Sustainable Living Habits Tips: पर्यावरण संरक्षण की बात आते ही हमें लगता है कि यह कोई बहुत मुश्किल काम है जिसके लिए हमें अपनी आरामदायक जिंदगी को छोड़ना पड़ेगा। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। पर्यावरण संतुलन के लिए हमें अपनी जिंदगी को रोकने की जरूरत नहीं है, सिर्फ रोज की आदतों को थोड़ा बदलने की जरूरत है। कोई भी परिवार पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकता है। तो आइए, ऐसे ही परिवार का उदाहरण लेते हैं। इस घर में दादा-दादी, मम्मी-पापा और बच्चे हैं।
दादा ने शुरू किया Kitchen Composting
बदलाव: दादाजी को पेड़-पौधों का शौक है। वे रसोई से निकलने वाले गीले कचरे जैसे सब्जियों और फलों के छिलकों, बची हुई चायपत्ती को बाहर फेंकने के बजाय उससे घर की बालकनी में ही खाद तैयार करते हैं।
असर: रसोई का गीला कचरा जब बाहर कचरे के ढेर में नहीं सड़ता, तो खतरनाक गैसें नहीं बनतीं। घर की बनी खाद से पौधे अच्छे हो जाते हैं, जो पूरे घर को साफ हवा देते हैं।
म्मी ने अपनाई Sustainable Shopping
बदलाव: मम्मी ने पहला नियम यह बनाया कि कपड़े तभी खरीदे जाएंगे, जब सच में जरूरत हो और वे सूती या खादी के होंगे। दूसरा बड़ा बदलाव उन्होंने किया कि केमिकल वाले शैम्पू की जगह घर पर ही रीठा, आंवला और शिकाकाई से घरेलू शैम्पू बनाना शुरू कर दिया।
असर: कम कपड़े खरीदने से पानी और पैसों की भारी बचत होती है। वहीं, केमिकल के बिना बने घरेलू शैम्पू से बाल तो अच्छे होते ही हैं, नहाने के बाद जब यह पानी नदियों और जमीन में जाता है, तो जल प्रदूषण नहीं होता। बाजार के शैम्पू की प्लास्टिक बोतलें भी कचरे में नहीं जातीं।
पापा ने कम किया Carbon Emission
बदलाव: पापा ने दफ्तर जाने के लिए हर दिन गाड़ी ले जाने की आदत छोड़ दी है। कुछ दिन बस, मेट्रो या दफ्तर के साथियों के साथ एक ही गाड़ी से चले जाते हैं। वे कपड़े का थैला और पानी की स्टील वाली बोतल साथ रखते हैं।
असर: पेट्रोल बचता है और प्रदूषण कम होता है। थैला और बोतल साथ रखने से पानी की प्लास्टिक बोतलें और थैलियां पूरी तरह बंद हो गई हैं।
दादी की Healthy Lifestyle Habit
बदलाव: दादी ने नियम बनाया है कि वह रोज सुबह पार्क में टहलने और योग करने जरूर जाएंगी। ताकि उम्र के इस पड़ाव में भी वे पूरी तरह सेहतमंद रहें।
असर: दादी की अच्छी सेहत के कारण दवाओं पर निर्भरता कम हुई, जिससे मेडिकल प्लास्टिक वेस्ट भी कम पैदा होता है।
बच्चों ने सिखाया Reuse का महत्व
बदलाव: हर नए साल या नई क्लास में जाने पर बच्चों में नया स्कूल बैग, नया पेंसिल बॉक्स या नया लंच बॉक्स खरीदने की जिद होती है। लेकिन घर के बच्चों ने जिद को छोड़ दिया। वे पुरानी चीजों को ही साफ करके दोबारा इस्तेमाल करते हैं। पिछले साल की कॉपियों के खाली पन्नों को मिलाकर रफ कॉपी बना लेते हैं।
असर: हर साल न पेंसिल बॉक्स या बैग न खरीदने से सूखा कचरा बहुत कम हो जाता है। कॉपियों के पन्ने बचाने की इस छोटी सी आदत से पेड़ों की कटाई रुकती है, क्योंकि कागज पेड़ों से ही बनता है।


