संपादकीय: एआइ का ‘बुलबुला’ और कंपनियों की समझदारी

संपादकीय: एआइ का ‘बुलबुला’ और कंपनियों की समझदारी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) मानव इतिहास की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति जरूर है लेकिन, इससे अतिशयोक्तिपूर्ण अपेक्षाओं की हवा अब निकलने लगी है। यह समझ लेना कि एआइ मानव संसाधन का स्थान ले लेगा वास्तविकता को बढ़ा-चढ़ाकर आंकने जैसा है। एआइ, दरअसल एक मशीन ही है और इससे काम लेने के लिए मानव संसाधन की आवश्यकता हमेशा रहेगी। प्रतिष्ठित ग्लोबल रिसर्च कंपनी ‘गार्टनर’ की हालिया रिपोर्ट एआइ की उपयोगिता और उस पर हो रहे अंधाधुंध खर्च को लेकर तीखे सवाल खड़े कर रही है। यह चर्चा अब तेज हो रही है कि क्या एआइ का ‘बुलबुला’ (हाइप) फूटने की कगार पर है? वैश्विक स्तर पर एआइ के विकास को समझने के लिए गार्टनर की ‘हाइप साइकल फॉर जेनरेटिव एआइ’ सटीक पैमाना माना जा सकता है। इसमें यह बताया गया है कि कोई भी नई तकनीक पांच चरणों से गुजरती है। एआइ अब ‘अतिशयोक्तिपूर्ण उम्मीदों के शिखर’ को पार कर ‘मोहभंग के दौर’ में प्रवेश कर चुका है।

कंपनियों ने एआइ से जो तात्कालिक वित्तीय लाभ और उत्पादकता में क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद की थी, वह धरातल पर वैसी साबित नहीं हो रही है। एआइ प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन की अत्यधिक लागत, डेटा सुरक्षा की चिंताएं और एआइ की गलत या भ्रामक जानकारियां इसके मुख्य कारण हैं। ‘गार्टनर’ की रिपोर्ट में चेतावनी है कि कम से कम 30 फीसदी जेनरेटिव एआइ प्रोजेक्ट भारी लागत और अपना स्पष्ट वैल्यू साबित न कर पाने के कारण शुरुआती दौर के बाद बंद हो सकते हैं। इस तकनीकी अति-उत्साह का सबसे दुखद प्रभाव मानव संसाधन पर पड़ा है। वैश्विक टेक दिग्गजों ने एआइ को अपनाकर लागत कम करने के नाम पर लाखों कर्मचारियों की छंटनी की है। कंपनियों को लगा कि एआइ कोडिंग, कंटेंट निर्माण और ग्राहक सेवा जैसे काम बिना किसी इंसानी मदद के संभाल लेगा। लेकिन एआइ अभी तक जटिल निर्णय लेने, रचनात्मकता दिखाने और मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह समझने में अक्षम साबित हुआ है। उल्टे छंटनी की वजह से कंपनियों ने अपने सबसे मूल्यवान ‘संस्थागत ज्ञान’ को खो दिया है। यह स्थिति कंपनियों के लिए ‘पछतावे का सबब’ बन सकती है।

गनीमत है कि भारत में एआइ अपनाने के मामले में अपेक्षाकृत सावधानी बरती जा रही है। ज्यादातर कंपनियों ने अंधाधुंध छंटनी करने की बजाय अपने कर्मचारियों को एआइ कौशल सीखने के लिए प्रेरित किया है। ‘एआइ घोड़े’ (मशीन) को अपनाने की बेहतर रणनीति यही है कि धीरे-धीरे उसे परिपक्व होने दिया जाए और साथ ही साथ मानव संसाधन को भी उसकी सवारी करने के लिए तैयार किया जाए। एआइ के कारण ‘जॉब स्ट्रक्चर’ में व्यापक बदलाव होना अवश्यम्भावी है, पर इसे सहजता से मानव जीवन का हिस्सा बनने दिया जाना समय की पुकार है।

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