नवविवाहित दंपतियों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करने और शादी के शुरुआती वर्षों में परिवार बढ़ाने में अंतर रखने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘नई पहल किट’ (एनपीके) योजना की रफ्तार झुंझुनूं में भी धीमी है। जिले में निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले अब तक करीब 8 प्रतिशत नवविवाहित जोड़ों तक ही किट पहुंच पाई है। जिले के लिए तय 4,764 के लक्ष्य के मुकाबले 364 किट का वितरण हुआ है। करीब 4,400 पात्र नवविवाहित जोड़े अभी किट से वंचित हैं। राज्य में 1 लाख 58 हजार 298 पात्र नवविवाहित जोड़ों तक किट पहुंचाने का लक्ष्य था, लेकिन अब तक सिर्फ 7,504 किट का वितरण हुआ है। यह कुल लक्ष्य का करीब 4.7 प्रतिशत है। झुंझुनूं में 364 किट का वितरण हुआ है, जो इन जिलों की तुलना में अधिक है, लेकिन लक्ष्य की तुलना में अभी भी बड़ी संख्या में जोड़े योजना से बाहर हैं। झुंझुनूं प्रदेश औसत से आगे, लेकिन लक्ष्य से काफी पीछे जिले में योजना के तहत 4,764 नवविवाहित जोड़ों को नई पहल किट देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसके मुकाबले 364 किट वितरित की गईं। इस हिसाब से उपलब्धि करीब 7.6 प्रतिशत, यानी विभागीय आंकड़ों में करीब 8 प्रतिशत बैठती है। इसका मतलब यह है कि लक्ष्य के करीब 92 प्रतिशत नवविवाहित जोड़ों तक अभी किट नहीं पहुंची है। योजना का उद्देश्य शादी के तुरंत बाद दंपतियों को परिवार नियोजन के विकल्पों की जानकारी देना और पहले बच्चे में उचित अंतर रखने के लिए प्रेरित करना है। योजना के आंकड़े बताते हैं कि कई जिलों में वितरण की स्थिति बेहद कम रही। भरतपुर में 3,372 के लक्ष्य पर सिर्फ 10 किट, फलोदी में 1,589 के लक्ष्य पर 9, जालोर में 3,581 पर 23, बांसवाड़ा में 5,640 पर 64 और डूंगरपुर में 4,731 के लक्ष्य पर 59 किट वितरित हुई हैं। इसमें श्रृंगार सामग्री, रूमाल, तौलिया, बिंदी आदि के साथ परिवार नियोजन के साधन और उनके इस्तेमाल की जानकारी शामिल होती है। सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका नवविवाहित जोड़ों तक किट पहुंचाने और परिवार नियोजन के विकल्पों के बारे में परामर्श देने की है। कई जिलों में 5 प्रतिशत भी नहीं पहुंची उपलब्धि प्रदेश के अधिकांश जिलों में किट वितरण लक्ष्य के 5 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाया। सीकर और राजसमंद में करीब 14-14 प्रतिशत वितरण हुआ। अजमेर में करीब 9 प्रतिशत, जबकि झुंझुनूं, डीडवाना-कुचामन और बूंदी में करीब 8 प्रतिशत वितरण हुआ। इसके उलट भरतपुर, फलोदी, जालोर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर जैसे जिलों में वितरण 1 प्रतिशत के आसपास या उससे भी कम रहा। इससे साफ है कि योजना का क्रियान्वयन जिलों में एक समान गति से नहीं हो पाया।

