औरंगाबाद जिले में इन दिनों अधिकांश खेतों में धान की फसल में कल्ले निकलने यानी टिलरिंग अवस्था में है। फसल में शीथ ब्लाइट और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट(जीवाणु झुलसा) रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। सिरिस कृषि विज्ञान केंद्र की कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रतिभा कुमारी और पंकज कुमार सिन्हा ने किसानों को समय रहते रोग की पहचान कर नियंत्रण के उपाय करने की सलाह दी है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार दोनों बीमारियां धान की फसल के लिए गंभीर है। शुरुआती अवस्था में इनकी पहचान नहीं होने पर रोग तेजी से फैल सकता है और उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए। शीथ ब्लाइट फफूंद जनित रोग है। इसके प्रकोप में पानी की सतह के पास तने या पत्ती के आवरण पर हरे-भूरे रंग के अंडाकार अथवा अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे इनका आकार बढ़ता है और बीच का हिस्सा सफेद-राख जैसा, जबकि किनारे भूरे या बैंगनी रंग के हो जाते हैं। पत्तियों पर धब्बे दिखें तो तुरंत करें नियंत्रण रोग बढ़ने पर धब्बे ऊपर की पत्तियों तक फैल जाते हैं। इससे पूरी टिलर या पत्ती सूख सकती है। पौधे की वृद्धि एवं दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। कृषि वैज्ञानिकों ने शीथ ब्लाइट के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5% एससी 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी है। इसके अलावा प्रोपीकोनाजोल 25% ईसी 200 से 300 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग किया जा सकता है। वैलिडामाइसिन 3% एल 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से भी प्रभावी माना गया है। वहीं एजोक्सीस्ट्रोबिन 11% + टेबुकोनाजोल 18.3% एससी 300 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 1 से 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। किसानों को रोग की स्थिति के अनुसार अनुशंसित दवा का ही प्रयोग करने तथा छिड़काव के दौरान निर्धारित मात्रा का ध्यान रखने को कहा गया है। जीवाणु झुलसा में पत्तियों के किनारे से शुरू होता है संक्रमण बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट को धान का जीवाणु झुलसा भी कहा जाता है। यह बैक्टीरिया के कारण होने वाला रोग है। इसके शुरुआती लक्षण पत्तियों के किनारे या नोक से दिखाई देते हैं। यहां पानी से भीगे हुए पीले-हरे रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में लंबी धारियों का रूप ले लेते हैं।धीरे-धीरे पत्तियों के किनारे पीले और सफेद होकर सूखने लगते हैं। सुबह के समय रोगग्रस्त पत्तियों पर बैक्टीरिया की बूंदें भी दिखाई दे सकती हैं, जो सूखने के बाद पीले दानों के रूप में नजर आती हैं। गंभीर प्रकोप की स्थिति में पूरा पौधा झुलस सकता है और दाने काले एवं खाली रह सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने इसके नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी 500 ग्राम और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 15 ग्राम को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी है। इसके विकल्प के रूप में कासुगामाइसिन 3% एसएल 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने किसानों से खेतों की नियमित निगरानी करने और रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाने की अपील की है। औरंगाबाद जिले में इन दिनों अधिकांश खेतों में धान की फसल में कल्ले निकलने यानी टिलरिंग अवस्था में है। फसल में शीथ ब्लाइट और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट(जीवाणु झुलसा) रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। सिरिस कृषि विज्ञान केंद्र की कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रतिभा कुमारी और पंकज कुमार सिन्हा ने किसानों को समय रहते रोग की पहचान कर नियंत्रण के उपाय करने की सलाह दी है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार दोनों बीमारियां धान की फसल के लिए गंभीर है। शुरुआती अवस्था में इनकी पहचान नहीं होने पर रोग तेजी से फैल सकता है और उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए। शीथ ब्लाइट फफूंद जनित रोग है। इसके प्रकोप में पानी की सतह के पास तने या पत्ती के आवरण पर हरे-भूरे रंग के अंडाकार अथवा अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे इनका आकार बढ़ता है और बीच का हिस्सा सफेद-राख जैसा, जबकि किनारे भूरे या बैंगनी रंग के हो जाते हैं। पत्तियों पर धब्बे दिखें तो तुरंत करें नियंत्रण रोग बढ़ने पर धब्बे ऊपर की पत्तियों तक फैल जाते हैं। इससे पूरी टिलर या पत्ती सूख सकती है। पौधे की वृद्धि एवं दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। कृषि वैज्ञानिकों ने शीथ ब्लाइट के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5% एससी 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी है। इसके अलावा प्रोपीकोनाजोल 25% ईसी 200 से 300 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग किया जा सकता है। वैलिडामाइसिन 3% एल 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से भी प्रभावी माना गया है। वहीं एजोक्सीस्ट्रोबिन 11% + टेबुकोनाजोल 18.3% एससी 300 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा 1 से 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। किसानों को रोग की स्थिति के अनुसार अनुशंसित दवा का ही प्रयोग करने तथा छिड़काव के दौरान निर्धारित मात्रा का ध्यान रखने को कहा गया है। जीवाणु झुलसा में पत्तियों के किनारे से शुरू होता है संक्रमण बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट को धान का जीवाणु झुलसा भी कहा जाता है। यह बैक्टीरिया के कारण होने वाला रोग है। इसके शुरुआती लक्षण पत्तियों के किनारे या नोक से दिखाई देते हैं। यहां पानी से भीगे हुए पीले-हरे रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में लंबी धारियों का रूप ले लेते हैं।धीरे-धीरे पत्तियों के किनारे पीले और सफेद होकर सूखने लगते हैं। सुबह के समय रोगग्रस्त पत्तियों पर बैक्टीरिया की बूंदें भी दिखाई दे सकती हैं, जो सूखने के बाद पीले दानों के रूप में नजर आती हैं। गंभीर प्रकोप की स्थिति में पूरा पौधा झुलस सकता है और दाने काले एवं खाली रह सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने इसके नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी 500 ग्राम और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 15 ग्राम को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी है। इसके विकल्प के रूप में कासुगामाइसिन 3% एसएल 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने किसानों से खेतों की नियमित निगरानी करने और रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाने की अपील की है।

