गंगा और कोसी के संगम के रूप में धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान रखने वाला कुरसेला का त्रिमोहिनी संगम एक बार फिर चर्चा में है। एक ओर इस संगम क्षेत्र को लंबे समय से पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की कवायद चलती रही है, वहीं दूसरी ओर मानसून में गंगा और कोसी के बढ़ते जलस्तर ने यहां के निचले इलाकों के सामने बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में दोनों नदियों के जलस्तर में लगातार वृद्धि के कारण कुरसेला प्रखंड के निचले इलाकों में पानी फैलने लगा है। बल्थी महेशपुर सड़क-सह-तटबंध पर भी पानी का दबाव बढ़ रहा है। वहीं पत्थल टोला की ओर जाने वाली सड़क के आसपास पानी फैलने से ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। ऐसे में त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने की योजनाओं के बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या बाढ़, कटाव और नदी के बदलते मिजाज को ध्यान में रखते हुए यहां स्थायी और सुरक्षित पर्यटन सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं? संगम पर धार्मिक आस्था, माघी पूर्णिमा में जुटती है भीड़ त्रिमोहिनी संगम का धार्मिक महत्व काफी पुराना है। गंगा और कोसी के मिलन स्थल के रूप में यहां विभिन्न धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। विशेष रूप से माघी पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग संगम तट पर पहुंचकर स्नान और पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक महत्व के साथ इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर बुनियादी सुविधाओं का विकास हो तो त्रिमोहिनी संगम कटिहार ही नहीं, बल्कि सीमांचल और आसपास के क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र बन सकता है। लेकिन मानसून में नदियों का बढ़ता जलस्तर इस संभावना के सामने बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। पर्यटन विकास की योजनाएं पुरानी, लेकिन नदी की चुनौती कायम त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजनाएं नई नहीं हैं। पूर्व में संगम तट पर पर्यटकों और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए निर्माण कार्य, सुरक्षा व्यवस्था और गांधी जी की स्मृति से जुड़े स्थलों के विकास की योजनाओं की चर्चा होती रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन विकास की योजना बनाते समय सिर्फ भवन, घाट और सौंदर्यीकरण पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। यहां की सबसे बड़ी चुनौती नदी है। गंगा और कोसी की धारा हर साल अपना तेवर बदलती है। जलस्तर बढ़ने के साथ कटाव और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए संगम के विकास की किसी भी योजना में नदी के स्वभाव को केंद्र में रखना जरूरी है। सड़क-सह-तटबंध पर बढ़ा पानी का दबाव वर्तमान समय में गंगा और कोसी के जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण कुर्सेला प्रखंड के निचले इलाकों में बाढ़ का पानी फैल रहा है। बल्थी महेशपुर सड़क-सह-तटबंध पर पानी का दबाव बढ़ने की स्थिति स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। इसके अलावा पत्थल टोला की ओर जाने वाले रास्ते के आसपास भी पानी फैल गया है। इससे ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जलस्तर में और वृद्धि होती है तो संपर्क मार्गों पर परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन की ओर से संवेदनशील स्थानों की निगरानी और समय रहते आवश्यक कदम उठाना जरूरी है। घाट पर सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरत त्रिमोहिनी संगम पर धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। संगम पर स्नान के दौरान पहले भी डूबने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में वर्तमान समय में जब दोनों नदियों का जलस्तर बढ़ा हुआ है और नदी का बहाव तेज है, घाट पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। श्रद्धालुओं को गहरे पानी में जाने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड और पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती जरूरी है। इसके साथ ही नाव और बचाव दल की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि किसी आपात स्थिति में तत्काल राहत पहुंचाई जा सके। स्थानीय लोगों की मांग- विकास के साथ कटाव से बचाव भी हो स्थानीय लोगों का कहना है कि संगम को सिर्फ धार्मिक स्थल या पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित करना पर्याप्त नहीं है। यहां मजबूत घाट, सुरक्षित पहुंच मार्ग, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, शौचालय, पेयजल, नाव और बचाव व्यवस्था के साथ बाढ़ और कटाव से सुरक्षा की ठोस योजना भी जरूरी है। लोगों का कहना है कि अगर हर साल बाढ़ के दौरान संपर्क मार्ग और आसपास के इलाके प्रभावित होते रहेंगे तो पर्यटन विकास की योजनाओं का लाभ सीमित रह जाएगा। इसलिए पहले बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए और उसके बाद पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और नदी के बढ़ते खतरे से स्थानीय लोगों को सुरक्षित रखने की चुनौती अब एक साथ सामने है। प्रशासन के लिए जरूरी है कि वह संगम क्षेत्र का तत्काल निरीक्षण करे और जलस्तर बढ़ने की स्थिति को देखते हुए आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू करे। विशेष रूप से श्रद्धालुओं के लिए स्पष्ट निर्देश जारी करने, खतरनाक स्थानों को चिह्नित करने और घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। त्रिमोहिनी संगम की पहचान गंगा और कोसी के संगम के साथ उसकी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी है। ऐसे में यहां विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो नदी के स्वभाव को समझकर किया जाए। अब जरूरत सिर्फ त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल बनाने की नहीं, बल्कि उसे बाढ़, कटाव और तेज नदी प्रवाह के बीच सुरक्षित और स्थायी पर्यटन केंद्र बनाने की है। गंगा-कोसी का वर्तमान तेवर यही संकेत दे रहा है कि विकास की हर योजना में नदी के स्वभाव और स्थानीय लोगों व श्रद्धालुओं की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा। गंगा और कोसी के संगम के रूप में धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान रखने वाला कुरसेला का त्रिमोहिनी संगम एक बार फिर चर्चा में है। एक ओर इस संगम क्षेत्र को लंबे समय से पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की कवायद चलती रही है, वहीं दूसरी ओर मानसून में गंगा और कोसी के बढ़ते जलस्तर ने यहां के निचले इलाकों के सामने बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में दोनों नदियों के जलस्तर में लगातार वृद्धि के कारण कुरसेला प्रखंड के निचले इलाकों में पानी फैलने लगा है। बल्थी महेशपुर सड़क-सह-तटबंध पर भी पानी का दबाव बढ़ रहा है। वहीं पत्थल टोला की ओर जाने वाली सड़क के आसपास पानी फैलने से ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। ऐसे में त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने की योजनाओं के बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या बाढ़, कटाव और नदी के बदलते मिजाज को ध्यान में रखते हुए यहां स्थायी और सुरक्षित पर्यटन सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं? संगम पर धार्मिक आस्था, माघी पूर्णिमा में जुटती है भीड़ त्रिमोहिनी संगम का धार्मिक महत्व काफी पुराना है। गंगा और कोसी के मिलन स्थल के रूप में यहां विभिन्न धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। विशेष रूप से माघी पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग संगम तट पर पहुंचकर स्नान और पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक महत्व के साथ इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर बुनियादी सुविधाओं का विकास हो तो त्रिमोहिनी संगम कटिहार ही नहीं, बल्कि सीमांचल और आसपास के क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र बन सकता है। लेकिन मानसून में नदियों का बढ़ता जलस्तर इस संभावना के सामने बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। पर्यटन विकास की योजनाएं पुरानी, लेकिन नदी की चुनौती कायम त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजनाएं नई नहीं हैं। पूर्व में संगम तट पर पर्यटकों और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए निर्माण कार्य, सुरक्षा व्यवस्था और गांधी जी की स्मृति से जुड़े स्थलों के विकास की योजनाओं की चर्चा होती रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन विकास की योजना बनाते समय सिर्फ भवन, घाट और सौंदर्यीकरण पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। यहां की सबसे बड़ी चुनौती नदी है। गंगा और कोसी की धारा हर साल अपना तेवर बदलती है। जलस्तर बढ़ने के साथ कटाव और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए संगम के विकास की किसी भी योजना में नदी के स्वभाव को केंद्र में रखना जरूरी है। सड़क-सह-तटबंध पर बढ़ा पानी का दबाव वर्तमान समय में गंगा और कोसी के जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण कुर्सेला प्रखंड के निचले इलाकों में बाढ़ का पानी फैल रहा है। बल्थी महेशपुर सड़क-सह-तटबंध पर पानी का दबाव बढ़ने की स्थिति स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। इसके अलावा पत्थल टोला की ओर जाने वाले रास्ते के आसपास भी पानी फैल गया है। इससे ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जलस्तर में और वृद्धि होती है तो संपर्क मार्गों पर परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन की ओर से संवेदनशील स्थानों की निगरानी और समय रहते आवश्यक कदम उठाना जरूरी है। घाट पर सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरत त्रिमोहिनी संगम पर धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। संगम पर स्नान के दौरान पहले भी डूबने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में वर्तमान समय में जब दोनों नदियों का जलस्तर बढ़ा हुआ है और नदी का बहाव तेज है, घाट पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। श्रद्धालुओं को गहरे पानी में जाने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड और पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती जरूरी है। इसके साथ ही नाव और बचाव दल की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि किसी आपात स्थिति में तत्काल राहत पहुंचाई जा सके। स्थानीय लोगों की मांग- विकास के साथ कटाव से बचाव भी हो स्थानीय लोगों का कहना है कि संगम को सिर्फ धार्मिक स्थल या पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित करना पर्याप्त नहीं है। यहां मजबूत घाट, सुरक्षित पहुंच मार्ग, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, शौचालय, पेयजल, नाव और बचाव व्यवस्था के साथ बाढ़ और कटाव से सुरक्षा की ठोस योजना भी जरूरी है। लोगों का कहना है कि अगर हर साल बाढ़ के दौरान संपर्क मार्ग और आसपास के इलाके प्रभावित होते रहेंगे तो पर्यटन विकास की योजनाओं का लाभ सीमित रह जाएगा। इसलिए पहले बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए और उसके बाद पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और नदी के बढ़ते खतरे से स्थानीय लोगों को सुरक्षित रखने की चुनौती अब एक साथ सामने है। प्रशासन के लिए जरूरी है कि वह संगम क्षेत्र का तत्काल निरीक्षण करे और जलस्तर बढ़ने की स्थिति को देखते हुए आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू करे। विशेष रूप से श्रद्धालुओं के लिए स्पष्ट निर्देश जारी करने, खतरनाक स्थानों को चिह्नित करने और घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। त्रिमोहिनी संगम की पहचान गंगा और कोसी के संगम के साथ उसकी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी है। ऐसे में यहां विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो नदी के स्वभाव को समझकर किया जाए। अब जरूरत सिर्फ त्रिमोहिनी संगम को पर्यटन स्थल बनाने की नहीं, बल्कि उसे बाढ़, कटाव और तेज नदी प्रवाह के बीच सुरक्षित और स्थायी पर्यटन केंद्र बनाने की है। गंगा-कोसी का वर्तमान तेवर यही संकेत दे रहा है कि विकास की हर योजना में नदी के स्वभाव और स्थानीय लोगों व श्रद्धालुओं की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा।

