औरंगाबाद- मोती और झींगा पालन से बढ़ेगी किसानों की आय:0.5 एकड़ में मोती पालन पर 2.246 लाख, झींगा पालन पर 1.10 लाख की लागत; 60% मिलेगा अनुदान

औरंगाबाद- मोती और झींगा पालन से बढ़ेगी किसानों की आय:0.5 एकड़ में मोती पालन पर 2.246 लाख, झींगा पालन पर 1.10 लाख की लागत; 60% मिलेगा अनुदान

औरंगाबाद जिले में किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर विकसित करने के लिए मोती पालन एवं झींगा पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग (मत्स्य), बिहार की ओर से संचालित मत्स्य प्रजाति का विविधीकरण योजना के तहत जिला मत्स्य कार्यालय द्वारा यह पहल की जा रही है। जिला पदाधिकारी अभिलाषा शर्मा के नेतृत्व में संचालित इस योजना का उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग कर जलीय कृषि को बढ़ावा देना है। योजना के तहत कम क्षेत्र में बेहतर आय प्राप्त करने के लिए मोती पालन को उपयोगी विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। तालाबों और उपयुक्त जल स्रोतों में सीपों का पालन कर कृत्रिम तरीके से उच्च गुणवत्ता वाले मोती तैयार किए जाते हैं। इन मोतियों का इस्तेमाल आभूषण, सजावटी सामान और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में किया जाता है। 0.5 एकड़ की एक यूनिट की लागत 2.246 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस पर सभी वर्गों के लाभुकों को 60 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। इच्छुक किसानों, युवाओं, महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को सीप पालन, न्यूक्लियस प्रत्यारोपण, देखरेख और मोती की हार्वेस्टिंग का तकनीकी प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाएगा। महाझींगा पालन को दिया जा रहा बढ़ावा बिहार में उपलब्ध तालाबों और उपयुक्त जल क्षेत्रों में महाझींगा (Giant Freshwater Prawn) पालन को भी वैकल्पिक और लाभकारी जलीय कृषि मॉडल के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। सामान्य मछलियों की तुलना में महाझींगा का बाजार मूल्य अधिक होने के कारण इसे किसानों की आय बढ़ाने के बेहतर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। झींगा पालन को वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से मछली पालन के साथ जोड़कर बहु-प्रजातीय जलीय कृषि प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे उपलब्ध तालाबों का बेहतर उपयोग होने के साथ किसानों को एक ही जल संसाधन से अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है। योजना के तहत 0.5 एकड़ झींगा पालन इकाई की लागत 1.10 लाख रुपये निर्धारित है। सभी वर्गों के लाभुकों को इसमें भी 60 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। हालांकि झींगा पालन के लिए जल की गुणवत्ता, गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित आहार, जैव-सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रबंधन को जरूरी बताया गया है। ऑनलाइन आवेदन कर ले सकते हैं योजना का लाभ मत्स्य प्रजाति विविधीकरण योजना के माध्यम से ग्रामीण युवाओं के लिए नए स्वरोजगार के अवसर पैदा करने, मत्स्य किसानों की आय बढ़ाने और महिलाओं तथा स्वयं सहायता समूहों की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े स्थानीय रोजगार के अवसर भी विकसित होने की संभावना है। इच्छुक किसान और नागरिक आवश्यक दस्तावेजों के साथ ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के लिए बिहार मत्स्य विभाग की वेबसाइट fisheries.bihar.gov.in का उपयोग किया जा सकता है। योजना से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए जिला मत्स्य पदाधिकारी, मत्स्य प्रसार पदाधिकारी और मत्स्य विकास पदाधिकारी से संपर्क किया जा सकता है। मत्स्य विभाग की ओर से इच्छुक किसानों को योजना के तहत तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। जिला प्रशासन की ओर से भी योजना के सफल क्रियान्वयन में आवश्यक सहयोग प्रदान किया जा रहा है। विभाग का उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के साथ जिले में जलीय कृषि को बढ़ावा देना और किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करना है। औरंगाबाद जिले में किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर विकसित करने के लिए मोती पालन एवं झींगा पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग (मत्स्य), बिहार की ओर से संचालित मत्स्य प्रजाति का विविधीकरण योजना के तहत जिला मत्स्य कार्यालय द्वारा यह पहल की जा रही है। जिला पदाधिकारी अभिलाषा शर्मा के नेतृत्व में संचालित इस योजना का उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग कर जलीय कृषि को बढ़ावा देना है। योजना के तहत कम क्षेत्र में बेहतर आय प्राप्त करने के लिए मोती पालन को उपयोगी विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। तालाबों और उपयुक्त जल स्रोतों में सीपों का पालन कर कृत्रिम तरीके से उच्च गुणवत्ता वाले मोती तैयार किए जाते हैं। इन मोतियों का इस्तेमाल आभूषण, सजावटी सामान और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में किया जाता है। 0.5 एकड़ की एक यूनिट की लागत 2.246 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस पर सभी वर्गों के लाभुकों को 60 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। इच्छुक किसानों, युवाओं, महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को सीप पालन, न्यूक्लियस प्रत्यारोपण, देखरेख और मोती की हार्वेस्टिंग का तकनीकी प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाएगा। महाझींगा पालन को दिया जा रहा बढ़ावा बिहार में उपलब्ध तालाबों और उपयुक्त जल क्षेत्रों में महाझींगा (Giant Freshwater Prawn) पालन को भी वैकल्पिक और लाभकारी जलीय कृषि मॉडल के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। सामान्य मछलियों की तुलना में महाझींगा का बाजार मूल्य अधिक होने के कारण इसे किसानों की आय बढ़ाने के बेहतर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। झींगा पालन को वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से मछली पालन के साथ जोड़कर बहु-प्रजातीय जलीय कृषि प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे उपलब्ध तालाबों का बेहतर उपयोग होने के साथ किसानों को एक ही जल संसाधन से अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है। योजना के तहत 0.5 एकड़ झींगा पालन इकाई की लागत 1.10 लाख रुपये निर्धारित है। सभी वर्गों के लाभुकों को इसमें भी 60 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। हालांकि झींगा पालन के लिए जल की गुणवत्ता, गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित आहार, जैव-सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रबंधन को जरूरी बताया गया है। ऑनलाइन आवेदन कर ले सकते हैं योजना का लाभ मत्स्य प्रजाति विविधीकरण योजना के माध्यम से ग्रामीण युवाओं के लिए नए स्वरोजगार के अवसर पैदा करने, मत्स्य किसानों की आय बढ़ाने और महिलाओं तथा स्वयं सहायता समूहों की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े स्थानीय रोजगार के अवसर भी विकसित होने की संभावना है। इच्छुक किसान और नागरिक आवश्यक दस्तावेजों के साथ ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के लिए बिहार मत्स्य विभाग की वेबसाइट fisheries.bihar.gov.in का उपयोग किया जा सकता है। योजना से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए जिला मत्स्य पदाधिकारी, मत्स्य प्रसार पदाधिकारी और मत्स्य विकास पदाधिकारी से संपर्क किया जा सकता है। मत्स्य विभाग की ओर से इच्छुक किसानों को योजना के तहत तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। जिला प्रशासन की ओर से भी योजना के सफल क्रियान्वयन में आवश्यक सहयोग प्रदान किया जा रहा है। विभाग का उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के साथ जिले में जलीय कृषि को बढ़ावा देना और किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करना है।  

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