झालावाड़। पिछले कुछ साल में मानसून के दौरान जिले के कई इलाके जानलेवा बन गए हैं। कालीसिंध-आहू नदी संगम, शहर का नया तालाब, ईदगाह रोड और ग्रामीण क्षेत्रों की रपटें हर वर्ष दुर्घटनाओं और मौतों की दर्दनाक कहानियां दोहराती हैं। चिंताजनक बात यह है कि लगातार हादसों के बावजूद इन स्थानों पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम अब तक नहीं किए गए हैं।
जिले में ऐसे करीब आधा दर्जन स्थान हैं जिन्हें स्थानीय लोग वर्षों से ‘खतरनाक मानसून पॉइंट’ के रूप में पहचानते हैं। हर बारिश में यहां लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग या अन्य सुरक्षा उपायों की व्यवस्था नहीं होने से खतरा लगातार बना हुआ है।
कालीसिंध-आहू संगम: हर साल उजड़ते हैं परिवार
जिले का सबसे खतरनाक स्थल कालीसिंध और आहू नदियों का संगम माना जाता है। मानसून में जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव के कारण यहां हर वर्ष औसतन तीन से चार लोगों की डूबने से मौत हो जाती है। कई बार ग्रामीण और युवक रपट पार करते समय पानी के बहाव में बह जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन को इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नतीजतन हर बारिश में लोगों के मन में भय बना रहता है।
नया तालाब: मासूम की जा चुकी है जान
शहर का नया तालाब भी दुर्घटनाओं का बड़ा केंद्र बन चुका है। पूर्व में एक बच्चा तेज बहाव में नाले में फंसकर पानी में बह गया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी। पिछले वर्ष भी एक 16 वर्षीय बालक नाले में फंस गया था, जिसे मौके पर मौजूद लोगों ने समय रहते बचा लिया।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि तालाब के मोखे पर जाली लगाई जानी चाहिए तथा बहाव क्षेत्र में सड़क के दोनों ओर संकेतक और सुरक्षा मुंडेर बनाई जानी चाहिए ताकि राहगीरों को खतरे का अंदाजा हो सके।
ईदगाह रोड पर हर बारिश में बढ़ती परेशानी
ईदगाह रोड भी बरसात के दिनों में शहरवासियों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। सड़क नीचे होने के कारण पानी का तेज बहाव कई बार लोगों को मुश्किल में डाल देता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार बारिश के दौरान बच्चों और बुजुर्गों का यहां से गुजरना जोखिम भरा हो जाता है।
लोगों का कहना है कि पुलिया को ऊंचा करने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पुलियाओं और रपटों पर भी खतरा
कालीसिंध और आहू नदी की रपटों पर भी हर मानसून में हादसों का खतरा बना रहता है। गत वर्ष कालीसिंध की रपट पार करते समय तीन शिक्षक पानी में बह गए थे। इससे पहले भी कई लोग तेज बहाव का शिकार हो चुके हैं। हालांकि दोनों स्थानों पर पुल निर्माण कार्य जारी है, लेकिन तब तक लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी संकट
अकलेरा क्षेत्र के घाटोली-केलखोयरा मार्ग पर स्थित महादेव मंदिर जाने वाले रास्ते पर हर वर्ष पानी भर जाता है। सावन और बरसात में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। ग्रामीण लंबे समय से यहां ऊंची पुलिया निर्माण की मांग कर रहे हैं।
इसी प्रकार गेहूंखेड़ी के खाल पर बनी रपट भी बारिश में डूब जाती है, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
सुरक्षा इंतजामों का इंतजार
बार-बार हो रहे हादसों के बावजूद अधिकांश खतरनाक स्थलों पर न तो चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं और न ही पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते बैरिकेडिंग, चेतावनी संकेतक, जालियां और आपदा प्रबंधन की व्यवस्था की जाए तो कई कीमती जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
जिले में जहां पर भी बारिश के दौरान ऐसे प्वाइंट है, जहां हादसा होने का डर है, वहां चेतावनी बोर्ड लगाए जाएंगे। आहू व कालीसिंध पुलियाओं का काम चल रहा है, इस बारिश में पूरा काम होना मुश्किल है। ऐसे में यहां लोगों को तेज बहाव में नहीं जाना चाहिए। जहां भी इस तरह के प्वाइंट है, वहां सुरक्षा बढ़ाई जाएगी।
मुकेश मीणा, अधीक्षण अभियंता , सार्वजनिक निर्माण विभाग, झालावाड़।


