अमनदीप सिंह | अमृतसर 25 साल की उम्र में शहर के प्रमुख बाजार में दुकान थी। परिवार बसाने जिंदगी को आगे बढ़ाने के सपने थे। फिर ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और सब कुछ उजड़ गया। दुकान राख हो गई और हाथ में सिर्फ चाबियां रह गईं। कभी सेठ कहलाने वाले परविंदर सिंह अरोड़ा को परिवार पालने के लिए फेरी लगाकर इत्र, परफ्यूम बेचना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हक की लड़ाई नहीं छोड़ी। 42 साल के संघर्ष के बाद 70 साल की उम्र में हाईकोर्ट के फैसले ने उन्हें फिर दुकान मिलने की उम्मीद दी है। यह कहानी सिर्फ एक दुकानदार की नहीं, बल्कि 1984 में श्री अकाल तख्त साहिब के पास मनियारा बाजार की उजड़ी 133 दुकानों और उनके मालिकों के संघर्ष की है। अरोड़ा बताते हैं कि उस समय थड़ा साहिब गुरुद्वारा और बाबा गुरबख्श सिंह का गुरुद्वारा मौजूदा स्वरूप में बाहर की तरफ थे। इनके बीच मनियारा बाजार, शहीद मार्केट और थड़ा साहिब मार्केट थे। अरोड़ा की कॉस्मेटिक और परफ्यूम की दुकान थी। अरोड़ा कहते हैं कि यहां हम दुकानों के राजा थे, लेकिन एक दिन ऐसा आया कि दुकानें ही नहीं रहीं। अरोड़ा के मुताबिक कारसेवा के दौरान मलबा भी उठा लिया गया। उनके पास सिर्फ दुकान की चाबियां बचीं। परिवार के लोग रोते थे। उस समय शादी होनी थी, परिवार बसाना था, खुद को स्थापित करना था, लेकिन सब कुछ वहीं खत्म हो गया। अरोड़ा कहते हैं कि जो दुकानदार कभी राजा थे, वे कंगाल हो गए। दुकानें उजड़ने के कुछ महीने बाद ही से एक दुकानदार ने आहत होकर आत्महत्या कर ली। अरोड़ा की जिंदगी में भी एक के बाद एक मुश्किलें आती रहीं। शादी के बाद उनके बेटे का जन्म हुआ, लेकिन कुछ दिन बाद ही उसकी मौत हो गई। वर्ष 1990 में बेटी हरप्रीत का जन्म हुआ और 1992 में पत्नी भी दुनिया छोड़ गईं। हरप्रीत करीब 10 साल की हुई तो अरोड़ा उसे श्री दरबार साहिब माथा टेकाने लाते थे। इस दौरान पुरानी दुकान की जगह दिखाकर बताते कि बेटा, यहां हमारी दुकान हुआ करती थी।दुकानदारों ने अपने हक के लिए वर्ष 2000 में मिलकर हाईकोर्ट में केस दायर किया। इसके बाद 26 साल तक कानूनी लड़ाई चली। हालांकि अरोड़ा का संघर्ष वर्ष 1984 में ही शुरू हो गया था। फेरी से होने वाली कमाई का एक हिस्सा वकीलों की फीस और कानूनी कार्रवाई पर खर्च होता रहा। दुकानें गईं तो रह गईं सिर्फ चाबियां , 2000 में हाईकोर्ट पहुंचे, 26 साल तक लड़ी कानूनी लड़ाई 7 सितंबर को हाईकोर्ट की डबल बेंच का फैसला पक्ष में आया। अदालत ने दुकानें देने का आदेश दिया तो अरोड़ा की 42 साल पुरानी उम्मीद फिर जाग गई। बेटी हरप्रीत को जब फैसले की जानकारी मिली तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब उनकी नजर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की कार्रवाई पर है। अरोड़ा चाहते हैं कि इस बार दिवाली अपनी दुकान में मनाएं और 42 साल बाद उसी बाजार में फिर से सामान सजाकर कारोबार शुरू कर सकें।

