संस्कार और समाज की मूल पहचान सुरक्षित रहनी चाहिए
आधुनिक शिक्षा, नई तकनीक और व्यापार के बदलते अवसरों के साथ आगे बढऩे वाली नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक संस्कारों से भी जोड़े रखना जरूरी है। परंपरा का अर्थ पीछे लौटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढऩा है। समय के साथ साधन, जीवनशैली और सोच बदल सकती है, लेकिन संस्कार और समाज की मूल पहचान सुरक्षित रहनी चाहिए।
समाज के लोगों ने अपने विचार साझा किए
आईमाता के 611वें अवतरण दिवस एवं भादवी बीज के अवसर पर राजस्थान पत्रिका की ओर से नई पीढ़ी और पुरानी परंपराएं: क्या बदलना चाहिए, क्या बचाना जरूरी है? विषय पर आयोजित परिचर्चा में सीरवी समाज के लोगों ने अपने विचार साझा किए।
समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान
परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय के साथ व्यापार, जीवनशैली और सोच में परिवर्तन स्वाभाविक है। युवा डिजिटल तकनीक और आधुनिक अवसरों को अपनाएं, लेकिन ईमानदारी, मेहनत, संस्कार, पारिवारिक मूल्य और सामाजिक एकता जैसी परंपराओं को हर हाल में आगे बढ़ाना जरूरी है। आईमाता की शिक्षाएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान से भी जुड़ी हैं।
आई-पंथ की प्रमुख आराध्य शक्ति हैं आईमाता
सीरवी समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ के अध्यक्ष एवं मुसालिया निवासी लक्ष्मणराम सोलंकी सीरवी ने कहा कि सीरवी समाज की धार्मिक परंपरा में आईमाता को आराध्य देवी और आई-पंथ की प्रमुख आराध्य शक्ति के रूप में श्रद्धा से माना जाता है। समाज की मान्यता के अनुसार आईमाता का अवतरण गुजरात के अम्बापुर में हुआ था। बाद में उनका संबंध राजस्थान के बिलाड़ा से जुड़ा, जहां आईमाता की बडेर और अखंड ज्योति समाज की प्रमुख आस्था के केंद्र माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि भादवा सुदी बीज का पर्व भी आईमाता की परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी
बगड़ी नगर निवासी वेनाराम सोलंकी सीरवी ने कहा कि सीरवी समाज ने मेहनत, ईमानदारी और भरोसे के आधार पर व्यापार के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। आज युवा डिजिटल तकनीक और आधुनिक व्यापार पद्धतियों को तेजी से अपना रहे हैं, जो समय की आवश्यकता भी है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता को अपनाते समय मूल संस्कारों से दूरी नहीं बननी चाहिए। आईमाता की शिक्षाओं और समाज की परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। परंपराओं का मूल उद्देश्य समाज को जोडऩा और अच्छे संस्कार देना है, इसलिए उनके मूल मूल्यों को सुरक्षित रखना जरूरी है।
परंपराएं समाज को जोड़ती हैं
कराड़ी निवासी बाबूलाल आगलेचा सीरवी ने कहा कि आईमाता से जुड़ी मान्यताओं में सत्य, सदाचार, सेवा, मेहनत और सामाजिक सद्भाव जैसे मूल्यों को विशेष महत्व दिया गया है। यही कारण है कि आईमाता की परंपरा समाज के लिए केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हर परंपरा को केवल पुराना मानकर छोड़ देना उचित नहीं है। जो परंपराएं समाज को जोड़ती हैं, आपसी सद्भाव बढ़ाती हैं और नई पीढ़ी को सकारात्मक संस्कार देती हैं, उन्हें और मजबूत किया जाना चाहिए।
संस्कारों की पहली पाठशाला है परिवार
बागावास निवासी हरीश काग सीरवी ने कहा कि परिवार बच्चों के संस्कारों की पहली पाठशाला है। बच्चों को आईमाता, समाज के इतिहास, भाषा, रीति-रिवाज और संस्कृति से जोडऩे में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि परिवार अपनी अगली पीढ़ी को इन मूल्यों से परिचित कराएगा तो परंपराओं का संरक्षण स्वाभाविक रूप से होता रहेगा। उन्होंने कहा कि समय की जरूरत के अनुसार सकारात्मक बदलावों को स्वीकार करना चाहिए। विशेष रूप से बेटियों की शिक्षा, महिलाओं की सामाजिक भागीदारी और युवाओं को आधुनिक अवसरों से जोडऩे पर समाज को अधिक जोर देना होगा।
बदलाव और परंपरा के बीच बने संतुलन
परिचर्चा में यह विचार प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि नई पीढ़ी को केवल परंपराएं सौंपना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पीछे के मूल्यों और उद्देश्य को भी समझाना जरूरी है। आधुनिकता और परंपरा को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। वक्ताओं ने कहा कि समाज तभी मजबूत बनेगा, जब नई पीढ़ी तकनीक और आधुनिक शिक्षा के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी पहचान, संस्कार और सामाजिक मूल्यों को भी साथ लेकर चलेगी। यही संतुलन आने वाले समय में परंपराओं को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखेगा।

