बिस्तर पर जाते ही पैर हिलाने का मन करता है? जानें Restless Legs Syndrome के लक्षण और कारण

बिस्तर पर जाते ही पैर हिलाने का मन करता है? जानें Restless Legs Syndrome के लक्षण और कारण

Restless Legs Syndrome: दिनभर की थकान के बाद जब हम रात को सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, तो उम्मीद करते हैं कि सुकून की नींद आएगी। लेकिन कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता। जैसे ही वे बेड पर लेटते हैं, उनके पैरों में एक अजीब सी बेचैनी होने लगती है और उन्हें लगातार पैर हिलाने की तीव्र इच्छा होती है।

पैर हिलाने पर थोड़ी देर के लिए तो आराम मिलता है, लेकिन रुकते ही बेचैनी फिर शुरू हो जाती है। मेडिकल साइंस में इस स्थिति को रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (Restless Legs Syndrome – RLS) या विल्स-एकबॉम बीमारी कहा जाता है। आइए जानते हैं कि ये क्या होता है इसके कारण, लक्षण और बचाव के उपाय क्या होते हैं?

बिस्तर पर जाते ही पैर हिलाने का मन क्यों करता है?

जैसे ही आप आराम करने के लिए बैठते हैं या बिस्तर पर लेटते हैं, आपके दिमाग को एक सिग्नल मिलता है कि अब शरीर शांत है। लेकिन रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम से पीड़ित लोगों के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) में कुछ गड़बड़ी के कारण, आराम की स्थिति में पैरों की नसें अजीब तरह के सिग्नल भेजने लगती हैं।

क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, इसके लक्षण शाम को या रात के समय सबसे ज्यादा एक्टिव होते हैं। जब आप पैरों को हिलाते हैं या उठकर चलने लगते हैं, तो पैरों की नसों को एक दूसरा सिग्नल मिलता है जिससे वह बेचैनी कुछ समय के लिए दब जाती है। यही कारण है कि बिस्तर पर जाते ही बार-बार पैर हिलाने का मन करता है।

क्या होता है रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (RLS)?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, यह नसों से जुड़ा एक विकार (Neurological Disorder) है। इसमें इंसान को अपने पैरों (और कभी-कभी हाथों) में एक ऐसी असहज भावना या बेचैनी महसूस होती है, जिसे रोके रखना उसके बस में नहीं होता। यह कोई मानसिक बीमारी या केवल वहम नहीं है, बल्कि शरीर की नसों और दिमाग के तालमेल से जुड़ी एक वास्तविक समस्या है। इसके कारण व्यक्ति की नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगने जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।

रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम के मुख्य लक्षण

इसके होने के कारण क्या हैं?

  • आयरन की कमी (Iron Deficiency) होना।
  • डोपामाइन का असंतुलन होना।
  • जीन या अनुवांशिकता।
  • प्रेगनेंसी (गर्भावस्था) के आखिरी तीन महीनों में यह समस्या हो सकती है।
  • किडनी फेलियर, डायबिटीज (शुगर) और नसों को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारियां।
  • ज्यादा कैफीन और अल्कोहल का सेवन।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।

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