मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने वन विभाग के एक बेहद चौंकाने वाले और तानाशाही फैसले पर रोक लगाते हुए शुक्रवार को एक दैनिक वेतन भोगी चौकीदार के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। जिला मेडिकल बोर्ड की वैज्ञानिक रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंककर कर्मचारी को अधिकारियों ने मनमाने ढंग से जबरन रिटायर करने के विभाग के दो अलग-अलग आदेश दिए थे। मतलब कागजों में दो बार रिटायर्ड किया है। इन आदेशों को हाईकोर्ट ने पूरी तरह निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने वन विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता कर्मचारी को अप्रैल 2029 में उसकी कानूनी सेवाकाल की आयु (62 वर्ष) पूरी होने तक सम्मान सहित नौकरी पर बनाए रखा जाए। कोर्ट ने साल 2017 में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट जिसमें उस समय उसकी उम्र 50 वर्ष मानकर ही फैसला लिया है। ऐसे समझें पूरा मामला साल 2018 में दूसरी बार रिटायरमेंट कर दिया हाईकोर्ट ने कहा-“विशेषज्ञों की रिपोर्ट सर्वोपरि” हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की सिंगल बेंच ने इस मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए वन विभाग के रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि “जब वन विभाग ने खुद अपनी मर्जी से याचिकाकर्ता को आयु निर्धारण के लिए अधिकृत जिला मेडिकल बोर्ड के समक्ष भेजा था, तो डॉक्टरों के विशेषज्ञ बोर्ड द्वारा प्रमाणित की गई 50 वर्ष (साल 2017 में) की आयु को प्रशासनिक अधिकारी अपनी टेबल पर बैठकर मनमाने ढंग से बदल नहीं सकते। विभाग कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई भी कानूनी दस्तावेज, जन्म प्रमाण पत्र या विपरीत मेडिकल ओपिनियन पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है, जिससे जिला मेडिकल बोर्ड की प्रामाणिकता पर रत्ती भर भी संदेह किया जा सके।” अब तीसरी बार साल 2029 में रिटायर होगा “चौकीदार’ हाईकोर्ट ने साहब सिंह ठाकुर की याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए वन विभाग के काले आदेशों को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि साहब सिंह अप्रैल 2029 तक सम्मानपूर्वक अपनी ड्यूटी करेंगे। इसके साथ ही, विभाग की इस मनमानी के कारण पूर्व में उन्हें जो भी आर्थिक या मानसिक नुकसान हुआ है, उन्हें नियमित वेतनमान सहित सभी तरह के बैक-वेजेस (सेवा लाभ और एरियर) का भुगतान तत्काल किया जाए।


