उज्जैन जिले के ताजपुर की गलियों में रविवार शाम बैंड-बाजे गूंज रहे थे। घरों के बाहर रंगोलियां सजी थीं, रास्तों पर तोरण-द्वार लगे थे और लोग उत्सव के कपड़ों में सड़कों पर उमड़ पड़े थे। देखने वालों को लगा मानो गांव में कई शादियां एक साथ हो रही हों, लेकिन यहां कोई दूल्हा घोड़ी पर नहीं था। इस बार सम्मान की सवारी पर बैठे थे गांव के 38 मेधावी छात्र-छात्राएं और उनके माता-पिता। इस गांव ने 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं में 75 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के सम्मान में ‘सफलता मार्च’ निकाला। इमली चौराहा से शुरू हुई यात्रा श्री वैष्णव गार्डन तक पहुंची। पूरे रास्ते गांव बाराती बना रहा। जगह-जगह फूलों की बारिश हुई, लस्सी व स्वल्पाहार के स्टॉल लगे। गांव ने यह संदेश दिया कि किसी बच्चे की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि परिवार और समाज के सामूहिक प्रयास का परिणाम होती है। ताजपुर पहले से ही अपनी अनूठी ‘बेटी की छांव’ पहल के लिए जाना जाता है। यहां बेटियों की शादी के समय उनसे एक पौधा लगवाया जाता है। समाज को लौटाने की दी सीख
कार्यक्रम में गांव की बेटी एवं लोक निर्माण विभाग की एसडीओ नेहा राठौर और प्रधान आरक्षक सुनील पाटीदार ने बच्चों को सम्मानित किया। दोनों ने विद्यार्थियों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने और समाज को लौटाने का संदेश दिया। पूरा गांव एक परिवार
यह पहल ऐसे समय में आई है, जब शिक्षा को अक्सर केवल अंकों और प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखा जाता है। गांव ने दिखाया कि जब पूरा समाज बच्चों की मेहनत को सम्मान देता है, तब शिक्षा सामूहिक गर्व और प्रेरणा का उत्सव बन जाती है। टेंट-पानी मुफ्त, चंदा इतना आया कि मना करना पड़ा
पूरा आयोजन जनसहयोग से हुआ। टेंट व्यवसायियों ने निःशुल्क टेंट लगाए, पानी व्यवसायियों ने ठंडे पानी की व्यवस्था संभाली और ग्रामीणों ने आर्थिक सहयोग के लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्थिति यह रही कि पर्याप्त राशि जुट जाने के बाद आयोजकों को लोगों से अतिरिक्त सहयोग नहीं लेने की अपील करनी पड़ी। गांव के लोगों ने पारंपरिक तरीके से घर-घर जाकर निमंत्रण दिया। गलियों को ध्वज और तोरण से सजाया गया। आयोजन को डिजिटल मंचों से भी जोड़ा गया। सफलता मार्च का फेसबुक और यूट्यूब पर लाइव प्रसारण हुआ, जिसे गांव से बाहर रहने वाले लोगों ने भी देखा।


