प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को अधिक तार्किक बनाने की जरूरत

प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को अधिक तार्किक बनाने की जरूरत

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल,(सामाजिक सरोकारों से जुड़े मामलों के जानकार) –

प्रतियोगिताओं के बोझ के कारण आज का युवा अपनी नैसर्गिक प्रतिभा खो रहा है। इन परीक्षाओं में प्रतियोगी के एक दिन या तात्कालिक प्रदर्शन को ही आधार बनाया जाता है। वह दिन प्रतियोगी विशेष के लिए शारीरिक, सामाजिक या अन्य कारणों से सामान्य नहीं हो सकता। ऐसे में परिणाम उस दिन के प्रदर्शन पर निर्भर होता है जबकि यह केवल परीक्षा विशेष के लिए गुणात्मक आधार नहीं देता। हालांकि उच्चतर शिक्षा और रोजगार की आशा लिए युवाओं के पास इस दौर से गुजरने के अलावा विकल्प भी नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव और युवाओं की चुनौती
संभवतया प्रतियोगिताओं के व्यापक विस्तार को दृष्टिगत रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2015 को लालकिले की प्राचीर से सरकार में बी, सी और डी समूह की भर्तियों के लिए साक्षात्कार को विलोपित करने के लिए कहा था। युवाओं पर बढ़ते सामाजिक, मानसिक और आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में यह एक सार्थक कदम था। किंतु हर स्तर पर भर्ती के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की वेदना कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से परीक्षाओं की संख्या को न्यूनतम तक ले जाने के बजाय राज्य स्तरीय टेस्टिंग एजेंसियों का गठन किया जाता है।

एक परीक्षा से कई अवसर देने की जरूरत
प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण का यदि विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए तो वह औपचारिक शिक्षा को प्रमुखता प्रदान कर उसके आधार पर प्रवेश प्रक्रिया को अंजाम देने का दर्शन रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में प्रतियोगिताओं के नाम पर प्रतियोगी, अभिभावक और शहरों को हो रही असुविधा को समाप्त करना है। अनेक परीक्षाएं अपना औचित्य भी नहीं रखतीं, अर्थात उनके बिना भी प्रवेश या रोजगार दिया जाना संभव हो सकता है। प्रशासनिक और वित्तीय सुधार की दृष्टि से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को तार्किक आधार के साथ एक-दूसरे के साथ मिलाना या एक परीक्षा के परिणाम को दूसरे चयन का आधार बनाना चाहिए। साथ ही, सरकारी भर्तियों के लिए समेकित योजना से भी प्रतियोगिताओं की संख्या पर अंकुश लग सकता है। राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय ने विभिन्न पैरामेडिकल कोर्सेज की अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं के स्थान पर एक संयुक्त परीक्षा की व्यवस्था की। इस तरह प्रवेशार्थी को अनेक परीक्षाओं की जगह केवल एक परीक्षा देनी होगी।

प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता कारोबार और छात्रों की दुविधा
रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए विद्यालयी या महाविद्यालयी परीक्षा परिणामों को आधार बनाने से एक बड़ा तबका राहत महसूस करेगा। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं पर आधारित विशाल अर्थव्यवस्था से जुड़े हितधारक इस दृष्टिकोण पर भारी पड़ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठान नई प्रतियोगिताओं को बढ़ावा देते हैं, जबकि प्रामाणिक जानकारी के अभाव में छात्र व्यावसायिक संस्थानों की ओर आकर्षित हो जाते हैं।

आइआइटी कानपुर की पहल से विकसित साथी ऐप ने विशेषज्ञ सामग्री के साथ विभिन्न परीक्षाओं के लिए उपयोगी मंच उपलब्ध कराया है। सीबीएसई ने भी विद्यार्थियों को साथी से जोडऩे के निर्देश दिए हैं, जिससे उन्हें अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके। आवश्यकता है कि इस प्रकार की पहल देश के समस्त शीर्ष संस्थानों द्वारा की जाए। अत: प्रतियोगिताओं की वर्तमान प्रणाली को संख्यात्मक दृष्टि से कम करते हुए तार्किक और गुणात्मक आधार प्रदान करने की आवश्यकता है।

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