उर्स के मौके पर रौजा शरीफ दरगाह में आए सैकड़ों मुस्लिमों ने फतेहगढ़ गुरुद्वारा साहिब में रात बिताई। गुरुद्वारा साहिब के दीवान हॉल से लेकर बाहर परिसर में मुस्लिम समुदाय के सैकड़ों लोग लेटे रहे और कुछ घूमते रहे। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग टोपी पहनकर और कुछ नंगे सिर गुरुद्वारा परिसर में घूमते हुए दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर गुरुद्वारा परिसर में नंगे सिर लेटने और घूमने को गुरुद्वारा साहिब की मर्यादा का उल्लंघन बताया जा रहा है। लोग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (SGPC) व गुरुद्वारा प्रबंधकों को कह रहे हैं कि गुरुद्वारा साहिब की मर्यादा भंग करने वालों को जगह न दी जाए। गुरुद्वारा प्रबंधक भी मानते हैं कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को गुरुद्वारा साहिब में आकर गुरुघर की मर्यादा का पालन करना चाहिए था। प्रबंधकों का कहना है कि जहां का यह वीडियो है, वह जगह चरण कुंड के बाहर की है, लेकिन मर्यादा का पालन वहां भी होना चाहिए था। उनका कहना है कि आगे से इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा और किसी को भी इस तरह मर्यादा भंग करने नहीं दिया जाएगा। सोशल मीडिया पर उठाए जा रहे सवाल गुरुद्वारा परिसर में बिना सिर ढंके सोने व घूमने के साथ-साथ टोपी पहन कर जाने की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, तो कई लोग इस पर सवाल खड़े भी कर रहे हैं। लोगों का तर्क है कि गुरुघर में बिना सिर ढंके जब कोई नहीं जा सकता है तो इन लोगों को क्यों घूमने दिया गया? इसके अलावा, गुरुद्वारा परिसर में टोपी पहनने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का तर्क है कि शहीदी मेले के दौरान तो बच्चों के सिर से भी टोपियां निकालकर बरछे पर रखी गईं, अब क्यों गुरुघर में टोपी पहने लोगों को घूमने दिया गया? ये वीडियो 10 से 13 अगस्त के बीच के बताए जा रहे हैं। SGPC और गुरुद्वारा प्रबंधकों के अलग-अलग तर्क हजरत मुजद्दिद अलिफ-सानी का फतेहगढ़ साहिब से संबंध उनका जन्म 1564 ईस्वी में फतेहगढ़ साहिब के ऐतिहासिक शहर सरहिंद में हुआ था। उन्होंने जीवन का ज्यादातर समय यहीं रहकर इस्लामिक अध्ययन, सूफी दर्शन और अध्यापन में बिताया। 1624 ईस्वी में उनका देहांत भी सरहिंद में ही हुआ। फतेहगढ़ साहिब स्थित उनकी मजार को रौजा शरीफ कहा जाता है, जो आज दुनियाभर के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। सरहिंद से अपने इसी अटूट जुड़ाव के कारण वह पूरी दुनिया में शेख अहमद सरहिंदी के नाम से प्रसिद्ध हुए। उर्स के दौरान सिख और मुस्लिम समुदाय का एक-दूसरे की मदद करना फतेहगढ़ साहिब की इस पावन भूमि को धार्मिक भाईचारे की अद्वितीय मिसाल बनाता है।

