आज आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग के सुयोग में महिलाएं अपने संतान की कुशलता, दीर्घायुष्य और वंश वृद्धि की कामना से जिउतिया का व्रत करेंगी। आज अष्टमी तिथि की उपस्थिति अपराह्न काल में, प्रदोष काल में और चंद्रोदयव्यापिनी होने से यह ब्रह्मभाव हो गया है। अष्टमी तिथि सुबह 10:03 बजे से शुरू होकर कल 4 अक्टूबर रविवार की सुबह 07:38 बजे तक रहेगा। जिउतिया का व्रत आज व पारण कल ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा ने विभिन्न पंचांगों के हवाले से बताया कि सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है। भविष्य पुराण, स्मृति ग्रंथ, निर्णय सिंधु, विष्णु धर्मोत्तर में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी में जीमूतवाहन की पूजा का वर्णन है।.शनिवार को जिउतिया का व्रत और कल रविवार को अष्टमी तिथि के समाप्ति के बाद व्रती महिलाएं केराउ और गाय के दूध से पारण करेंगी। व्रत से दूर होता नागदोष का प्रभाव जिउतिया व्रत से जुड़ी प्रमुख कथा के अनुसार राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दिए थे। उनकी करुणा और त्याग की प्रेरणा से यह व्रत त्याग, धर्म व करुणा की शिक्षा देता है। इस पौराणिक कथा के मुताबिक व्रत करने से नागदोष का प्रभाव घर-परिवार से दूर होता है और संतान का स्वास्थ्य उत्तम होता है। इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनने से व्रती महिलाओं की संतान दीर्घायु व रोगमुक्त रहते है। घर-परिवार पर नागदोष का प्रभाव कम होता है। यह व्रत त्याग करुणा और धर्म की शिक्षा देता है। संतान, सौभाग्य व वंश वृद्धि के लिए जिउतिया व्रत महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पुत्रों की मंगल कामना, दीर्घायुष्य व वंश वृद्धि के लिए जीवत्पुत्रिका (जीउतिया) का निर्जला व्रत करेंगी। इस दिन कुश से जीमूतवाहन की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा साथ में माता लक्ष्मी व देवी दुर्गा की पूजा करने के बाद माताएं ब्राह्मण या योग्य पंडित से जीमूतवाहन की कथा सुनकर उनको दक्षिणा प्रदान करेंगी। इस महाव्रत का पारण व्रती महिलाएं केराव से करेंगी। सरगही-ओठगन कर लिया संकल्प पंडित झा ने कहा कि जिउतिया का व्रत करने वाली महिलाएं आश्विन कृष्ण सप्तमी में शुक्रवार की देर रात में सूर्योदय से पहले सरगही-ओठगन कर इस पुनीत व्रत का संकल्प लिया। व्रत करने वाली महिलाओं ने सरगही में चाय, शरबत, मिष्ठान्न, ठेकुआ, पिरकिया, दही-चुरा आदि ग्रहण कर व्रत का महासंकल्प ली। शिव ने सुनायी थी माता पार्वती को कथा ज्योतिषी राकेश झा के मुताबिक जीमूतवाहन की कथा सबसे पहले भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनायी थी। इस कथा में एक चूल्होरिन और सियारिन के द्वारा इस व्रत को करने का वर्णन है। इन दोनों ने जीमूतवाहन का व्रत रखा पर सियारिन को भूख बर्दाश्त नहीं हुई और उसने मांस का भोजन कर लिया। अगले जन्म में दोनों एक ब्राह्मण की पुत्री के रूप में जन्म लिया। चूल्होरिन (अब शीलावती) की शादी उस नगर के राजा के यहां कार्यरत मंत्री से हुई और सियारिन (अब कर्पूरावती) की शादी नगर के राजा मलयकेतु के साथ विधि-विधान से हुई। दोनों बहनों को सात-सात पुत्र हुए लेकिन सियारिन के सातों पुत्रो की मृत्यु हो गई और चूल्हारिन के जीवित रहे। बाद में इसका कारण जानने पर आत्मग्लानि से कर्पूरावती ने प्राण त्याग दिए। आज आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग के सुयोग में महिलाएं अपने संतान की कुशलता, दीर्घायुष्य और वंश वृद्धि की कामना से जिउतिया का व्रत करेंगी। आज अष्टमी तिथि की उपस्थिति अपराह्न काल में, प्रदोष काल में और चंद्रोदयव्यापिनी होने से यह ब्रह्मभाव हो गया है। अष्टमी तिथि सुबह 10:03 बजे से शुरू होकर कल 4 अक्टूबर रविवार की सुबह 07:38 बजे तक रहेगा। जिउतिया का व्रत आज व पारण कल ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा ने विभिन्न पंचांगों के हवाले से बताया कि सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है। भविष्य पुराण, स्मृति ग्रंथ, निर्णय सिंधु, विष्णु धर्मोत्तर में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी में जीमूतवाहन की पूजा का वर्णन है।.शनिवार को जिउतिया का व्रत और कल रविवार को अष्टमी तिथि के समाप्ति के बाद व्रती महिलाएं केराउ और गाय के दूध से पारण करेंगी। व्रत से दूर होता नागदोष का प्रभाव जिउतिया व्रत से जुड़ी प्रमुख कथा के अनुसार राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दिए थे। उनकी करुणा और त्याग की प्रेरणा से यह व्रत त्याग, धर्म व करुणा की शिक्षा देता है। इस पौराणिक कथा के मुताबिक व्रत करने से नागदोष का प्रभाव घर-परिवार से दूर होता है और संतान का स्वास्थ्य उत्तम होता है। इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनने से व्रती महिलाओं की संतान दीर्घायु व रोगमुक्त रहते है। घर-परिवार पर नागदोष का प्रभाव कम होता है। यह व्रत त्याग करुणा और धर्म की शिक्षा देता है। संतान, सौभाग्य व वंश वृद्धि के लिए जिउतिया व्रत महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पुत्रों की मंगल कामना, दीर्घायुष्य व वंश वृद्धि के लिए जीवत्पुत्रिका (जीउतिया) का निर्जला व्रत करेंगी। इस दिन कुश से जीमूतवाहन की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा साथ में माता लक्ष्मी व देवी दुर्गा की पूजा करने के बाद माताएं ब्राह्मण या योग्य पंडित से जीमूतवाहन की कथा सुनकर उनको दक्षिणा प्रदान करेंगी। इस महाव्रत का पारण व्रती महिलाएं केराव से करेंगी। सरगही-ओठगन कर लिया संकल्प पंडित झा ने कहा कि जिउतिया का व्रत करने वाली महिलाएं आश्विन कृष्ण सप्तमी में शुक्रवार की देर रात में सूर्योदय से पहले सरगही-ओठगन कर इस पुनीत व्रत का संकल्प लिया। व्रत करने वाली महिलाओं ने सरगही में चाय, शरबत, मिष्ठान्न, ठेकुआ, पिरकिया, दही-चुरा आदि ग्रहण कर व्रत का महासंकल्प ली। शिव ने सुनायी थी माता पार्वती को कथा ज्योतिषी राकेश झा के मुताबिक जीमूतवाहन की कथा सबसे पहले भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनायी थी। इस कथा में एक चूल्होरिन और सियारिन के द्वारा इस व्रत को करने का वर्णन है। इन दोनों ने जीमूतवाहन का व्रत रखा पर सियारिन को भूख बर्दाश्त नहीं हुई और उसने मांस का भोजन कर लिया। अगले जन्म में दोनों एक ब्राह्मण की पुत्री के रूप में जन्म लिया। चूल्होरिन (अब शीलावती) की शादी उस नगर के राजा के यहां कार्यरत मंत्री से हुई और सियारिन (अब कर्पूरावती) की शादी नगर के राजा मलयकेतु के साथ विधि-विधान से हुई। दोनों बहनों को सात-सात पुत्र हुए लेकिन सियारिन के सातों पुत्रो की मृत्यु हो गई और चूल्हारिन के जीवित रहे। बाद में इसका कारण जानने पर आत्मग्लानि से कर्पूरावती ने प्राण त्याग दिए।

