भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता इस बार ऐसे दौर में हो रही है, जब दुनिया की राजनीति काफी उलझी हुई है। यूरोप और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में आ रही रुकावटें और बड़े देशों की बढ़ती संरक्षणवादी नीतियां भारत के सामने अलग तरह की चुनौती खड़ी कर रही हैं। ऐसे समय में पूर्व G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने भारत को ब्रिक्स में बेहद संतुलित और परिपक्व भूमिका निभाने की सलाह दी है।
इंडिया टुडे से बातचीत में अमिताभ कांत ने कहा कि भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स का अंतिम दस्तावेज पश्चिम विरोधी रुख वाला न दिखाई दे। उनके मुताबिक, भारत की अध्यक्षता का मुख्य लक्ष्य अलग-अलग देशों के बीच सहमति बनाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अमेरिका, यूरोप और चीन के साथ एक साथ काम करना होगा।
कांत ने ब्रिक्स को अप्रासंगिक मानने वाली आलोचनाओं को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह समूह भू-राजनीतिक और आर्थिक, दोनों ही नजरिए से महत्वपूर्ण बना हुआ है। विस्तारित ब्रिक्स में अब 11 सदस्य हैं और इन देशों की हिस्सेदारी दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में करीब 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार में लगभग एक चौथाई बताई जाती है।
गौरतलब है कि भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा समेत कई प्रमुख नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है। ऐसे में भारत के लिए अलग-अलग हितों वाले देशों को एक मंच पर साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा।
अमिताभ कांत ने कहा कि बहुपक्षीय व्यवस्था का आधार सहमति है और भारत को अपनी अध्यक्षता में इसी सिद्धांत को आगे रखना चाहिए। उनका मानना है कि भारत को किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना होगा। उन्होंने भारत की इस नीति को बहु-संरेखण पर आधारित बताया है, जिसमें किसी एक पक्ष का चुनाव करने के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ब्रिक्स को लेकर कई बार संदेह और आलोचना जाहिर कर चुके हैं। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया का संघर्ष भी समूह के भीतर मतभेदों को बढ़ा सकता है। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देश एक ही मंच पर मौजूद होंगे, जबकि इन देशों के बीच क्षेत्रीय तनाव लंबे समय से बना हुआ है।
कांत ने सुझाव दिया कि भारत को ब्रिक्स के एजेंडे को बहुत ज्यादा भू-राजनीतिक विवादों की तरफ नहीं जाने देना चाहिए। इसके बजाय व्यापार, निवेश, विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर पड़ा है, इसलिए इन मुद्दों पर ध्यान देना पूरे वैश्विक दक्षिण के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
बता दें कि भारत के लिए ब्रिक्स केवल कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है। ऐसे में अध्यक्षता के दौरान भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अलग-अलग शक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाए और ब्रिक्स को टकराव के बजाय सहयोग का मंच बनाए रखे, जिससे भारत की वैश्विक भूमिका और मजबूत हो सके।

