बालाघाट में शुक्रवार को मारबत का पर्व मनाया गया। इस बार बालाघाट में निकाली गई मारबत की थीम आदिवासी इलाके में ‘राष्ट्रीय मानव’ कहे जाने वाले बैगा आदिवासी बच्चों की मौत और महीनों के आंदोलन के बाद भी नहीं हट पाई बुढ़ी शराब भट्टी रही। हर साल बुराई के प्रतीक मारबत पर बुढ़ी क्षेत्र की मुख्य समस्याओं पर व्यंग्य करती मारबत निकाली जाती है। इस बार क्षेत्र के युवाओं ने 30 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत और बुढ़ी शराब भट्टी की समस्या को लेकर मारबत निकाली। क्षेत्रीय लोगों ने इसका जुलूस निकाला और इसे भटेरा क्षेत्र में शहर की आखिरी सीमा पर ले जाकर जलाया जाएगा। किसानों के पारंपरिक पर्व पोला के दूसरे दिन मारबत का पर्व मनाया जाता है। इसमें बुराई के प्रतीक मारबत को निकालकर शहर की सीमा पर जलाया जाता है। बालाघाट में दशकों से बुढ़ी और ढीमरटोला में बुराई के प्रतीक के तौर पर मारबत निकाली जाती है। इसमें वार्ड के बुजुर्ग, युवा और बच्चे बाजे-गाजे के साथ मारबत को शहर में घुमाते हुए शहरी सीमा तक ले जाते हैं। वहां इसका दहन किया जाता है। इस दौरान लोग मारबत से बुराइयों को ले जाने का शोर भी करते हैं। बुराई के प्रतीक के रूप में मारबत का निर्माण कर उसे शहर भर में घुमाकर जलाया जाता है। कई घरों में मिट्टी की मारबत बनाकर उसे गांव की सीमा से बाहर ले जाकर विसर्जित किया जाता है। बालाघाट जिला महाराष्ट्र से लगा हुआ है। महाराष्ट्र में भी मनाया जाता है महाराष्ट्र में किसानों के पोला पर्व पर बैलों की पूजा की जाती है और उसके दूसरे दिन मारबत का पर्व मनाया जाता है। पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के नागपुर में मारबत का ऐतिहासिक आयोजन होता है, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों से मारबत निकाली जाती है। इसका एक छोटा स्वरूप बालाघाट में भी देखने को मिलता है। क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि मारबत की परंपरा वर्षों पुरानी है। समय के साथ इसका स्वरूप बदला है, लेकिन आज भी यह परंपरा निभाई जा रही है।

