जन्माष्टमी पर बच्चों ने कान्हा को अर्पित की बांसुरी:300 साल पुरानी परंपरा के साथ तीन दिवसीय मेले का आगाज, रात में होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम

जन्माष्टमी पर बच्चों ने कान्हा को अर्पित की बांसुरी:300 साल पुरानी परंपरा के साथ तीन दिवसीय मेले का आगाज, रात में होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम

पूर्णिया के बड़हरा कोठी के सुखसेना गांव में श्री कृष्ण जन्माष्टमी त्योहार करीब 300 साल से मनाया जा रहा है। गुरुवार की रात 12:59 बजे शंखनाद, घंटियों की गूंज और जयकारों के बीच भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। इस मौके पर माता देवकी की गोद से भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप को माता यशोदा की गोद में सौंपने की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। सुखसेना गांव की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा यह है कि यहां बाल-गोपाल को छोटे-छोटे बच्चों के हाथों से चांदी की बांसुरी अर्पित करवाई जाती है। मान्यता है कि जिन दंपतियों की संतान संबंधी या अन्य मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे दूर-दूर से अपने बच्चों को लेकर यहां बांसुरी चढ़ाने पहुंचते हैं। धार्मिक विश्वास है कि बाल रूप में कान्हा को बांसुरी भेंट करने से बच्चे तीव्र बुद्धि और प्रतिभाशाली होते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूजा समिति की ओर से मंदिर परिसर में ही ₹50 से लेकर ₹200 तक की चांदी की बांसुरी उपलब्ध कराई जाती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और तीन दिवसीय भव्य मेला

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में सुखसेना गांव में तीन दिनों का भव्य मेला आयोजित किया गया है। मेले में विभिन्न प्रकार के झूले, खान-पान की दुकानें और खिलौनों के स्टॉल बच्चों और परिवारों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इसके साथ ही रात में भव्य जागरण, भजन संध्या और श्री कृष्ण नाट्य कला परिषद के तत्वावधान में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है, जिसमें स्थानीय युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक पूरे गांव की सक्रिय सहभागिता देखने को मिल रही है। पूर्वज सैकड़ों वर्षों से इसे मनाते आ रहे : ग्रामीण

सुखसेना गांव के किशोर कुमार मिश्र बताते हैं कि सुखसेना में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव प्राचीन है। हमारे पूर्वज सैकड़ों वर्षों से इसे मनाते आ रहे हैं। भगवान श्री कृष्ण को बांसुरी सर्वाधिक प्रिय है, इसलिए सभी श्रद्धालु बच्चों के हाथों से श्रद्धापूर्वक बांसुरी अर्पित करवाते हैं ताकि बच्चे प्रभु की भक्ति में रमें और उनका जीवन संवरे।
बाहर रहने वाले भी गांव पहुंचते : कमलानंद

सुखसेना निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक कमलानंद झा बताते हैं कि हमारे बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा करीब 250 से 300 साल पुरानी है। जब हम छोटे थे, तब यह मंदिर फूस के घर में हुआ करता था। जिनकी भी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, वे आभार स्वरूप यहां बांसुरी चढ़ाने आते हैं। बाहर रहने वाले गांव के लोग भी इस अवसर पर जरूर पहुंचते हैं।
नाट्य कला-सांस्कृतिक कार्यक्रम

ग्रामीण अशोक कुमार झा का कहना है कि यह उत्सव आज से नहीं बल्कि प्राचीन काल से चल रहा है। यहां भगवान को बांसुरी और लड्डू का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा बच्चों और बाहर से आए कलाकारों की ओर से नाट्य कला-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सुंदर प्रस्तुति दी जाती है, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय बना रहता है। पूर्णिया के बड़हरा कोठी के सुखसेना गांव में श्री कृष्ण जन्माष्टमी त्योहार करीब 300 साल से मनाया जा रहा है। गुरुवार की रात 12:59 बजे शंखनाद, घंटियों की गूंज और जयकारों के बीच भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। इस मौके पर माता देवकी की गोद से भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप को माता यशोदा की गोद में सौंपने की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। सुखसेना गांव की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा यह है कि यहां बाल-गोपाल को छोटे-छोटे बच्चों के हाथों से चांदी की बांसुरी अर्पित करवाई जाती है। मान्यता है कि जिन दंपतियों की संतान संबंधी या अन्य मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे दूर-दूर से अपने बच्चों को लेकर यहां बांसुरी चढ़ाने पहुंचते हैं। धार्मिक विश्वास है कि बाल रूप में कान्हा को बांसुरी भेंट करने से बच्चे तीव्र बुद्धि और प्रतिभाशाली होते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूजा समिति की ओर से मंदिर परिसर में ही ₹50 से लेकर ₹200 तक की चांदी की बांसुरी उपलब्ध कराई जाती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और तीन दिवसीय भव्य मेला

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में सुखसेना गांव में तीन दिनों का भव्य मेला आयोजित किया गया है। मेले में विभिन्न प्रकार के झूले, खान-पान की दुकानें और खिलौनों के स्टॉल बच्चों और परिवारों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इसके साथ ही रात में भव्य जागरण, भजन संध्या और श्री कृष्ण नाट्य कला परिषद के तत्वावधान में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है, जिसमें स्थानीय युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक पूरे गांव की सक्रिय सहभागिता देखने को मिल रही है। पूर्वज सैकड़ों वर्षों से इसे मनाते आ रहे : ग्रामीण

सुखसेना गांव के किशोर कुमार मिश्र बताते हैं कि सुखसेना में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव प्राचीन है। हमारे पूर्वज सैकड़ों वर्षों से इसे मनाते आ रहे हैं। भगवान श्री कृष्ण को बांसुरी सर्वाधिक प्रिय है, इसलिए सभी श्रद्धालु बच्चों के हाथों से श्रद्धापूर्वक बांसुरी अर्पित करवाते हैं ताकि बच्चे प्रभु की भक्ति में रमें और उनका जीवन संवरे।
बाहर रहने वाले भी गांव पहुंचते : कमलानंद

सुखसेना निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक कमलानंद झा बताते हैं कि हमारे बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा करीब 250 से 300 साल पुरानी है। जब हम छोटे थे, तब यह मंदिर फूस के घर में हुआ करता था। जिनकी भी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, वे आभार स्वरूप यहां बांसुरी चढ़ाने आते हैं। बाहर रहने वाले गांव के लोग भी इस अवसर पर जरूर पहुंचते हैं।
नाट्य कला-सांस्कृतिक कार्यक्रम

ग्रामीण अशोक कुमार झा का कहना है कि यह उत्सव आज से नहीं बल्कि प्राचीन काल से चल रहा है। यहां भगवान को बांसुरी और लड्डू का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा बच्चों और बाहर से आए कलाकारों की ओर से नाट्य कला-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सुंदर प्रस्तुति दी जाती है, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय बना रहता है।  

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