैल तक आते-आते पथराव और हिंसा में बदल गया। इसके चार दिन बाद 17 अप्रैल को यूपी पुलिस ने हिंसा भड़काने के आरोप में पत्रकार सत्यम वर्मा को गिरफ्तार किया और फिर 12 मई को गौतमबुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी मेधा रूपम ने उन पर रासुका (NSA) तामील कर दिया। डीएम मेधा रूपम खुद चर्चा के केंद्र में हैं। एक तरफ पत्रकार पर सख्त कार्रवाई को लेकर, तो दूसरी तरफ उनकी पहचान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के रूप में भी है, जो पहले से ही चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं। जब सत्यम की हिरासत को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ में चुनौती दी गई, तो 8 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखते हुए अदालत ने सीधे प्रशासन की मंशा और शब्दावली पर ही सवाल दाग दिए।
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यह दूसरी बार है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट एक ही मामले में मेधा रूपम को जबरदस्त फटकार लगा चुका है। इससे पहले 2 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने अकृति चौधरी की हिरासत को रद्द कर दिया था और उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश भी दिया था। हालांकि मुआवजा राशी को लेकर मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से राहत भी मिल गई थी। लेकिन वर्तमान मामले में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। आपको बता दें यह मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूर के प्रदर्शन और उससे जुड़ी हिंसा के बाद पत्रकार सत्यम वर्मा को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में ले जाने से संबंधित है। जहां गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने 12 मई 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3 2 और 33 के तहत वर्मा की निवारक हिरासत का आदेश जारी किया था। आकृति चौधरी को रिहाई दिए जाने के बाद सत्यम वर्मा ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपनी याचिका में उन्होंने हिरासत आदेश के अलावा राज्य सरकार के 20 मई के अनुमोदन आदेश और 10 जून के पुष्टि आदेश को भी चुनौती दी है। उन्होंने इन आदेशों को रद्द करने और तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की भी मांग की है। सत्यम वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजालविस ने दलील दी कि हिरासत के आधार पर उनकी राजनीतिक विचारधारा आरडब्ल्यूपीआई से कथित संबंधों और साहित्य पढ़ने लिखने, अनुवाद करने और प्रकाशित करने जैसी गतिविधियों को अपराध की तरह पेश करते हैं। जिसको लेकर सत्यम वर्मा ने भी गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने खुद कहा कि किसी व्यक्ति का राजनीतिक विचार रखना, अकादमिक साहित्य पढ़ना, पत्रकारिता करना या किसी संगठन से वैचारिक जुड़ाव होना अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं है और ना यह हो सकता है। इधर सत्यम वर्मा की याचिका में एक गंभीर आरोप यह भी लगाया गया है कि 12 मई को जारी हिरासत के आधार 14 अप्रैल 2026 को द क्रोनोलॉजी नाम के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रकाशित एक पोस्ट का सीधा बिना सत्यापन के पेश किया गया था। वर्मा की याचिका के मुताबिक इस पोस्ट का शीर्षक था रेवोलशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी कि आरडब्ल्यूपीआई ए मल्टीफ्रंट एजिटेशन सिंडिकेट इनसाइड स्टोरी ऑफ़ नोएडा वायलेंस।
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सत्यम की तत्काल रिहाई की मांग
याचिका में हिरासत आदेश और उसके परिणामस्वरूप पारित आदेशों को रद्द करने के साथ-साथ सत्यम वर्मा की तत्काल रिहाई तथा कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की गई है। याचिका का मुख्य आधार यह है कि हिरासत आदेश इस तथ्यात्मक रूप से असंभव धारणा पर आधारित था कि सत्यम वर्मा 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हिंसा में शामिल थे। याचिका के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से पता चलता है कि वर्मा उस दिन लगभग 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में थे, जहां उन्हें उसी दिन दोपहर 2:14 बजे हसनगंज पुलिस ने कथित तौर पर हिरासत में लिया था।
पीठ ने पूछा सवाल
पीठ ने सवाल किया कि इस प्रकार की शब्दावली आधिकारिक सरकारी हिरातस दस्तवेज में कैसे आई। साथ ही, एनएसए के तहत हिरासत के आधारों को लेकर अलग से उल्लेख किया गया। बेंच ने सवाल किया कि केवल एक विशेष विचारधारा को धारण करना या साहित्य रखना निवारक हिरासत का आधार कैसे बन सकता है।
आंदोलनजीवि शब्द आया कहां से?
8 फरवरी 2021 की बात है। देश के पीएम नरेंद्र मोदी राज्यसभा में खड़े थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए। पीएम मोदी ने उस दिन कहा हम लोग कुछ शब्दों से परिचित हैं। श्रमजीवी, बुद्धिजीवी यह सारे शब्द से हम सब परिचित हैं। लेकिन मैं देख रहा हूं कि पिछले कुछ समय से देश में एक नई जमात पैदा हुई है। एक नई बिरादरी सामने आई है और वो है आंदोलनजीवी। ये जमात आप देखेंगे। वकीलों का आंदोलन है। वहां नजर आएंगे। स्टूडेंट्स का आंदोलन है। वहां नजर आएंगे। मजदूरों का आंदोलन है। वो वहां नजर आएंगे। कभी पर्दे के पीछे तो कभी पर्दे के आगे। यह पूरी टोली है जो आंदोलनजीवी है। यह आंदोलन के बिना जी नहीं सकते हैं और आंदोलन से जीने के लिए जीने के रास्ते ढूंढते रहते हैं। नरेंद्र मोदी देश की संसद में जब यह बयान दे रहे थे तब दिल्ली की सीमाओं पर किसान बैठे हुए थे। केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ धरना चल रहा था। पीएम ने इस बयान के करीब 8 महीने बाद खुद ही तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया था और किसानों से आंदोलन खत्म करने की अपील की थी। इस संदर्भ के साथ पहली बार देश की संसद में नरेंद्र मोदी ने आंदोलनजीवी शब्द उछाला।

