जोधपुर झाल में मिली कछुओं की तीन दुर्लभ प्रजातियाँ:वेटलैंड में हो रहा प्रजनन,UPBTVP और वन विभाग ने किया है मथुरा स्थित वेटलैंड को विकसित

जोधपुर झाल में मिली कछुओं की तीन दुर्लभ प्रजातियाँ:वेटलैंड में हो रहा प्रजनन,UPBTVP और वन विभाग ने किया है मथुरा स्थित वेटलैंड को विकसित

उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद द्वारा विकसित और वन विभाग के संरक्षण में फरह क्षेत्र स्थित जोधपुर झाल वेटलैंड से जैव विविधता के संरक्षण को लेकर एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इस वेटलैंड में कछुओं की तीन प्रमुख प्रजातियों की उपस्थिति रिकार्ड की है। इन प्रजातियों में इंडियन फ्लैपशेल टर्टल, स्पॉटेड पॉन्ड टर्टल और इंडियन रूफ्ड टर्टल शामिल हैं। वेटलैंड को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने में कछुआ निभाते हैं भूमिका गंभीर संकटग्रस्त प्रजाति के कछुओ की ये उपस्थिति जोधपुर झाल के पारिस्थितिक तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण संकेतक है। बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसाइटी के ईकोलॉजिस्ट डॉ के पी सिंह ने बताया कि वेटलैंड को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने में इन कछुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ये कछुए जल में मौजूद मृत जीवों, सड़े-गले पौधों को खाकर पानी को साफ रखते हैं। इससे पानी में हानिकारक बैक्टीरिया नहीं पनपते। शैवाल और जलीय खरपतवार को नियंत्रित कर ये पानी में ऑक्सीजन के स्तर को बनाए रखते हैं। जिससे अन्य मछलियों और जलीय जीवों का जीवन सुरक्षित रहता है। जलीय कीटों और घोंघों की आबादी को करते हैं नियंत्रित इस वेटलैंड पर गंभीर संकटग्रस्त प्रजाति के कछुओ का मिलना उच्च स्तरीय जैव विविधता का संकेत है। बी आर आंबेडकर विश्वविद्यालय की शोधार्थी निधि यादव के अनुसार कछुए जलीय कीटों और घोंघों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। साथ ही इनके अंडे और छोटे बच्चे बड़े पक्षियों व जीवों का भोजन बनते हैं जिससे खाद्य श्रृंखला सुचारू रूप से चलती है। बीआरडीएस के अब्दुल कलाम के अनुसार वेटलैंड के तलहटी में रहने के कारण कछुए मिट्टी को लगातार उलटते-पुलटते रहते हैं। इससे पोषक तत्वों का रीसाइक्लिंग बेहतर होती है जिससे वेटलैंड की मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है। इन तीन प्रजातियों को किया गया रिकार्ड जोधपुर झाल में मिले कछुओं में इंडियन फ्लैपशेल टर्टल इसे हिंदी में सुंदरी कछुआ कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम लिसेमिस पंक्टाटाहै। यह आईयूसीएन की रेड डाटा बुक मे वल्नरेविल प्रजाति के रूप में दर्ज है। इसके अलावा स्पॉटेड पॉन्ड टर्टल इसका हिंदी नाम चित्तीदार कछुआ एवं कूर्म है। वैज्ञानिक नाम जियोक्लेमिस हैमिल्टोनी है। आईयूसीएन स्थिति में यह एनडेन्जर्ड प्रजाति के रूप में दर्ज है। वहीं तीसरी प्रजाति इंडियन रूफ्ड टर्टल की है। इसे हिंदी में तिलहारा अथवा चंदन कछुआ कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम पंगशुरा टेक्टा है। आईयूसीएन संरक्षण स्थिति वल्नरेविल है। जोधपुर झाल वेटलैंड संकटग्रस्त वन्यजीवों के लिए अनुकूल डीएफओ वेंकटा श्रीकर पटेल ने बताया कि वन विभाग जोधपुर झाल वेटलैंड में जल प्रबंधन, हेविटाट मेनेजमेंट और सुरक्षा पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस कारण पक्षी वर्ग की प्रजातियों के साथ-साथ अन्य वर्ग के वन्यजीव भी रिकॉर्ड हो रहे हैं। यहां तीन संकटग्रस्त प्रजाति के कछुओं का मिलना इस बात का प्रमाण है कि यह वेटलैंड सभी वर्ग के वन्यजीवों के लिए अनुकूल है।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *