बक्सर का अविनाश गांव में जमीन खोदकर बनाया अखाड़ा:अब भारतीय टीम के लिए कुश्ती करेंगे, जापान एशियन गेम्स में नजर आएंगे

बक्सर का अविनाश गांव में जमीन खोदकर बनाया अखाड़ा:अब भारतीय टीम के लिए कुश्ती करेंगे, जापान एशियन गेम्स में नजर आएंगे

बक्सर के अविनाश कुमार जापान में होने वाले एशियन गेम्स में भारतीय कुश्ती टीम के स्पोर्टिंग स्टाफ के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। बक्सर की मिट्टी में कुश्ती के दांव-पेच सीखने वाले अविनाश ने गांव में संसाधनों की कमी के बावजूद इस खेल में अपनी पहचान बनाई। तीन भाइयों और दो बहनों में मंझले अविनाश फिलहाल भारतीय सेना की सर्विसेज टीम से जुड़े हैं और तीनों सेनाओं की कुश्ती टीम के कंडीशनर कोच की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अविनाश चौसा नगर पंचायत क्षेत्र के रहने वाले हैं। शुरुआती पढ़ाई गांव में करने के बाद उन्होंने मुगलसराय से आगे की शिक्षा ली। बचपन से ही उन्हें कुश्ती का शौक था। परिवार को बिना बताए वे अखाड़े में जाकर दांव-पेच सीखते थे। जब परिवार को इसकी जानकारी हुई तो उन्हें डांट भी पड़ी। परिवार चाहता था इंजीनियर या अधिकारी बनें अविनाश के परिवार में किसी ने कुश्ती को करियर नहीं बनाया था। उनके रिश्तेदारों में इंजीनियर और डॉक्टर हैं, जबकि उनकी एक बहन आईएएस अधिकारी हैं। उनके पिता बैंक में अधिकारी थे और बड़े भाई ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। अविनाश बताते हैं कि परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई पूरी कर इंजीनियर या अधिकारी बनें। पड़ोसी और रिश्तेदार भी अक्सर कहते थे कि पहलवानी उनके परिवार के लिए ठीक नहीं है। लेकिन इन बातों ने उन्हें पीछे हटाने के बजाय और प्रेरित किया। उन्होंने 14 साल की उम्र में गांव में ही कुश्ती शुरू कर दी। 2006 में पहली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता, जीता गोल्ड शुरुआत में अविनाश ने छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। साल 2006 में पटना में पहली बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला। यहां उन्होंने गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद परिवार का भी उन्हें समर्थन मिलने लगा और कुश्ती का सफर आगे बढ़ता गया। गांव में कुश्ती के लिए संसाधनों की कमी थी। अविनाश ने स्टेशन रोड के पास एक बगीचे की जमीन खोदकर अखाड़ा बनाया था। बेहतर प्रशिक्षण के लिए वे करीब 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर सोनपा जाते थे। मुगलसराय रेलवे अखाड़े में सीखी कुश्ती की बारीकियां बाद में परिवार के सहयोग से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे अखाड़े में प्रशिक्षण लिया। यहां उन्हें कुश्ती की तकनीक सीखने और प्रतियोगिताओं के लिए बेहतर तैयारी करने का मौका मिला। वर्ष 2008 में दिल्ली के हनुमान अखाड़े से उन्हें बुलावा आया। यहां उनकी मुलाकात ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार से हुई। वर्ष 2008 से 2011 तक उन्होंने उनके सानिध्य में प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वे सेना में शामिल हुए और मिशन ओलंपिक की तैयारी में जुट गए। 96 किलो में पहला स्थान, 84 किलो में गोल्ड वर्ष 2011 में जम्मू में आयोजित प्रतियोगिता के 96 किलो भार वर्ग में अविनाश ने प्रथम स्थान हासिल किया। इसके बाद पुणे में हुई फेडरेशन कुश्ती प्रतियोगिता के 84 किलो वर्ग में गोल्ड मेडल जीता। वर्ष 2012 से 2014 तक उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक और खिताब हासिल किए। 2016 में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लिए हुआ चयन सेना की ओर से वर्ष 2016 में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लिए उनका चयन हुआ। प्रतियोगिता में उन्हें विश्व रैंकिंग में सातवां स्थान मिला। वर्ष 2019 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद वर्ष 2021 में सर्विसेज टीम से जुड़कर खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी संभाली। जयपुर में राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता और वर्ष 2023 में गोवा नेशनल गेम्स में भी उन्होंने कंडीशनर कोच की भूमिका निभाई। फिलहाल वे पुणे स्थित इंडियन आर्मी के मिशन ओलंपिक कैंप से जुड़े हैं। हाल ही में हरियाणा के रोहतक में आयोजित यू-23 सीनियर फ्रीस्टाइल, ग्रीको-रोमन और महिला कुश्ती प्रतियोगिता के लिए भी उन्हें बिहार कुश्ती टीम का कोच चुना गया था। अब खिलाड़ियों को तैयार करने की जिम्मेदारी खुद खिलाड़ी के तौर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के बाद अब अविनाश खिलाड़ियों को तैयार करने में जुटे हैं। तीनों सेनाओं की कुश्ती टीम के कंडीशनर कोच के तौर पर वे खिलाड़ियों की फिटनेस और तैयारी पर काम कर रहे हैं। जापान में होने वाले एशियन गेम्स में भारतीय कुश्ती टीम के स्पोर्टिंग स्टाफ में शामिल होना उनके सफर की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है। रिटायरमेंट के बाद गांव में अखाड़ा खोलना चाहते हैं अविनाश का कहना है कि बिहार में प्रतिभाशाली पहलवानों की कमी नहीं है, लेकिन संसाधनों का अभाव उनकी प्रतिभा को प्रभावित करता है। उनका सपना है कि रिटायरमेंट के बाद चौसा में सुविधाओं से लैस अखाड़ा खोलें और गांव व आसपास के बच्चों को कुश्ती का प्रशिक्षण दें। वे कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो रास्ते की रुकावटें खुद किनारे हो जाती हैं। युवाओं को अपनी रुचि के क्षेत्र में ईमानदारी और मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए। बक्सर के अविनाश कुमार जापान में होने वाले एशियन गेम्स में भारतीय कुश्ती टीम के स्पोर्टिंग स्टाफ के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। बक्सर की मिट्टी में कुश्ती के दांव-पेच सीखने वाले अविनाश ने गांव में संसाधनों की कमी के बावजूद इस खेल में अपनी पहचान बनाई। तीन भाइयों और दो बहनों में मंझले अविनाश फिलहाल भारतीय सेना की सर्विसेज टीम से जुड़े हैं और तीनों सेनाओं की कुश्ती टीम के कंडीशनर कोच की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अविनाश चौसा नगर पंचायत क्षेत्र के रहने वाले हैं। शुरुआती पढ़ाई गांव में करने के बाद उन्होंने मुगलसराय से आगे की शिक्षा ली। बचपन से ही उन्हें कुश्ती का शौक था। परिवार को बिना बताए वे अखाड़े में जाकर दांव-पेच सीखते थे। जब परिवार को इसकी जानकारी हुई तो उन्हें डांट भी पड़ी। परिवार चाहता था इंजीनियर या अधिकारी बनें अविनाश के परिवार में किसी ने कुश्ती को करियर नहीं बनाया था। उनके रिश्तेदारों में इंजीनियर और डॉक्टर हैं, जबकि उनकी एक बहन आईएएस अधिकारी हैं। उनके पिता बैंक में अधिकारी थे और बड़े भाई ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। अविनाश बताते हैं कि परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई पूरी कर इंजीनियर या अधिकारी बनें। पड़ोसी और रिश्तेदार भी अक्सर कहते थे कि पहलवानी उनके परिवार के लिए ठीक नहीं है। लेकिन इन बातों ने उन्हें पीछे हटाने के बजाय और प्रेरित किया। उन्होंने 14 साल की उम्र में गांव में ही कुश्ती शुरू कर दी। 2006 में पहली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता, जीता गोल्ड शुरुआत में अविनाश ने छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। साल 2006 में पटना में पहली बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला। यहां उन्होंने गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद परिवार का भी उन्हें समर्थन मिलने लगा और कुश्ती का सफर आगे बढ़ता गया। गांव में कुश्ती के लिए संसाधनों की कमी थी। अविनाश ने स्टेशन रोड के पास एक बगीचे की जमीन खोदकर अखाड़ा बनाया था। बेहतर प्रशिक्षण के लिए वे करीब 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर सोनपा जाते थे। मुगलसराय रेलवे अखाड़े में सीखी कुश्ती की बारीकियां बाद में परिवार के सहयोग से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे अखाड़े में प्रशिक्षण लिया। यहां उन्हें कुश्ती की तकनीक सीखने और प्रतियोगिताओं के लिए बेहतर तैयारी करने का मौका मिला। वर्ष 2008 में दिल्ली के हनुमान अखाड़े से उन्हें बुलावा आया। यहां उनकी मुलाकात ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार से हुई। वर्ष 2008 से 2011 तक उन्होंने उनके सानिध्य में प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वे सेना में शामिल हुए और मिशन ओलंपिक की तैयारी में जुट गए। 96 किलो में पहला स्थान, 84 किलो में गोल्ड वर्ष 2011 में जम्मू में आयोजित प्रतियोगिता के 96 किलो भार वर्ग में अविनाश ने प्रथम स्थान हासिल किया। इसके बाद पुणे में हुई फेडरेशन कुश्ती प्रतियोगिता के 84 किलो वर्ग में गोल्ड मेडल जीता। वर्ष 2012 से 2014 तक उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक और खिताब हासिल किए। 2016 में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लिए हुआ चयन सेना की ओर से वर्ष 2016 में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लिए उनका चयन हुआ। प्रतियोगिता में उन्हें विश्व रैंकिंग में सातवां स्थान मिला। वर्ष 2019 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद वर्ष 2021 में सर्विसेज टीम से जुड़कर खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी संभाली। जयपुर में राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता और वर्ष 2023 में गोवा नेशनल गेम्स में भी उन्होंने कंडीशनर कोच की भूमिका निभाई। फिलहाल वे पुणे स्थित इंडियन आर्मी के मिशन ओलंपिक कैंप से जुड़े हैं। हाल ही में हरियाणा के रोहतक में आयोजित यू-23 सीनियर फ्रीस्टाइल, ग्रीको-रोमन और महिला कुश्ती प्रतियोगिता के लिए भी उन्हें बिहार कुश्ती टीम का कोच चुना गया था। अब खिलाड़ियों को तैयार करने की जिम्मेदारी खुद खिलाड़ी के तौर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के बाद अब अविनाश खिलाड़ियों को तैयार करने में जुटे हैं। तीनों सेनाओं की कुश्ती टीम के कंडीशनर कोच के तौर पर वे खिलाड़ियों की फिटनेस और तैयारी पर काम कर रहे हैं। जापान में होने वाले एशियन गेम्स में भारतीय कुश्ती टीम के स्पोर्टिंग स्टाफ में शामिल होना उनके सफर की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है। रिटायरमेंट के बाद गांव में अखाड़ा खोलना चाहते हैं अविनाश का कहना है कि बिहार में प्रतिभाशाली पहलवानों की कमी नहीं है, लेकिन संसाधनों का अभाव उनकी प्रतिभा को प्रभावित करता है। उनका सपना है कि रिटायरमेंट के बाद चौसा में सुविधाओं से लैस अखाड़ा खोलें और गांव व आसपास के बच्चों को कुश्ती का प्रशिक्षण दें। वे कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो रास्ते की रुकावटें खुद किनारे हो जाती हैं। युवाओं को अपनी रुचि के क्षेत्र में ईमानदारी और मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए।  

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