कबाड़ से सजाया गार्डन, आकर्षण का बना केंद्र:चंडीगढ़ के रॉक गार्डन से मिली प्रेरणा, पर्यावरण बचाने का दिया संदेश; बहन को किया समर्पित

कबाड़ से सजाया गार्डन, आकर्षण का बना केंद्र:चंडीगढ़ के रॉक गार्डन से मिली प्रेरणा, पर्यावरण बचाने का दिया संदेश; बहन को किया समर्पित

कोडरमा के झुमरीतिलैया स्थित देवी मंडप रोड निवासी 71 वर्षीय अरुण मिश्रा ने अपने घर के कबाड़ का उपयोग कर एक सुंदर बगीचा तैयार किया है, जिसके माध्यम से वे लोगों को पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अरुण मिश्रा स्वयं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात दे चुके हैं। अरुण मिश्रा का यह बगीचा अब आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने अपने इस विशेष बगीचे को अपनी दिवंगत बहन मीनाक्षी का नाम दिया है। मीनाक्षी का निधन कैंसर से हुआ था, जिसके बाद अरुण मिश्रा ने कैंसर को हराने और पर्यावरण को बचाने का संकल्प लिया था। उन्होंने अपने बगीचे को इसी संकल्प की शुरुआत माना है। अरुण मिश्रा ने बताया कि उन्हें यह प्रेरणा चंडीगढ़ के रॉक गार्डन से मिली। कुछ वर्ष पहले चंडीगढ़ भ्रमण के दौरान उन्होंने रॉक गार्डन देखा था, जहां अनुपयोगी वस्तुओं का इस्तेमाल कर एक खूबसूरत उद्यान बनाया गया था। इस अनुभव ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि कोडरमा लौटने के बाद उन्होंने भी अपने घर के कबाड़ और वेस्ट मटेरियल से अपना बगीचा सजाना शुरू कर दिया। घर के अनुपयोगी चीजों को फेंकने के बजाय उपयोग में लाया
बगान में पेड़-पौधे, फूल-फल इत्यादि लगाकर उसे संवारना यह तो सभी लोग कर लेते हैं, लेकिन अरुण मिश्रा ने इन सबसे हटकर अपने बगीचे को तैयार किया है। उन्होंने अपने घर के वैसे अनुपयोगी सामान जो कबाड़ बन चुकी थी, उसे पौधे लगाने में इस्तेमाल कर लिया है। उन्होंने घर के खराब कमोड, पानी के जार, वाटर फिल्टर, बाथटब सहित गाड़ी के खराब टायर और अन्य प्रकार के कबाड़ को फेंकने के बजाय उसमें अलग-अलग किस्म के पौधे लगाए हैं। वेस्ट (कचरा) को बेस्ट बनाया
उन्होंने कहा कि वेस्ट को बेस्ट कैसे बनाया जाए, इस थीम पर उन्होंने अपने गार्डन को तैयार किया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण को सजाने के लिए केवल पेड़ पौधों का लगाना ही विकल्प नहीं है बल्कि इसके साथ घर, दुकानों व अन्य जगहों पर उपयोग होने वाले वैसे सामान जिसे खराब हो जाने के बाद अमूमन हम फेंक देते हैं, उसे कैसे पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में उपयोग में लाया जा सके, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अमूमन लोग इस प्रकार के खराब सामानों को या तो कबाड़ में बेच देते हैं या फिर यत्र-तत्र फेंक देते हैं। लेकिन जरूरत है इन कबाड़ को कैसे हम अन्य चीजों में उपयोग में ला सके। इसका सबसे बेहतरीन उपाय है अपने बगीचे में पौधे लगाकर इसको उपयोग में लाना। वैसे लोग जिनके पास बगीचे के लिए अलग से जगह नहीं है वह अपने छत पर भी इसे उपयोग में ला सकते हैं। पर्यावरण दूषित करने में जुटे हुए हैं लोग उन्होंने कहा कि आजकल के लोग एक रेस में लगे हुए हैं कि कौन पर्यावरण को कितना अधिक से अधिक दूषित कर सकता है। लोग गुटका, पान, तंबाकू जैसी चीजें खाकर उनके रैपर को सड़कों पर फेंक देते हैं। वहीं घर में प्लास्टिक में आने वाले सामग्रियों को उपयोग के बाद लोग सड़कों पर फेंक देते हैं। जिससे नाले जाम हो जाते हैं, सड़कों पर गंदगी फैलती है और पर्यावरण दूषित होता है। हमें इस पर्यावरण दिवस पर यह संकल्प लेना होगा कि हम कैसे अपने पर्यावरण को दूषित होने से बचाए और लोग एक स्वच्छ वातावरण में जी सकें। स्वच्छ वातावरण से दी कैंसर को मात
उन्होंने कहा कि वे कैंसर की फोर्थ स्टेज (आखिरी पायदान) पर पहुंच चुका थे, जहां से लौटना नामुमकिन सा था। वे जिस भी हॉस्पिटल गए, सभी जगह के चिकित्सकों ने उन्हें जवाब दे दिया था। बावजूद इसके उन्होंने हार मानने की बजाय कैसे अपने आप को स्वस्थ और खुश रख सके इसकी तैयारी की। उन्होंने बताया कि कैंसर को मात देने में जो सबसे उपयोगी चीज रही वह उनका बागान था। उन्होंने कहा कि उनके बागान की हरियाली देखकर उनका मन प्रफुल्लित हो जाता था और वह कैंसर के बारे में सोचना तक बंद कर दिए। बागान को सजाने संवारने में उन्होंने अपनी पूरी मेहनत लगा दी। इससे उनका कैंसर की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया और एक समय ऐसा आया कि उन्होंने कैंसर को ही अलविदा कह दिया। उनका कहना है कि अगर आपके आसपास हरियाली है, स्वच्छ वातावरण है तो ऐसे में न केवल कैंसर बल्कि दुनिया के किसी भी बीमारी को हम मात दे सकते हैं। कोडरमा के झुमरीतिलैया स्थित देवी मंडप रोड निवासी 71 वर्षीय अरुण मिश्रा ने अपने घर के कबाड़ का उपयोग कर एक सुंदर बगीचा तैयार किया है, जिसके माध्यम से वे लोगों को पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अरुण मिश्रा स्वयं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात दे चुके हैं। अरुण मिश्रा का यह बगीचा अब आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने अपने इस विशेष बगीचे को अपनी दिवंगत बहन मीनाक्षी का नाम दिया है। मीनाक्षी का निधन कैंसर से हुआ था, जिसके बाद अरुण मिश्रा ने कैंसर को हराने और पर्यावरण को बचाने का संकल्प लिया था। उन्होंने अपने बगीचे को इसी संकल्प की शुरुआत माना है। अरुण मिश्रा ने बताया कि उन्हें यह प्रेरणा चंडीगढ़ के रॉक गार्डन से मिली। कुछ वर्ष पहले चंडीगढ़ भ्रमण के दौरान उन्होंने रॉक गार्डन देखा था, जहां अनुपयोगी वस्तुओं का इस्तेमाल कर एक खूबसूरत उद्यान बनाया गया था। इस अनुभव ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि कोडरमा लौटने के बाद उन्होंने भी अपने घर के कबाड़ और वेस्ट मटेरियल से अपना बगीचा सजाना शुरू कर दिया। घर के अनुपयोगी चीजों को फेंकने के बजाय उपयोग में लाया
बगान में पेड़-पौधे, फूल-फल इत्यादि लगाकर उसे संवारना यह तो सभी लोग कर लेते हैं, लेकिन अरुण मिश्रा ने इन सबसे हटकर अपने बगीचे को तैयार किया है। उन्होंने अपने घर के वैसे अनुपयोगी सामान जो कबाड़ बन चुकी थी, उसे पौधे लगाने में इस्तेमाल कर लिया है। उन्होंने घर के खराब कमोड, पानी के जार, वाटर फिल्टर, बाथटब सहित गाड़ी के खराब टायर और अन्य प्रकार के कबाड़ को फेंकने के बजाय उसमें अलग-अलग किस्म के पौधे लगाए हैं। वेस्ट (कचरा) को बेस्ट बनाया
उन्होंने कहा कि वेस्ट को बेस्ट कैसे बनाया जाए, इस थीम पर उन्होंने अपने गार्डन को तैयार किया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण को सजाने के लिए केवल पेड़ पौधों का लगाना ही विकल्प नहीं है बल्कि इसके साथ घर, दुकानों व अन्य जगहों पर उपयोग होने वाले वैसे सामान जिसे खराब हो जाने के बाद अमूमन हम फेंक देते हैं, उसे कैसे पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में उपयोग में लाया जा सके, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अमूमन लोग इस प्रकार के खराब सामानों को या तो कबाड़ में बेच देते हैं या फिर यत्र-तत्र फेंक देते हैं। लेकिन जरूरत है इन कबाड़ को कैसे हम अन्य चीजों में उपयोग में ला सके। इसका सबसे बेहतरीन उपाय है अपने बगीचे में पौधे लगाकर इसको उपयोग में लाना। वैसे लोग जिनके पास बगीचे के लिए अलग से जगह नहीं है वह अपने छत पर भी इसे उपयोग में ला सकते हैं। पर्यावरण दूषित करने में जुटे हुए हैं लोग उन्होंने कहा कि आजकल के लोग एक रेस में लगे हुए हैं कि कौन पर्यावरण को कितना अधिक से अधिक दूषित कर सकता है। लोग गुटका, पान, तंबाकू जैसी चीजें खाकर उनके रैपर को सड़कों पर फेंक देते हैं। वहीं घर में प्लास्टिक में आने वाले सामग्रियों को उपयोग के बाद लोग सड़कों पर फेंक देते हैं। जिससे नाले जाम हो जाते हैं, सड़कों पर गंदगी फैलती है और पर्यावरण दूषित होता है। हमें इस पर्यावरण दिवस पर यह संकल्प लेना होगा कि हम कैसे अपने पर्यावरण को दूषित होने से बचाए और लोग एक स्वच्छ वातावरण में जी सकें। स्वच्छ वातावरण से दी कैंसर को मात
उन्होंने कहा कि वे कैंसर की फोर्थ स्टेज (आखिरी पायदान) पर पहुंच चुका थे, जहां से लौटना नामुमकिन सा था। वे जिस भी हॉस्पिटल गए, सभी जगह के चिकित्सकों ने उन्हें जवाब दे दिया था। बावजूद इसके उन्होंने हार मानने की बजाय कैसे अपने आप को स्वस्थ और खुश रख सके इसकी तैयारी की। उन्होंने बताया कि कैंसर को मात देने में जो सबसे उपयोगी चीज रही वह उनका बागान था। उन्होंने कहा कि उनके बागान की हरियाली देखकर उनका मन प्रफुल्लित हो जाता था और वह कैंसर के बारे में सोचना तक बंद कर दिए। बागान को सजाने संवारने में उन्होंने अपनी पूरी मेहनत लगा दी। इससे उनका कैंसर की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया और एक समय ऐसा आया कि उन्होंने कैंसर को ही अलविदा कह दिया। उनका कहना है कि अगर आपके आसपास हरियाली है, स्वच्छ वातावरण है तो ऐसे में न केवल कैंसर बल्कि दुनिया के किसी भी बीमारी को हम मात दे सकते हैं।  

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