बालाघाट से करीब 85 किमी दूर जंगलों के बीच से गुजरते हुए हम अड़ोरी गांव पहुंचे। गांव के चौराहे पर चार बैगा आदिवासी महिलाएं आपस में बात कर रही थीं। दो महिलाओं ने कमर पर कपड़े के सहारे बच्चे लटका रखे थे।
हमने पूछा- बच्चे स्वस्थ हैं? जवाब मिला- “अभी तक तो ठीक हैं, आगे का पता नहीं।”
यहीं से बैहर विधानसभा क्षेत्र के वे गांव शुरू होते हैं, जहां आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बीते तीन महीने में एक संदिग्ध बीमारी से 32 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है।
मृत बच्चों की उम्र 0 से 16 साल के बीच है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मौतों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से कहीं ज्यादा है। आखिर क्या है ये बीमारी और अब हालात क्या हैं…पढ़िए इस रिपोर्ट में- दैनिक भास्कर की टीम प्रभावित गांवों में पहुंची तो बच्चों की बीमारी और मौतों का खौफ साफ दिखाई दिया। प्रशासन ने व्यवस्थाएं बढ़ाई हैं, लेकिन कई बुनियादी समस्याएं जस की तस नजर आती हैं।
मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आने के बाद जिला प्रशासन प्रभावित क्षेत्र में लगातार सक्रिय है। स्कूलों में चहल-पहल है, आंगनबाड़ियों में काम हो रहा है और बच्चों के लिए खाना बनाया जा रहा है। कई परिवारों तक साफ पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी की गई है। कुंडेकसा गांव के हाल
बच्चों के शरीर पर फफोले दिखे
अड़ोरी से करीब 7 किमी आगे कुंडेकसा गांव है। सुबह करीब 10 बजे यहां सड़क किनारे बने माध्यमिक स्कूल में दर्जनों महिलाएं बच्चों के साथ पहुंच रही थीं।
यहीं अस्थाई स्वास्थ्य केंद्र और दस्तावेज बनाने का कैंप लगाया गया है। ज्यादातर बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड और समग्र आईडी तक नहीं बनी थी।
अब दस्तावेज तैयार कराने के लिए महिलाओं की भीड़ लगी है। इसी स्वास्थ्य केंद्र में बीमार बच्चे भी लगातार पहुंच रहे हैं। कई बच्चों के शरीर पर दाने और फफोले दिखाई दिए। अब डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग कर रहे हैं
रजिस्टर में गुरुवार सुबह 11.30 बजे तक 15 बच्चों के नाम दर्ज हो चुके थे। पिछले दिन 26 नाम दर्ज थे। स्वास्थ्यकर्मियों ने कैमरे पर बात करने से इनकार कर दिया, लेकिन बताया कि यहां रोज औसतन 20 बच्चे पहुंच रहे हैं।
इसी तरह का अस्थाई स्वास्थ्य केंद्र मच्छोरदा में भी बनाया गया है, जबकि सोनगुड्डा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी रोज करीब 20 बच्चे पहुंच रहे हैं। यानी तीन केंद्रों पर प्रतिदिन करीब 60 प्रभावित बच्चे पहुंच रहे हैं।
बिरसा ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर निमिष गौतम के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग रोज 100 से 150 घरों में पहुंचकर बच्चों की डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग कर रहा है। प्रभावित गांवों में 18 से 20 गांव प्रमुख हैं। जमीन पर गद्दे बिछाकर इलाज, खिड़की से लटक रही स्लाइन
कुंडेकसा के अस्थाई स्वास्थ्य केंद्र में दो बेड लगाए गए हैं। चार गद्दे जमीन पर बिछे हैं। बेड भरे हुए हैं। खिड़की से स्लाइन की बोतलें लटकाकर बच्चों को इलाज जारी है।
यहां उसरी गांव से आए पन्ने मरकाम मिले। उनकी तीन साल की बेटी तानिया भर्ती थी। पत्नी के पास एक साल का बेटा बैठा था।
पन्ने ने बताया कि बेटे को भी करीब 15 दिन से बुखार है। दोनों बच्चों के शरीर पर दाने निकले थे और सर्दी-जुकाम के साथ तेज बुखार था। बेटा कुछ ठीक हुआ है, लेकिन बेटी का इलाज चल रहा है।
पन्ने का कहना है कि पत्नी की गर्भावस्था के दौरान पोषण आहार नहीं मिला। बच्चों को टीके भी नहीं लगे। पहले जन्म प्रमाणपत्र मांगा गया था, लेकिन अब बीमारी सामने आने के बाद आधार, जन्म प्रमाणपत्र, टीकाकरण और पानी की व्यवस्था तेजी से शुरू हुई है। जिन कामों की जरूरत पहले थी, अब उनके लिए कैंप
कुंडेकसा के स्कूल परिसर में बने सभागार में करीब 40 से 50 महिलाएं मौजूद थीं। टेबल पर कंप्यूटर लगे थे। अधिकारी बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र और आधार कार्ड बना रहे थे, साथ ही समग्र आईडी में नाम जोड़े जा रहे थे।
सम्म्हारी बाई ने बताया कि उनके 8 और 9 साल के दो बच्चे हैं। दोनों के आधार कार्ड एक दिन पहले बने हैं। अब समग्र आईडी में नाम जुड़वाने आई हैं।
बाजराहीं ने बताया कि उनकी तीन साल की बेटी दिलेश्वरी का आधार कार्ड भी कल ही बना है। उनका कहना है कि गर्भावस्था के दौरान पोषण आहार नहीं मिला और गांव में साफ पानी की भी समस्या है।
सगन अपनी डेढ़ साल की बेटी प्रिया का आधार कार्ड बनवाने पहुंची थीं। उन्होंने बताया कि एक दिन पहले भी आई थीं, लेकिन भीड़ के कारण काम नहीं हो पाया। कोरका और बोंदारी गांव का नजारा
मृत बेटे के पिता बोले- न पोषण आहार मिला, न राशन
कुंडेकसा के बाद टीम कोरका और फिर बोंदारी गांव पहुंची। यही वह गांव है, जहां 29 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहुंचे थे और मृत बच्चों के परिजनों से मिले थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी गांव में सबसे ज्यादा आठ बच्चों की मौत हुई है। यहां 32 मृत बच्चों के नाम का स्मारक भी बनाया जा रहा है।
बेटे को खो चुके चैन सिंह मरकाम ने बताया कि मृत बच्चों को सिर्फ एक टीका लगा था, उसके बाद टीकाकरण नहीं हुआ। गर्भवती महिलाओं को पोषण आहार और राशन भी नहीं मिलता था। आसपास स्वास्थ्य केंद्र नहीं थे।
चैन सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने पांच साल के बेटे सचिन को खोया है। बच्चा दो दिन बालाघाट जिला अस्पताल में भर्ती रहा। हालत में सुधार नहीं होने पर उसे गोंदिया के निजी अस्पताल ले गए, जहां 31 जुलाई को उसकी मौत हो गई। आज भी नाले का पानी पी रहे ग्रामीण
बोंदारी में करीब 60 साल के दसरू धुर्वे बर्तन लेकर घाटी की ओर जाते मिले। हम उनके साथ नीचे पहुंचे तो बीजाखोद नाम का नाला बह रहा था। दसरू ने इसी नाले से पानी भरा।
उन्होंने बताया कि वह हर दिन इसी नाले का पानी पीने के लिए भरते हैं। गांव के दूसरे लोग भी यही पानी इस्तेमाल करते हैं। उनके घर तक पीने का पानी नहीं पहुंचता। मरछुदा गांव की स्थिति
अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद फिर आया तेज बुखार
मरछुदा गांव में पांच साल के अंकित मरावी की जानकारी मिली। करीब 15 दिन पहले उसकी तबीयत बिगड़ी थी। उसे बालाघाट जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
10 सितंबर को स्वस्थ बताकर डिस्चार्ज किया गया। घर लौटते ही उसे फिर तेज बुखार आने लगा।
बच्चे की नानी और गांव की सरपंच जिलसो बाई ने बताया कि अंकित के माता-पिता खेत गए हैं और वह उनके घर पर है। अब उसे दोबारा इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की तैयारी है। 37 हजार की स्क्रीनिंग, 490 बच्चे इलाज के बाद घर भेजे
बालाघाट के चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर डॉ शत्रुघ्न सिंह दाहिया के मुताबिक प्रभावित क्षेत्र में अब तक 37 हजार महिला, पुरुष और बच्चों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है।
करीब साढ़े चार हजार लोगों का उपचार किया गया है। ‘स्वदेशी बैगा स्वास्थ्य परीक्षण अभियान’ के तहत पीएचई, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, राजस्व और पंचायत विभाग की टीमें काम कर रही हैं। स्वास्थ्य विभाग की 56 टीमें बनाई गई हैं।
इनमें करीब 200 कर्मचारी और 40 डॉक्टर शामिल हैं। बाकी नर्स, आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता हैं। सीएमएचओ के मुताबिक फिलहाल मरीजों की संख्या कम हुई है। 130 बेड में 57 बच्चे भर्ती हैं, जबकि 490 बच्चों का इलाज कर उन्हें स्वस्थ होने के बाद घर भेजा जा चुका है। सीनियर जर्नलिस्ट बोले- नक्सल प्रभावित होने का तर्क पर्याप्त नहीं
प्रभावित क्षेत्र के जानकार और सीनियर जर्नलिस्ट रफी अंसारी के मुताबिक मौतों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से ज्यादा हो सकता है।
उनका कहना है कि इलाके में लंबे समय से स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद सीमित रही हैं। बच्चों का टीकाकरण और गर्भवती महिलाओं-बच्चों को पोषण आहार जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं भी प्रभावित रही हैं। 101 सैंपल में 32 मीजल्स पॉजिटिव, मलेरिया के 50 केस
डॉ. दाहिया के मुताबिक NCDC दिल्ली और NSCB जबलपुर की टीमों ने मौके पर 10-10 सैंपल लिए। NIV पुणे को 20 और ICMR जबलपुर को 24 सैंपल भेजे गए। कुल 101 मीजल्स सैंपल में 32 बच्चे पॉजिटिव मिले।
मलेरिया के लिए भोपाल और दिल्ली भेजे गए 64 सैंपल में 50 पॉजिटिव आए। डेंगू के 28 सैंपल में दो पॉजिटिव मिले, जबकि एक सैंपल चिकनगुनिया का पॉजिटिव आया।
पानी के भी 14 सैंपल पुणे और कोलकाता भेजे गए। इनमें पांच के परिणाम पॉजिटिव आए। अधिकारियों के मुताबिक नालों के पानी में एडिनोवायरस मिला है, जो स्किन इंफेक्शन और दस्त जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है।
सीएमएचओ का कहना है कि मौतों को सिर्फ मीजल्स से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। मलेरिया, उल्टी-दस्त और कुपोषण भी इसमें कारक रहे हैं।
जनजातीय कार्य विभाग का दावा है कि करीब 6 हजार महिलाओं को हर महीने 90 लाख रुपए का पोषण आहार दिया जाता है। वहीं, प्रभावित गांवों में मिली महिलाओं का कहना है कि उन्हें गर्भावस्था के दौरान पोषण आहार नहीं मिला। प्रभावित क्षेत्र में फिलहाल टीकाकरण नहीं
जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. परितोष शुक्ला ने बताया कि मीजल्स टीकाकरण अभियान 21 अगस्त से चल रहा है। अब तक करीब 22 हजार बच्चों का टीकाकरण किया जा चुका है। अभियान में 9 माह से 15 साल तक के बच्चों को शामिल किया गया है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल मुख्य प्रभावित क्षेत्र में टीकाकरण नहीं किया जा रहा है। एक्टिव इंफेक्शन वाले क्षेत्र में टीकाकरण नहीं किया जा सकता। आसपास के क्षेत्रों में टीकाकरण कराया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे हालात सामान्य होंगे, प्रभावित क्षेत्र में भी टीकाकरण शुरू किया जाएगा। पहले टीकाकरण हुआ या नहीं पता नहीं
जब उनसे पूछा गया कि जिन क्षेत्रों में बच्चों की मौत हुई, वहां पहले टीकाकरण हुआ था या नहीं, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। कलेक्टर बोले- कई बीमारियां मौत की वजह
कलेक्टर कुमार सत्यम ने कहा कि प्रशासन करीब डेढ़ महीने से लगातार स्थिति की मॉनिटरिंग कर रहा है। फिलहाल सर्दी, खांसी और बुखार का सीजन है, लेकिन कोई गंभीर नया केस सामने नहीं आ रहा। मौत का आंकड़ा 32 ही है।
मुख्यमंत्री ने इन्हीं मृतकों के परिजन को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि मौतों के पीछे कोई एक कारण नहीं है। अलग-अलग बीमारियां इसकी वजह हैं।
लोगों का इलाज के लिए अस्पताल आने से बचना भी एक समस्या है। परिवहन की दिक्कत के कारण फिलहाल एंबुलेंस लगाई गई हैं और स्थानीय ट्रांसपोर्टर्स से बात कर समाधान निकाल रहे हैं।
नक्सलवाद के कारण लंबे समय तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना मुश्किल रहा। क्षेत्र करीब आठ महीने से नक्सल मुक्त है और लगातार काम किया जा रहा है, लेकिन इतनी बड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्या सामने आने का अनुमान नहीं था।

