कैलाश मंदिर की नक्काशी देख हैरान हुए अभिनेता शेखर कपूर, बोले- गीजा के पिरामिड से भी बड़ा रहस्य

कैलाश मंदिर की नक्काशी देख हैरान हुए अभिनेता शेखर कपूर, बोले- गीजा के पिरामिड से भी बड़ा रहस्य

Shekhar Kapur On Kailasa Temple: महाराष्ट्र की एलोरा गुफाओं में मौजूद कैलाश मंदिर अपनी विशाल संरचना और बारीक नक्काशी के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। अब फिल्ममेकर शेखर कपूर ने इस प्राचीन मंदिर की निर्माण कला और उसकी अद्भुत सटीकता पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि एक ही चट्टान को काटकर इतनी विशाल संरचना तैयार करना और उसमें इतनी बारीकी बनाए रखना आज भी हैरान करने वाला है। उन्होंने इसकी सटीकता को गीजा के पिरामिडों से भी बड़ा रहस्य बताया।

एक ही चट्टान से तैयार हुआ मंदिर

कैलाश मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे कैलाश पर्वत का प्रतीक माना जाता है। यह एलोरा गुफाओं का हिस्सा है, जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है।

मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसे अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर नहीं, बल्कि एक विशाल बेसाल्ट चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर तैयार किया गया था। प्राचीन कारीगरों ने हथौड़े और छेनी जैसे साधारण औजारों की मदद से मंदिर की पूरी संरचना और उसमें मौजूद मूर्तियों को आकार दिया।

‘अगर नाक गलत तराश दी होती तो?’

शेखर कपूर ने अपने पोस्ट में इसी काम की सटीकता पर सवाल उठाया। उन्होंने कल्पना की कि अगर किसी मूर्तिकार से किसी मूर्ति का कोई छोटा हिस्सा भी गलत कट जाता, तो उसे ठीक करने की गुंजाइश कितनी होती।

उनका सवाल था कि एक ही पत्थर को काटकर बनाए जा रहे मंदिर में अगर किसी मूर्ति की नाक जैसी बारीक चीज गलत तराश दी जाती, तो क्या पूरी संरचना को दोबारा बनाने की जरूरत पड़ती? इसके बावजूद मंदिर की मूर्तियों और ज्यामितीय डिजाइन में दिखाई देने वाली सटीकता उन्हें बेहद असाधारण लगती है। उन्होंने इसी संदर्भ में कैलाश मंदिर की निर्माण प्रक्रिया को गीजा के पिरामिडों से भी बड़ा रहस्य बताया।

प्राचीन गणित और वास्तुकला का जिक्र

शेखर कपूर ने अपनी बात केवल मंदिर की नक्काशी तक सीमित नहीं रखी। उन्होंने प्राचीन भारत की गणितीय परंपराओं को संगीत, कला, वास्तुकला और दर्शन से जोड़ते हुए अपनी राय रखी।

फिल्ममेकर के मुताबिक, भारतीय परंपरा में गणित और ज्यामिति का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में दिखाई देता है। उन्होंने भारतीय संगीत के ताल, कला और वास्तुकला का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन को वह एक सीधी रेखा के बजाय गोलाकार और चक्रीय व्यवस्था के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, सीमित और असीम के बीच संबंध को कन्सेंट्रिक सर्कल्स यानी एक-दूसरे के भीतर मौजूद वृत्तों के जरिए समझा जा सकता है।

क्वांटम कंप्यूटिंग से जोड़ा प्राचीन विचार

शेखर कपूर ने आगे अपने विचार को आधुनिक विज्ञान तक पहुंचाया। उन्होंने क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम एंटैंगलमेंट का उदाहरण देते हुए इन्हें प्राचीन भारतीय विचारों से जोड़ने की कोशिश की।

उन्होंने गूगल के ‘Willow’ क्वांटम कंप्यूटर का भी उल्लेख किया। हालांकि, ये संबंध शेखर कपूर की अपनी व्याख्या हैं और इन्हें प्राचीन भारतीय गणित तथा आधुनिक क्वांटम विज्ञान के बीच स्थापित वैज्ञानिक समानता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शिक्षा व्यवस्था और उपनिवेशवाद पर भी बोले

अपने पोस्ट में शेखर कपूर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था में औपनिवेशिक दौर के प्रभाव पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा प्रणाली में बदलाव हुए और उनके अनुसार ज्ञान को समझने का पारंपरिक तरीका प्रभावित हुआ।

उन्होंने ज्ञान और बुद्धिमत्ता के बीच अंतर बताते हुए कहा कि केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है। उनके विचार में जब ज्ञान के साथ व्यापक समझ और बुद्धिमत्ता नहीं होती, तो उसका वास्तविक अर्थ सीमित हो सकता है।

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