व्र​तियों ने उगते चंद्र का दर्शन कर मनाया चौठ चंद्र

व्र​तियों ने उगते चंद्र का दर्शन कर मनाया चौठ चंद्र

भास्कर न्यूज|मधुबनी जिले भर लोगों ने उगते चंद्र का दर्शन कर चौठ चंद्र त्यौहार को मनाया। यह अनोखा इस लिए भी है कि उगते चांद को देखना ऐसे तो अशुभ माना गया है। लेकिन चौठ चंद्र के दिन मिथिला में लोग उगते चंद्र का दर्शन कर अपने व्रत को खोलते है। ऐसे तो चौठ चंद्र को लेकर कई तरह के किस्से है। उन्ही में से एक किस्सा यह है कि पुरातन मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दौरान चंद्रमा को कलंक लगा था, इसीलिए इस दिन चांद को देखना पूरी तरह से मना किया जाता है। बाकी त्योहारों की तरह त्यौहार भी अलग-अलग मान्यताओं से परिपूर्ण है। मिथिला में बहुत प्राचीन मान्यता है कि जब चंद्रमा गणेश के विचित्र रूप को देखकर हंसने लगे तो गणेश ने श्राप दिया कि जिस सुंदरता पर तुम्हें घमंड है, आज के बाद तुम्हारी सुंदरता छीन्न होने लगेगी। यह बात सुनते ही चंद्रदेव का अभिमान खत्म हो गया और वह भगवान गणेश के सामने क्षमा मांगने लगे। भगवान गणेश को खुश करने के लिए भाद्रपद की चतुर्थी को गणेश की पूजा की तथा उनके लिए व्रत रखा। भगवान गणेश के लिए चंद्र देव को पश्चाताप करते हुए देखकर भगवान गणेश ने चंद्रदेव को माफ कर दिया और कहा कि वह अपने किये को वापस तो नहीं ले सकते, परंतु वह इसका असर कम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि चंद्र देव के झूठे आरोप से किसी व्यक्ति को बचना है तो उसे गणेश चतुर्थी की शाम को चंद्रमा की पूजा भी करनी है, इस तरह से वह कलंक से बच जाएगा। इस तरह करने से व्यक्ति के जीवन पर लगने वाला कलंक निष्कलंक हो जाएगा। उसी समय से गणेश चतुर्थी के दिन चौरचन भी मनाया जाता है। मिथिला में यह पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मिथिला के लोग जहां प्रदेश मे भी रहकर इस पर्व को धूमधाम से मनाते है। घर के श्रेष्ठ महिला इस पूजा को करती है, घर के श्रेष्ठ पुरुष खीर के प्रसाद जिसे मरर कहते है इसे हाथ से काट कर दो भागो में करते है। पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि दही, फल लेकर वर्ती चंद्रमा को अर्घ देती है, इसके उपरांत अन्य सदस्य भी सुखी जीवन की कामना करते हैं। भास्कर न्यूज|मधुबनी जिले भर लोगों ने उगते चंद्र का दर्शन कर चौठ चंद्र त्यौहार को मनाया। यह अनोखा इस लिए भी है कि उगते चांद को देखना ऐसे तो अशुभ माना गया है। लेकिन चौठ चंद्र के दिन मिथिला में लोग उगते चंद्र का दर्शन कर अपने व्रत को खोलते है। ऐसे तो चौठ चंद्र को लेकर कई तरह के किस्से है। उन्ही में से एक किस्सा यह है कि पुरातन मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दौरान चंद्रमा को कलंक लगा था, इसीलिए इस दिन चांद को देखना पूरी तरह से मना किया जाता है। बाकी त्योहारों की तरह त्यौहार भी अलग-अलग मान्यताओं से परिपूर्ण है। मिथिला में बहुत प्राचीन मान्यता है कि जब चंद्रमा गणेश के विचित्र रूप को देखकर हंसने लगे तो गणेश ने श्राप दिया कि जिस सुंदरता पर तुम्हें घमंड है, आज के बाद तुम्हारी सुंदरता छीन्न होने लगेगी। यह बात सुनते ही चंद्रदेव का अभिमान खत्म हो गया और वह भगवान गणेश के सामने क्षमा मांगने लगे। भगवान गणेश को खुश करने के लिए भाद्रपद की चतुर्थी को गणेश की पूजा की तथा उनके लिए व्रत रखा। भगवान गणेश के लिए चंद्र देव को पश्चाताप करते हुए देखकर भगवान गणेश ने चंद्रदेव को माफ कर दिया और कहा कि वह अपने किये को वापस तो नहीं ले सकते, परंतु वह इसका असर कम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि चंद्र देव के झूठे आरोप से किसी व्यक्ति को बचना है तो उसे गणेश चतुर्थी की शाम को चंद्रमा की पूजा भी करनी है, इस तरह से वह कलंक से बच जाएगा। इस तरह करने से व्यक्ति के जीवन पर लगने वाला कलंक निष्कलंक हो जाएगा। उसी समय से गणेश चतुर्थी के दिन चौरचन भी मनाया जाता है। मिथिला में यह पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मिथिला के लोग जहां प्रदेश मे भी रहकर इस पर्व को धूमधाम से मनाते है। घर के श्रेष्ठ महिला इस पूजा को करती है, घर के श्रेष्ठ पुरुष खीर के प्रसाद जिसे मरर कहते है इसे हाथ से काट कर दो भागो में करते है। पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि दही, फल लेकर वर्ती चंद्रमा को अर्घ देती है, इसके उपरांत अन्य सदस्य भी सुखी जीवन की कामना करते हैं।  

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