संगीतमय हनुमान चालीसा का पाठ
कथा के अंतिम दिन कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत हवन से हुई। कथा वाचिका सुभद्रा कृष्ण के सान्निध्य में आयोजित हवन में श्रद्धालुओं ने आहुतियां देकर सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। इसके बाद संगीतमय हनुमान चालीसा का पाठ हुआ, जिसमें श्रद्धालु भक्तिरस में डूब गए।
भगवान राम के जीवन प्रसंगों का वर्णन
समापन दिवस पर कथा वाचिका सुभद्रा कृष्ण ने राम-रावण युद्ध और भगवान राम के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि रावण शिव का परम भक्त और वेदों का ज्ञाता था, लेकिन उसके जीवन में अहंकार का प्रवेश हुआ। राम के सामने रावण शत्रु के रूप में खड़ा था और दोनों के बीच धर्म-अधर्म का निर्णायक युद्ध हुआ। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने अपने पूरे जीवन में त्याग किया और सदैव दूसरों को दिया। राम का जीवन त्याग, मर्यादा और समर्पण का प्रतीक है। रामकथा का श्रवण मनुष्य के भीतर वैराग्य और आत्मचिंतन का भाव जगाता है। उन्होंने कहा कि जहां राम का नाम होता है, वहां हनुमान की उपस्थिति स्वत: हो जाती है।
भगवान राम और हनुमान के जयकारे लगाए
कथा के दौरान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने के प्रसंग का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया। राम के अयोध्या आगमन पर उमड़े आनंद और उल्लास को भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। कहीं राम बन के, कहीं श्याम बन के चले आना प्रभु जी, चले आना… जैसे भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। सुभद्रा कृष्ण ने कहा कि भगवान राम पूर्ण परमात्मा हैं और उनका जीवन मानव समाज को मर्यादा, त्याग, धर्म तथा कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान राम और हनुमान के जयकारे लगाए।


