सीमांचल क्षेत्र में केला, अनानास और चाय की खेती के लिए पहचान रखने वाले ठाकुरगंज प्रखंड में अब किसान पारंपरिक फसलों के साथ सब्जी की खेती में भी नए प्रयोग कर रहे हैं। छैतल पंचायत के किसान अब्दुल राजीक ने मेहनत और बेहतर प्रबंधन के दम पर चार बीघा जमीन में खीरे की खेती कर मिसाल पेश की है। महज एक माह से कुछ अधिक समय में तैयार हुई फसल से उन्हें लगातार उपज मिल रही है। खेत से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में खीरा बाजार तक पहुंचाया जा रहा है। अब्दुल राजीक बताते हैं कि उन्होंने पहले धान, मक्का, अनानास, चायपत्ती और केला जैसी फसलों की खेती की है। इस बार उन्होंने रबी मौसम में खीरे की खेती करने का निर्णय लिया। इसके लिए खेत को अच्छी तरह तैयार किया गया और गोबर खाद समेत अन्य खाद का उपयोग किया गया। चार बीघा खेत में खीरे की बेल को सहारा देने के लिए करीब 500 बांस का इस्तेमाल किया गया। समय पर सिंचाई, रखरखाव और देखभाल के बाद फसल तेजी से तैयार होने लगी। पहले दिन 20 किलो खीरा निकला खेत से उन्होंने बताया कि शुरुआत में पहले दिन करीब 20 किलो खीरा खेत से निकला। अगले दिन उपज बढ़कर एक क्विंटल तक पहुंच गई। इसके बाद उत्पादन लगातार बढ़ता गया और अब प्रतिदिन करीब 10 क्विंटल खीरा खेत से निकालकर बाजार में भेजा जा रहा है। अब्दुल राजीक का कहना है कि खेती से होने वाली आमदनी से परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च पूरे होते हैं।
‘मेहनत करें तो गांव में ही रोजगार’ अब्दुल राजीक कहते हैं कि यदि किसान आधुनिक तरीके से मेहनत और लगन के साथ खेती करें तो उन्हें रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन करने की जरूरत काफी हद तक कम हो सकती है। उनका कहना है कि खेत को सही तरीके से तैयार कर कम अवधि वाली फसलों का उत्पादन किसानों के लिए आय का एक जरिया बन सकता है। वहीं किसान मुमताज आलम ने बताया कि रिश्तेदार के सुझाव पर उन्होंने खीरे की खेती शुरू की थी। शुरुआत में उन्हें आशंका थी कि करीब एक लाख रुपये तक खर्च हो सकता है और यदि फसल अच्छी नहीं हुई तो नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके बावजूद उन्होंने जोखिम लेकर खेती शुरू की। अब मेहनत का परिणाम देखकर उनका उत्साह बढ़ा है। उन्होंने बताया कि खीरे की तुड़ाई के लिए अब प्रतिदिन पांच से छह मजदूरों की जरूरत पड़ रही है, क्योंकि खेत में तेजी से खीरे तैयार हो रहे हैं। खीरे की खेती का क्षेत्र बढ़ाने की तैयारी किसान नईमुद्दीन भी खीरे की खेती को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि इसी जमीन पर कई तरह की फसलें उगाई हैं, लेकिन खीरे की खेती का अनुभव अलग रहा। उनके अनुसार करीब 27 दिनों में फसल तैयार होकर बाजार तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि इस खेती से उन्हें लाभ मिला है और अब आगे खीरे की खेती का क्षेत्र बढ़ाने की तैयारी है। छैतल पंचायत के किसानों का यह प्रयोग स्थानीय स्तर पर सब्जी उत्पादन और खेती में नए विकल्प की संभावना को सामने ला रहा है। कम अवधि में तैयार होने वाली फसल, स्थानीय बाजार में आपूर्ति और खेती से जुड़े रोजगार के कारण किसानों में इस तरह की खेती को लेकर रुचि बढ़ती दिखाई दे रही है सीमांचल क्षेत्र में केला, अनानास और चाय की खेती के लिए पहचान रखने वाले ठाकुरगंज प्रखंड में अब किसान पारंपरिक फसलों के साथ सब्जी की खेती में भी नए प्रयोग कर रहे हैं। छैतल पंचायत के किसान अब्दुल राजीक ने मेहनत और बेहतर प्रबंधन के दम पर चार बीघा जमीन में खीरे की खेती कर मिसाल पेश की है। महज एक माह से कुछ अधिक समय में तैयार हुई फसल से उन्हें लगातार उपज मिल रही है। खेत से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में खीरा बाजार तक पहुंचाया जा रहा है। अब्दुल राजीक बताते हैं कि उन्होंने पहले धान, मक्का, अनानास, चायपत्ती और केला जैसी फसलों की खेती की है। इस बार उन्होंने रबी मौसम में खीरे की खेती करने का निर्णय लिया। इसके लिए खेत को अच्छी तरह तैयार किया गया और गोबर खाद समेत अन्य खाद का उपयोग किया गया। चार बीघा खेत में खीरे की बेल को सहारा देने के लिए करीब 500 बांस का इस्तेमाल किया गया। समय पर सिंचाई, रखरखाव और देखभाल के बाद फसल तेजी से तैयार होने लगी। पहले दिन 20 किलो खीरा निकला खेत से उन्होंने बताया कि शुरुआत में पहले दिन करीब 20 किलो खीरा खेत से निकला। अगले दिन उपज बढ़कर एक क्विंटल तक पहुंच गई। इसके बाद उत्पादन लगातार बढ़ता गया और अब प्रतिदिन करीब 10 क्विंटल खीरा खेत से निकालकर बाजार में भेजा जा रहा है। अब्दुल राजीक का कहना है कि खेती से होने वाली आमदनी से परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च पूरे होते हैं।
‘मेहनत करें तो गांव में ही रोजगार’ अब्दुल राजीक कहते हैं कि यदि किसान आधुनिक तरीके से मेहनत और लगन के साथ खेती करें तो उन्हें रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन करने की जरूरत काफी हद तक कम हो सकती है। उनका कहना है कि खेत को सही तरीके से तैयार कर कम अवधि वाली फसलों का उत्पादन किसानों के लिए आय का एक जरिया बन सकता है। वहीं किसान मुमताज आलम ने बताया कि रिश्तेदार के सुझाव पर उन्होंने खीरे की खेती शुरू की थी। शुरुआत में उन्हें आशंका थी कि करीब एक लाख रुपये तक खर्च हो सकता है और यदि फसल अच्छी नहीं हुई तो नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके बावजूद उन्होंने जोखिम लेकर खेती शुरू की। अब मेहनत का परिणाम देखकर उनका उत्साह बढ़ा है। उन्होंने बताया कि खीरे की तुड़ाई के लिए अब प्रतिदिन पांच से छह मजदूरों की जरूरत पड़ रही है, क्योंकि खेत में तेजी से खीरे तैयार हो रहे हैं। खीरे की खेती का क्षेत्र बढ़ाने की तैयारी किसान नईमुद्दीन भी खीरे की खेती को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि इसी जमीन पर कई तरह की फसलें उगाई हैं, लेकिन खीरे की खेती का अनुभव अलग रहा। उनके अनुसार करीब 27 दिनों में फसल तैयार होकर बाजार तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि इस खेती से उन्हें लाभ मिला है और अब आगे खीरे की खेती का क्षेत्र बढ़ाने की तैयारी है। छैतल पंचायत के किसानों का यह प्रयोग स्थानीय स्तर पर सब्जी उत्पादन और खेती में नए विकल्प की संभावना को सामने ला रहा है। कम अवधि में तैयार होने वाली फसल, स्थानीय बाजार में आपूर्ति और खेती से जुड़े रोजगार के कारण किसानों में इस तरह की खेती को लेकर रुचि बढ़ती दिखाई दे रही है

