6 जनवरी 2007 की एक शांत शाम। प्रतापगढ़ शहर रोज की तरह अपनी रफ्तार से चल रहा था। बाजारों में भीड़ थी। दुकानों पर चाय के दौर चल रहे थे। कोतवाली इलाके में लोग अपने-अपने काम निपटा रहे थे। शाम 6 बजकर 45 मिनट पर शहर की एक छोटी-सी गली में ऐसा धमाका हुआ, जिसने पूरे प्रतापगढ़ को हिला दिया। कोतवाली इलाके में अधिवक्ता गिरिराज जोशी अपने ऑफिस में बैठे थे। उनके साथ विशाल सालवी, राहुल कबाड़ी और नरेंद्र कबाड़ी भी मौजूद थे। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। ऑफिस के भीतर किसी जरूरी चर्चा का माहौल था। तभी अचानक दरवाजा खुला…एक युवक अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी। वह सीधे गिरिराज जोशी की तरफ बढ़ा और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उसने हथियार निकाला और फायर कर दिया। पहली गोली दाहिनी पसली में लगी…दूसरी कनपटी में। ऑफिस गोलियों की आवाज से गूंज उठा। कुर्सी से गिरकर गिरिराज जोशी ने वहीं दम तोड़ दिया। ऑफिस में बैठे लोग कुछ सेकेंड तक समझ ही नहीं पाए कि हुआ क्या है? गोली चलाने वाला युवक बाहर भागा, जहां उसका साथी बाइक स्टार्ट कर इंतजार कर रहा था। दोनों मंदसौर नाके की तरफ फरार हो गए। कुछ ही मिनटों में खबर पूरे शहर में फैल गई। वकील साहब को गोली मार दी। प्रतापगढ़ की सड़कों पर अफरा-तफरी मच गई। कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। ऑफिस के अंदर खून फैला था। कुर्सियां बिखरी थीं। लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। पुलिस ने इलाके को घेरा और अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया। लेकिन असली सवाल यही था- आखिर गिरिराज जोशी को क्यों मारा गया? शुरुआत में पुलिस को लगा कि यह पेशेवर दुश्मनी हो सकती है। गिरिराज जोशी शहर के चर्चित अधिवक्ता थे। कई बड़े मामलों में पैरवी कर चुके थे। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, मामला और उलझता गया। हत्या पूरी प्लानिंग के साथ हुई थी। शूटर सीधे ऑफिस तक पहुंचा। उसे पता था कि गिरिराज कहां बैठते हैं, किस वक्त अकेले मिलेंगे और हमला करके किस रास्ते भागना है। यानी कोई ऐसा था जो उनकी हर गतिविधि पर नजर रख रहा था। जांच में पुलिस को पहली बड़ी जानकारी तब मिली, जब कुछ लोगों ने बताया कि पिछले कई महीनों से गिरिराज जोशी एक जमीन विवाद में बेहद सक्रिय थे। शहर के धार्मिक स्थल के पास स्थित करीब दस बीघा जमीन को लेकर लगातार बैठकों और समझौतों का दौर चल रहा था। यह जमीन आखिर इतनी खास क्यों थी? चर्चा होने लगीं कि जमीन धार्मिक स्थल से सटी हुई थी और उसकी कीमत लगातार बढ़ रही थी। कई लोग उसे खरीदना चाहते थे। इस जमीन के दस्तावेज, मुकदमे और बातचीत में गिरिराज जोशी मुख्य भूमिका निभा रहे थे। पुलिस के सामने सवाल था क्या कोई जमीन के लिए हत्या तक कर सकता है? उधर शहर में अलग-अलग कहानियां फैलने लगीं। कोई कहता—“गिरिराज बहुत कुछ जानते थे.”कोई फुसफुसाता“समझौते में करोड़ों का खेल था..” तो कोई दावा करता“ उनकी हत्या पहले ही तय हो चुकी थी…” पुलिस ने मोबाइल कॉल रिकॉर्ड खंगाले, लोगों से पूछताछ की, मुखबिर लगाए…लेकिन शूटर का कोई सुराग नहीं मिला। हत्या के पीछे साजिश की बू जरूर महसूस हो रही थी, लेकिन चेहरा सामने नहीं आ रहा था। इसी बीच पुलिस को पता चला कि हत्या से कुछ दिन पहले कई संदिग्ध लोगों की बैठकों का दौर चला था। इनमें कुछ स्थानीय चेहरे थे, तो कुछ बाहरी लोग भी। लेकिन किसी के खिलाफ सीधे सबूत नहीं थे। फिर अचानक जांच ने मोड़ लिया। पुलिस ने एक-एक कर कुछ संदिग्धों को हिरासत में लेना शुरू किया। सबसे पहले नाम सामने आया—भाउद्दीन उर्फ बाउद्दीन। उसके बाद वसीम खान, अमीन खान, शाकिर बोहरा, चुन्नू उर्फ इमरान, मुस्तफा…और फिर कई अन्य नाम जांच के घेरे में आ गए। शहर हैरान था। इतने सारे लोग एक हत्या में कैसे शामिल हो सकते हैं? क्या यह सिर्फ हत्या थी…या किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा? पुलिस को शक था कि यह कोई साधारण शूटआउट नहीं, बल्कि पूरी प्लानिंग से किया गया “कॉन्ट्रैक्ट मर्डर” था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिन लोगों के नाम सामने आ रहे थे, वे एक-दूसरे से अलग-अलग तरीके से जुड़े हुए थे। कोई जमीन सौदे में था..कोई समझौता बैठकों में शामिल रहा..कोई कथित तौर पर पैसों के लेनदेन में… और कुछ ऐसे लोग भी थे जिनका नाम सुनकर लोग दंग रह गए। जांच आगे बढ़ी तो पुलिस को पता चला कि हत्या से पहले कई बार समझौते की कोशिश हुई थी। एक बैठक में 25 लाख रुपए और एक बीघा जमीन देने की बात भी सामने आई थी। इसके बाद अचानक सब कुछ बिगड़ गया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि बातचीत टेबल से उठकर गोलियों तक पहुंच गई? पुलिस के सामने यही सबसे बड़ा सवाल था। उधर गिरिराज जोशी के परिवार का आरोप था कि हत्या के पीछे बहुत बड़े लोग हैं और सच दबाने की कोशिश हो रही है। मामले ने राजनीतिक और सामाजिक रंग भी लेना शुरू कर दिया। प्रतापगढ़ में विरोध प्रदर्शन हुए। अधिवक्ताओं ने आंदोलन किया। पुलिस पर दबाव बढ़ता गया। मगर असली कहानी अभी भी अंधेरे में थी। क्योंकि जो लोग सामने दिख रहे थे…क्या वही असली खिलाड़ी थे? या फिर पर्दे के पीछे कोई और था…जो इस पूरी साजिश को चला रहा था? जांच के दौरान पुलिस ने करीब 183 दस्तावेज जुटाए। 102 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। केस इतना उलझ चुका था कि आखिरकार हाईकोर्ट के निर्देश पर ट्रायल प्रतापगढ़ से हटाकर चित्तौड़गढ़ जिला एवं सत्र न्यायालय में ट्रांसफर करना पड़ा। समय गुजरता गया। साल दर साल सुनवाई चलती रही। कुछ आरोपी मर गए और कुछ जेल में रहे..लेकिन गिरिराज जोशी की हत्या का सच अभी भी अदालत की फाइलों में कैद था। 14 साल बाद…1 अक्टूबर 2021 को अदालत ने फैसला सुनाया। 8 आरोपी दोषी करार दिए गए। आखिर अदालत ने किस आधार पर उन्हें दोषी माना? कौन था असली मास्टरमाइंड? और क्यों एक जमीन के टुकड़े के लिए रची गई इतनी खतरनाक साजिश? कल राजस्थान क्राइल फाइल्स, पार्ट-2 में पढ़िए आगे की कहानी…


