आवेश में बिखरने से बेहतर है ठहर जाना:एक्सपर्ट बोले-आत्म- नियंत्रण जादू नहीं है, इसे छोटे-छोटे अभ्यास से ही सीखें

आवेश में बिखरने से बेहतर है ठहर जाना:एक्सपर्ट बोले-आत्म- नियंत्रण जादू नहीं है, इसे छोटे-छोटे अभ्यास से ही सीखें

क्लिनिक में थेरेपिस्ट के सामने बैठा मरीज टूट चुका था। बचपन के आघात और दबे गुस्से ने उसे इतना अस्थिर बना दिया था कि छोटी-सी बात पर भी आपा खो बैठता। विरोध पर चिल्लाने लगता, कड़े ईमेल भेज देता या चीजें पटक देता। पर, हर बार उसके हिस्से पछतावा और अपराधबोध ही आता, जिससे संघर्ष और गहरा हो जाता। थेरेपिस्ट जोआन कुक ने स्टैनफर्ड के मनोवैज्ञानिक वॉल्टर मिशेल के चर्चित ‘मार्शमैलो टेस्ट’ का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस प्रयोग में बच्चों के सामने एक कैंडी रखकर कहा जाता था कि वे कुछ देर तक उसे खाने से खुद को रोक लें, तो उन्हें दूसरी कैंडी मिलेगी। धैर्य दिखाने वाले बच्चे आगे चलकर जीवन की चुनौतियों से बेहतर ढंग से निपटने वाले साबित हुए। डॉ. कुक ने समझाया कि वयस्कों के लिए ऐसी ‘कैंडी’ अलग रूप में आती हैं, जैसे जंक फूड, सोशल मीडिया या गुस्से में तुरंत प्रतिक्रिया देना। उन्होंने कहा, फौरी संतुष्टि की चाह अक्सर आत्मनियंत्रण छीन लेती है और व्यक्ति अपनी शक्ति क्षणिक भावनाओं के हवाले कर देता है। कुक कहते हैं, ‘भावनाएं बेकाबू होने लगें, तो खुद को दौड़ते घोड़े पर सवार समझें और उसकी लगाम खींचकर नियंत्रण वापस हासिल करें।’ कुक बताते हैं, ‘क्लिनिक से निकलते वक्त मरीज समझ गया था कि आत्म-नियंत्रण जन्मजात गुण नहीं, बल्कि अभ्यास से सीखने वाली कला है। तुरंत मिलने वाले सुख के बजाय सब्र चुनना ही इंसान को खुद पर गर्व करने का मौका देता है।’ नकारात्मक भावनाएं समुद्र की लहरों जैसी कुक ने मनोवैज्ञानिक एंजेला नारायण की महत्वपूर्ण सीख साझा की। वे तनावग्रस्त माता-पिता को समझाते हैं कि नकारात्मक भावनाएं समुद्र की लहरों जैसी होती हैं। गुस्से में चीखने या आवेश में ईमेल भेजने के बजाय कुछ पल रुककर गहरी सांस लें और उस बेचैनी को महसूस करें। समय के साथ आवेग की तीव्रता घटने लगती है और विवेक लौट आता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *