विदेश जाकर पढ़ाई करने के बाद भारत लौटना मेरे लिए कोई मजबूरी नहीं, बल्कि हमेशा से सोचा हुआ फैसला था। परिवार का स्थापित बिजनेस था और मेरा इरादा उसे आगे बढ़ाने का था। कोविड के दौरान जब भारत लौटना हुआ, तभी मैंने पिता के साथ काम शुरू किया और फिर वापस अमेरिका जाने का मौका नहीं आया। यह कहना है बंसल इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर पार्थ बंसल का। उन्होंने कहा कि बिजनेस के साथ आगे बढ़ते हुए महसूस किया कि जिम्मेदारी बढ़ने के साथ दबाव भी बढ़ता है। शुरुआत में बहुत कुछ बिना ज्यादा सोचे करने की आजादी थी, लेकिन अब हर फैसले के पीछे लोग, ग्राहक और बिजनेस जुड़े हैं। बंसल ने कहा कि एजुकेशन में आने वाला समय स्किल-बेस्ड लर्निंग का है। इसलिए छात्रों को उनकी रुचि और करियर के हिसाब से तकनीकी और सॉफ्ट स्किल्स पर काम करने का अवसर दिया जाता है। युवाओं को एक्सपोजर के साथ विनम्रता और धैर्य भी सीखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर वे अपने 18 साल के वर्जन से मिलें तो उससे कहेंगे कि कॉलेज लाइफ को दिल से एंजॉय करो। जरूरत से ज्यादा तनाव लेने की जरूरत नहीं है। सबसे जरूरी बात यह है कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखो। यही स्वीकार्यता सुधार और प्रगति की शुरुआत है।


