FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स और अधिकारियों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा लगाए गए आरोपों से संबंधित एक प्रेस रिली वापिस लिए जाने पर मामले में नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक आदेश पारित किया, जिसमें यह नोट किया गया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 26.04.2025 को जारी की गई उस प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस ले लिया है, जिसमें FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स पर आरोप लगाए गए थे। विवादित प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस लेना FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स के इस लगातार रुख को सही साबित करता है कि आरोप बेबुनियाद थे और उनके समर्थन में कोई सबूत नहीं था। याचिकाकर्ताओं द्वारा ED की प्रेस रिलीज़ को चुनौती याचिकाकर्ताओं (FIITJEE) ने ED के लखनऊ ज़ोनल ऑफिस द्वारा 26.04.2025 को जारी की गई उस प्रेस रिलीज़ को चुनौती दी थी – जो अब विवादित है – जिसे FIITJEE के नोएडा और दिल्ली ऑफिसों तथा कुछ डायरेक्टर्स और अधिकारियों के आवासों पर तलाशी के बाद जारी किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रेस रिलीज़ दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक थी, तथा अवैध और मनगढ़ंत अनुमानों पर आधारित थी; इसमें बिना किसी उचित औचित्य या सबूत के विभिन्न प्रकार की अटकलें और आरोप शामिल थे। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि प्रेस रिलीज़ एक “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” पर आधारित होने का दावा करती थी, जबकि ऐसी कोई रिपोर्ट मौजूद ही नहीं थी। प्रतिवादी का बयान और “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” पर स्पष्टीकरण इसके बाद, प्रतिवादी के वकील ने इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा कि क्या वे प्रेस रिलीज़ में संशोधन करेंगे या मामले का निपटारा उसके गुण-दोष के आधार पर करवाएंगे। यह उल्लेखनीय है कि, ज़ब्त की गई सामग्री के प्राथमिक विश्लेषण पर आधारित होने का दावा करने के बावजूद, प्रतिवादी ने माननीय कोर्ट के समक्ष यह स्वीकार किया कि ऐसी कोई “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” मौजूद नहीं थी, और वे प्रथम दृष्टया आरोपों को साबित करने में विफल रहे। इसके परिणामस्वरूप, 06.05.2026 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने यह नोट किया कि प्रतिवादी के वकील को विवादित प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस लेने के निर्देश प्राप्त हो गए थे। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की कि प्रतिवादी ने प्रेस विज्ञप्ति को वापस लेकर उन गंभीर परिणामों को टाल दिया है, जो तब उत्पन्न हो सकते थे, यदि न्यायालय को मामले के गुण-दोष के आधार पर कोई आदेश पारित करने के लिए विवश होना पड़ता। FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स और अधिकारियों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा लगाए गए आरोपों से संबंधित एक प्रेस रिली वापिस लिए जाने पर मामले में नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक आदेश पारित किया, जिसमें यह नोट किया गया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 26.04.2025 को जारी की गई उस प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस ले लिया है, जिसमें FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स पर आरोप लगाए गए थे। विवादित प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस लेना FIITJEE और उसके डायरेक्टर्स के इस लगातार रुख को सही साबित करता है कि आरोप बेबुनियाद थे और उनके समर्थन में कोई सबूत नहीं था। याचिकाकर्ताओं द्वारा ED की प्रेस रिलीज़ को चुनौती याचिकाकर्ताओं (FIITJEE) ने ED के लखनऊ ज़ोनल ऑफिस द्वारा 26.04.2025 को जारी की गई उस प्रेस रिलीज़ को चुनौती दी थी – जो अब विवादित है – जिसे FIITJEE के नोएडा और दिल्ली ऑफिसों तथा कुछ डायरेक्टर्स और अधिकारियों के आवासों पर तलाशी के बाद जारी किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रेस रिलीज़ दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक थी, तथा अवैध और मनगढ़ंत अनुमानों पर आधारित थी; इसमें बिना किसी उचित औचित्य या सबूत के विभिन्न प्रकार की अटकलें और आरोप शामिल थे। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि प्रेस रिलीज़ एक “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” पर आधारित होने का दावा करती थी, जबकि ऐसी कोई रिपोर्ट मौजूद ही नहीं थी। प्रतिवादी का बयान और “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” पर स्पष्टीकरण इसके बाद, प्रतिवादी के वकील ने इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा कि क्या वे प्रेस रिलीज़ में संशोधन करेंगे या मामले का निपटारा उसके गुण-दोष के आधार पर करवाएंगे। यह उल्लेखनीय है कि, ज़ब्त की गई सामग्री के प्राथमिक विश्लेषण पर आधारित होने का दावा करने के बावजूद, प्रतिवादी ने माननीय कोर्ट के समक्ष यह स्वीकार किया कि ऐसी कोई “प्राथमिक विश्लेषण रिपोर्ट” मौजूद नहीं थी, और वे प्रथम दृष्टया आरोपों को साबित करने में विफल रहे। इसके परिणामस्वरूप, 06.05.2026 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने यह नोट किया कि प्रतिवादी के वकील को विवादित प्रेस रिलीज़ को बिना शर्त वापस लेने के निर्देश प्राप्त हो गए थे। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की कि प्रतिवादी ने प्रेस विज्ञप्ति को वापस लेकर उन गंभीर परिणामों को टाल दिया है, जो तब उत्पन्न हो सकते थे, यदि न्यायालय को मामले के गुण-दोष के आधार पर कोई आदेश पारित करने के लिए विवश होना पड़ता।


