World Environment Day: आज जब पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय है, तब बीकानेर रियासत के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए यहां सदियों पहले ही सख्त प्रशासनिक व्यवस्थाएं लागू की जा चुकी थीं। बीकानेर दरबार ने वर्ष 1794 में हरी खेजड़ी के वृक्षों की कटाई को दंडनीय अपराध घोषित करते हुए दोषियों पर आर्थिक दंड, जिसे उस समय ‘गुनहागारी’ कहा जाता था, लगाने का प्रावधान किया था।
बीकानेर रियासत की मोदी लिपि में लिखित कागद बहियों में दर्ज आदेशों से यह जानकारी सामने आती है। अभिलेखों के अनुसार दरबार ने खेजड़ी वृक्षों के संरक्षण को लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए थे, ताकि मरुस्थलीय क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।
इतिहासकार एवं शोधकर्ता डॉ. नितिन गोयल के अनुसार तत्कालीन आदेश में उल्लेख है कि हरी खेजड़ी काटने वाले व्यक्ति पर ‘गुनहागारी’ लगाई जाएगी। यह व्यवस्था उस दौर में लागू की गई थी, जब पर्यावरण संरक्षण की आधुनिक अवधारणाएं विकसित भी नहीं हुई थीं।
मरुस्थलीय जीवन का आधार रही खेजड़ी
थार क्षेत्र में खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार रही है। इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराती हैं, जबकि इसकी गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करती हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी यह हरित आवरण बनाए रखने में सहायक रहती है और पारंपरिक कृषि प्रणाली का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार खेजड़ी की उपस्थिति भूमि की उर्वरता बनाए रखने में भी सहायक होती है, जिसके कारण इसे मरुस्थलीय क्षेत्रों का ‘कल्पवृक्ष’ तक कहा जाता है।

दूरदर्शी पर्यावरणीय सोच का प्रमाण
खेजड़ी संरक्षण को लेकर बीकानेर रियासत की नीतियां इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय पर्यावरण संरक्षण को केवल वृक्षों तक सीमित नहीं माना जाता था, बल्कि इसे पशुधन, कृषि और स्थानीय समाज की आजीविका से सीधे जोड़ा गया था। डॉ. गोयल के अनुसार खेजड़ी संरक्षण से जुड़े ये अभिलेख भारतीय पर्यावरण इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। ये दर्शाते हैं कि मरुस्थलीय समाज और प्रशासन प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने के साथ-साथ भविष्य की चुनौतियों को लेकर भी दूरदर्शी दृष्टिकोण रखते थे।
क्या है ‘गुनहागारी’
रियासती काल में किसी नियम या आदेश के उल्लंघन पर लगाया जाने वाला आर्थिक दंड ‘गुनहागारी’ कहलाता था। बीकानेर दरबार ने खेजड़ी की अवैध कटाई रोकने के लिए इसी दंड व्यवस्था का उपयोग किया था। इससे वृक्ष संरक्षण को प्रशासनिक समर्थन मिला और लोगों में नियमों के प्रति जवाबदेही बनी रही।


