नालंदा के चर्चित बच्चा गायब और अवैध तरीके से छिपाने, बेचने के गंभीर मामले में पटना उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने मामले की लीपापोती करने, एफआईआर दर्ज करने में जानबूझकर डेढ़ महीने की देरी करने और जांच में घोर लापरवाही बरतने के मामले में अब तक तैनात रहे सभी पुलिस अधिकारियों पर शिकंजा कस दिया है। वकील राजीव कुमार सक्सेना के अनुसार, उच्च न्यायालय ने नालंदा पुलिस अधीक्षक को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मामले की जांच से जुड़े पूर्व के तमाम आईओ, तत्कालीन एसएचओ और विशेष जांच दल के सभी सदस्यों से गहन पूछताछ की जाए। अदालत के निर्देशानुसार, इन पुलिस अधिकारियों की मौजूदा पोस्टिंग चाहे बिहार के किसी भी जिले अथवा थाने में हो, उन्हें हाईकोर्ट के आदेश से पत्र भेजकर नालंदा बुलवाया जाएगा, जहां एसपी स्वयं उनके बयान दर्ज कर जवाब-तलब करेंगे। बिना केस डायरी वीसी पर जुड़े एसपी, अदालत ने लगाई कड़ी फटकार मामले की सुनवाई के दौरान नालंदा एसपी हृदयकांत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश हुए। हालांकि, जब कोर्ट ने उनसे केस डायरी प्रस्तुत करने को कहा, तो उनके पास डायरी उपलब्ध नहीं थी। इस पर माननीय न्यायाधीश ने अत्यधिक नाराजगी जाहिर की और एसपी को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि यदि ऐसी लापरवाही दोबारा सामने आई तो उन्हें अदालत के समक्ष सशरीर हाजिर कर कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा। अदालत के समक्ष नालंदा एसपी ने लापता बच्चे की बरामदगी को लेकर अतिरिक्त समय की मांग की। एसपी ने अदालत को आश्वस्त किया कि पुलिस ने अपने गुप्तचरों को सक्रिय कर रखा है और बच्चे को जल्द से जल्द सुरक्षित बरामद करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। डेढ़ महीने तक एफआईआर दर्ज न करने पर तल्ख टिप्पणी हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरा क्षोभ प्रकट किया कि पीड़ित पक्ष की गुहार के बावजूद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने में करीब एक से डेढ़ महीने की आपराधिक देरी क्यों की। अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि कानून के रक्षकों द्वारा इस तरह की लापरवाही या मिलीभगत को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि इस मामले में ऐसी ठोस व नजीर पेश करने वाली कार्रवाई की जाएगी, जो पूरे समाज और पुलिस महकमे के लिए एक कड़ा संदेश बने। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि इसी तरह के बच्चों की खरीद-फरोख्त या गुमशुदगी से जुड़े अन्य मामले भी प्रकाश में आए हैं, तो उन सभी को एक साथ जोड़कर कानूनी नजीर स्थापित की जाएगी। 30-35 लाख और दो कट्ठा जमीन देकर केस मैनेज करने का खुलासा, धमकी की बात सही पाई गई चर्चित बच्चा गायब कांड में अदालत की सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज खुलासा सामने आया है। आरोपित चिकित्सक और उसके गुर्गों द्वारा कानूनी शिकंजे से बचने के लिए पीड़ित परिवार पर केस वापस लेने का लगातार आपराधिक दबाव बनाया जा रहा था। मामले की सुनवाई के दौरान नालंदा के पुलिस अधीक्षक ने माननीय न्यायालय के समक्ष आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि पीड़ित को धमकाने और भारी-भरकम रकम देकर मामले को दबाने के आरोप जांच में पूरी तरह सत्य पाए गए हैं। पुलिस को दिए गए फर्दबयान में राजगीर थाना क्षेत्र के डुमरी निवासी पीड़ित अविनाश कुमार ने पूरे षड्यंत्र का सिलसिलेवार ब्योरा दर्ज कराया है। पीड़ित के मुताबिक, मामले को दबाने का पहला प्रयास इसी वर्ष जनवरी-फरवरी माह में किया गया था, जब सिलाव थाना क्षेत्र अंतर्गत सैदपुर निवासी सुटील यादव उनके खेत पर पहुंचा। उस समय अविनाश अपने खेत में गेहूं की सिंचाई कर रहे थे। सुटील ने इसे ‘छोटा-मोटा मामला’ बताते हुए डॉक्टर यादव के पक्ष में कुछ ले-देकर सुलह करने का दबाव बनाया। हालांकि, पीड़ित पिता ने किसी भी प्रकार का आर्थिक प्रलोभन ठुकराते हुए साफ कह दिया कि उन्हें पैसे नहीं, सिर्फ अपना बच्चा सुरक्षित वापस चाहिए। इसके कुछ समय बाद मामले में समझौते के नाम पर खुली धमकी देने का दूसरा दौर शुरू हुआ। नुरसराय थाना क्षेत्र के पपरनौसा निवासी और वर्तमान में सिलाव बड़ी मस्जिद के पास रहने वाला योगेश गोप उर्फ मास्टर उर्फ जुगेश सीधे पीड़ित के घर आ धमका। उसने डॉक्टर की तरफ से दो कट्ठा जमीन के साथ-साथ 30 से 35 लाख रुपये नकद देने की खुली पेशकश रखी और केस मैनेज करने को कहा। जब पीड़ित ने झुकने से इनकार किया, तो उसने सीधे तौर पर जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि यदि बात नहीं मानी तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे और मुख्य वादी को ही खत्म कर दिया जाएगा ताकि कोई पैरवी करने वाला न बचे। अदालत में इन तथ्यों के प्रमाणित होने के बाद अब आरोपितों के खिलाफ कानूनी शिकंजा और अधिक कस गया है। एसपी ने कोर्ट को सूचित किया कि गवाहों और वादी को धमकाने के इस मामले में 23 सितंबर को राजगीर थाना में कांड संख्या 605/2026 दर्ज की गई है, जिसमें सुटील यादव और जुगेश यादव को नामजद अभियुक्त बनाया गया है। आरोपित ने तोड़ी बेल की शर्तें, गिरफ्तारी की तलवार लटकी अदालत को यह भी बताया गया कि मुख्य आरोपित फिलहाल जमानत पर बाहर तो आ गया था, लेकिन उसने आवश्यक बेल बॉन्ड फर्निश नहीं किया और न्यायालय द्वारा तय की गई शर्तों का खुला उल्लंघन किया। उसने बाहर आते ही गवाहों को डराने-धमकाने और आपराधिक दबाव बनाने का काम शुरू कर दिया। शर्तों के उल्लंघन को देखते हुए अब आरोपित को धारा 35(3) (नए आपराधिक विधान अंतर्गत नोटिस प्रावधान) के तहत थाना में पेश होने का नोटिस जारी किया जा रहा है कि क्यों न उसे तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाए। यदि आरोपित थाने में उपस्थित होकर आत्मसमर्पण या संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं करता है, तो उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर कुर्की-जब्ती व गिरफ्तारी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। पूर्व के 4-5 आईओ और तत्कालीन एसएचओ नीरज कुमार सिंह की बढ़ेगी मुश्किलें इस पूरे प्रकरण में शुरू से अब तक लगभग चार से पांच जांच पदाधिकारी और बिहार थाने के तत्कालीन एसएचओ नीरज कुमार सिंह की भूमिका जांच के घेरे में आ गई है। वकील ने बताया कि एसआईटी के गठन के बावजूद बच्चा बरामद न होना और जांच में बार-बार टालमटोल करना गंभीर मिलीभगत की ओर इशारा करता है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब वर्तमान में कहीं भी पदस्थापित इन चारों-पांचों पूर्व आईओ तथा एसएचओ नीरज कुमार सिंह को संबंधित जिलों से विरमित कराकर नालंदा तलब किया जाएगा, जहां एसपी खुद आमने-सामने बैठाकर उनसे पूछताछ करेंगे कि किसके दबाव में प्राथमिकी में देरी की गई और मुख्य आरोपियों को संरक्षण दिया गया। अस्पताल से नवजात के गायब होने का पूरा घटनाक्रम और वर्षों का दर्दनाक संघर्ष मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है, जब पीड़ित अविनाश कुमार के नवजात बच्चे को इलाज के लिए बिहार शरीफ स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के कुछ ही दिनों बाद अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सक की मिलीभगत से उनके स्वस्थ नवजात शिशु को अचानक गायब कर दिया गया। जब परिजनों ने अपने बच्चे की मांग की, तो अस्पताल प्रशासन द्वारा संतोषजनक जवाब देने के बजाय टालमटोल की जाने लगी और बाद में रिकॉर्ड में हेराफेरी कर यह दिखाने का प्रयास किया गया कि उन्हें कोई और बच्चा या बच्ची सौंपी गई थी अथवा बच्चा मृत था। बदहवास पिता जब न्याय की गुहार लगाने स्थानीय बिहार थाना पहुंचे, तो वहां तैनात तत्कालीन पुलिस पदाधिकारियों ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर दी। करीब दो महीने तक थाने के चक्कर काटने के बावजूद जब एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो पीड़ित ने वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासनिक चौखटों पर दस्तक दी। इसके बाद प्रशासनिक जांच की धीमी गति के कारण मामला लगातार खिंचता चला गया। थक-हारकर पीड़ित पिता ने अपने लापता बच्चे की बरामदगी और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक रिट याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई। वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर जब हाईकोर्ट ने सीधी निगरानी शुरू की, तब पुलिस महकमे में हड़कंप मचा है और एक-एक कर मामले की परतें खुलने लगी हैं। नालंदा के चर्चित बच्चा गायब और अवैध तरीके से छिपाने, बेचने के गंभीर मामले में पटना उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने मामले की लीपापोती करने, एफआईआर दर्ज करने में जानबूझकर डेढ़ महीने की देरी करने और जांच में घोर लापरवाही बरतने के मामले में अब तक तैनात रहे सभी पुलिस अधिकारियों पर शिकंजा कस दिया है। वकील राजीव कुमार सक्सेना के अनुसार, उच्च न्यायालय ने नालंदा पुलिस अधीक्षक को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मामले की जांच से जुड़े पूर्व के तमाम आईओ, तत्कालीन एसएचओ और विशेष जांच दल के सभी सदस्यों से गहन पूछताछ की जाए। अदालत के निर्देशानुसार, इन पुलिस अधिकारियों की मौजूदा पोस्टिंग चाहे बिहार के किसी भी जिले अथवा थाने में हो, उन्हें हाईकोर्ट के आदेश से पत्र भेजकर नालंदा बुलवाया जाएगा, जहां एसपी स्वयं उनके बयान दर्ज कर जवाब-तलब करेंगे। बिना केस डायरी वीसी पर जुड़े एसपी, अदालत ने लगाई कड़ी फटकार मामले की सुनवाई के दौरान नालंदा एसपी हृदयकांत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश हुए। हालांकि, जब कोर्ट ने उनसे केस डायरी प्रस्तुत करने को कहा, तो उनके पास डायरी उपलब्ध नहीं थी। इस पर माननीय न्यायाधीश ने अत्यधिक नाराजगी जाहिर की और एसपी को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि यदि ऐसी लापरवाही दोबारा सामने आई तो उन्हें अदालत के समक्ष सशरीर हाजिर कर कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा। अदालत के समक्ष नालंदा एसपी ने लापता बच्चे की बरामदगी को लेकर अतिरिक्त समय की मांग की। एसपी ने अदालत को आश्वस्त किया कि पुलिस ने अपने गुप्तचरों को सक्रिय कर रखा है और बच्चे को जल्द से जल्द सुरक्षित बरामद करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। डेढ़ महीने तक एफआईआर दर्ज न करने पर तल्ख टिप्पणी हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरा क्षोभ प्रकट किया कि पीड़ित पक्ष की गुहार के बावजूद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने में करीब एक से डेढ़ महीने की आपराधिक देरी क्यों की। अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि कानून के रक्षकों द्वारा इस तरह की लापरवाही या मिलीभगत को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि इस मामले में ऐसी ठोस व नजीर पेश करने वाली कार्रवाई की जाएगी, जो पूरे समाज और पुलिस महकमे के लिए एक कड़ा संदेश बने। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि इसी तरह के बच्चों की खरीद-फरोख्त या गुमशुदगी से जुड़े अन्य मामले भी प्रकाश में आए हैं, तो उन सभी को एक साथ जोड़कर कानूनी नजीर स्थापित की जाएगी। 30-35 लाख और दो कट्ठा जमीन देकर केस मैनेज करने का खुलासा, धमकी की बात सही पाई गई चर्चित बच्चा गायब कांड में अदालत की सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज खुलासा सामने आया है। आरोपित चिकित्सक और उसके गुर्गों द्वारा कानूनी शिकंजे से बचने के लिए पीड़ित परिवार पर केस वापस लेने का लगातार आपराधिक दबाव बनाया जा रहा था। मामले की सुनवाई के दौरान नालंदा के पुलिस अधीक्षक ने माननीय न्यायालय के समक्ष आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि पीड़ित को धमकाने और भारी-भरकम रकम देकर मामले को दबाने के आरोप जांच में पूरी तरह सत्य पाए गए हैं। पुलिस को दिए गए फर्दबयान में राजगीर थाना क्षेत्र के डुमरी निवासी पीड़ित अविनाश कुमार ने पूरे षड्यंत्र का सिलसिलेवार ब्योरा दर्ज कराया है। पीड़ित के मुताबिक, मामले को दबाने का पहला प्रयास इसी वर्ष जनवरी-फरवरी माह में किया गया था, जब सिलाव थाना क्षेत्र अंतर्गत सैदपुर निवासी सुटील यादव उनके खेत पर पहुंचा। उस समय अविनाश अपने खेत में गेहूं की सिंचाई कर रहे थे। सुटील ने इसे ‘छोटा-मोटा मामला’ बताते हुए डॉक्टर यादव के पक्ष में कुछ ले-देकर सुलह करने का दबाव बनाया। हालांकि, पीड़ित पिता ने किसी भी प्रकार का आर्थिक प्रलोभन ठुकराते हुए साफ कह दिया कि उन्हें पैसे नहीं, सिर्फ अपना बच्चा सुरक्षित वापस चाहिए। इसके कुछ समय बाद मामले में समझौते के नाम पर खुली धमकी देने का दूसरा दौर शुरू हुआ। नुरसराय थाना क्षेत्र के पपरनौसा निवासी और वर्तमान में सिलाव बड़ी मस्जिद के पास रहने वाला योगेश गोप उर्फ मास्टर उर्फ जुगेश सीधे पीड़ित के घर आ धमका। उसने डॉक्टर की तरफ से दो कट्ठा जमीन के साथ-साथ 30 से 35 लाख रुपये नकद देने की खुली पेशकश रखी और केस मैनेज करने को कहा। जब पीड़ित ने झुकने से इनकार किया, तो उसने सीधे तौर पर जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि यदि बात नहीं मानी तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे और मुख्य वादी को ही खत्म कर दिया जाएगा ताकि कोई पैरवी करने वाला न बचे। अदालत में इन तथ्यों के प्रमाणित होने के बाद अब आरोपितों के खिलाफ कानूनी शिकंजा और अधिक कस गया है। एसपी ने कोर्ट को सूचित किया कि गवाहों और वादी को धमकाने के इस मामले में 23 सितंबर को राजगीर थाना में कांड संख्या 605/2026 दर्ज की गई है, जिसमें सुटील यादव और जुगेश यादव को नामजद अभियुक्त बनाया गया है। आरोपित ने तोड़ी बेल की शर्तें, गिरफ्तारी की तलवार लटकी अदालत को यह भी बताया गया कि मुख्य आरोपित फिलहाल जमानत पर बाहर तो आ गया था, लेकिन उसने आवश्यक बेल बॉन्ड फर्निश नहीं किया और न्यायालय द्वारा तय की गई शर्तों का खुला उल्लंघन किया। उसने बाहर आते ही गवाहों को डराने-धमकाने और आपराधिक दबाव बनाने का काम शुरू कर दिया। शर्तों के उल्लंघन को देखते हुए अब आरोपित को धारा 35(3) (नए आपराधिक विधान अंतर्गत नोटिस प्रावधान) के तहत थाना में पेश होने का नोटिस जारी किया जा रहा है कि क्यों न उसे तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाए। यदि आरोपित थाने में उपस्थित होकर आत्मसमर्पण या संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं करता है, तो उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर कुर्की-जब्ती व गिरफ्तारी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। पूर्व के 4-5 आईओ और तत्कालीन एसएचओ नीरज कुमार सिंह की बढ़ेगी मुश्किलें इस पूरे प्रकरण में शुरू से अब तक लगभग चार से पांच जांच पदाधिकारी और बिहार थाने के तत्कालीन एसएचओ नीरज कुमार सिंह की भूमिका जांच के घेरे में आ गई है। वकील ने बताया कि एसआईटी के गठन के बावजूद बच्चा बरामद न होना और जांच में बार-बार टालमटोल करना गंभीर मिलीभगत की ओर इशारा करता है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब वर्तमान में कहीं भी पदस्थापित इन चारों-पांचों पूर्व आईओ तथा एसएचओ नीरज कुमार सिंह को संबंधित जिलों से विरमित कराकर नालंदा तलब किया जाएगा, जहां एसपी खुद आमने-सामने बैठाकर उनसे पूछताछ करेंगे कि किसके दबाव में प्राथमिकी में देरी की गई और मुख्य आरोपियों को संरक्षण दिया गया। अस्पताल से नवजात के गायब होने का पूरा घटनाक्रम और वर्षों का दर्दनाक संघर्ष मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है, जब पीड़ित अविनाश कुमार के नवजात बच्चे को इलाज के लिए बिहार शरीफ स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के कुछ ही दिनों बाद अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सक की मिलीभगत से उनके स्वस्थ नवजात शिशु को अचानक गायब कर दिया गया। जब परिजनों ने अपने बच्चे की मांग की, तो अस्पताल प्रशासन द्वारा संतोषजनक जवाब देने के बजाय टालमटोल की जाने लगी और बाद में रिकॉर्ड में हेराफेरी कर यह दिखाने का प्रयास किया गया कि उन्हें कोई और बच्चा या बच्ची सौंपी गई थी अथवा बच्चा मृत था। बदहवास पिता जब न्याय की गुहार लगाने स्थानीय बिहार थाना पहुंचे, तो वहां तैनात तत्कालीन पुलिस पदाधिकारियों ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर दी। करीब दो महीने तक थाने के चक्कर काटने के बावजूद जब एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो पीड़ित ने वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासनिक चौखटों पर दस्तक दी। इसके बाद प्रशासनिक जांच की धीमी गति के कारण मामला लगातार खिंचता चला गया। थक-हारकर पीड़ित पिता ने अपने लापता बच्चे की बरामदगी और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक रिट याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई। वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर जब हाईकोर्ट ने सीधी निगरानी शुरू की, तब पुलिस महकमे में हड़कंप मचा है और एक-एक कर मामले की परतें खुलने लगी हैं।

