Naxalite Network: 40 साल में खड़ा किया सबसे घातक नेटवर्क. कांकेर से कोंटा तक हजारों गुप्त बंकर, पढ़ें नक्सलियों की पूरी कहानी

Naxalite Network: 40 साल में खड़ा किया सबसे घातक नेटवर्क. कांकेर से कोंटा तक हजारों गुप्त बंकर, पढ़ें नक्सलियों की पूरी कहानी

Naxalite Network:@आकाश मिश्रा। बस्तर से नक्सलवाद के खात्मे की आधिकारिक घोषणा भले ही 31 मार्च 2026 को कर दी गई हो, लेकिन चार दशकों के दौरान नक्सलियों द्वारा खड़े किए गए दुनिया के सबसे घातक ‘अंडरग्राउंड साम्राज्य’ का खौफनाक खतरा आज भी जस का तस बरकरार है। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और खूनी बीहड़ों के नीचे छिपा यह अदृश्य भूमिगत नेटवर्क आज भी सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी और अंतिम चुनौती बना हुआ है। इसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के लिए बस्तर के सात जिलों में इस वक्त देश का सबसे बड़ा और जटिल महा-सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है, जिसमें 30 हजार से अधिक जांबाज जवान अपनी जान हथेली पर लेकर जुटे हुए हैं।

Naxalite Network: नक्सलियों की खौफनाक कहानी

इस बेहद संवेदनशील और खूनी अभियान के दौरान हाल ही में कांकेर और नारायणपुर की सीमा पर हुए आईईडी ब्लास्ट में हमारे 4 जवान शहीद भी हो चुके हैं, जो इस छिपे हुए पाताललोक की भयावहता को साफ दर्शाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफिया एजेंसियों का दोटूक मानना है कि दुनिया के किसी भी अन्य उग्रवादी या विद्रोही संगठन के पास ऐसा मजबूत, अचूक और व्यापक भूमिगत नेटवर्क कभी नहीं रहा। पत्रिका में पहली बार पढ़ें नक्सलियों की खौफनाक भूमिगत नेटवर्क की पूरी कहानी…. जो बस्तर की धरती के नीचे बारूद का एक ऐसा मरणव्यूह बन चुका है, जहां आज भी कदम-कदम पर सिर्फ और सिर्फ मौत का खतरा मंडरा रहा है।

पहाड़ों में ‘आंखें’ और जमीन में ‘डेथ ट्रैप’

कांकेर से लेकर कोंटा तक फैले बस्तर के जंगलों में नक्सलियों ने अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति के तहत हजारों गुप्त बंकर, फॉक्स होल (फायरिंग पॉइंट), भूमिगत सुरंगें और खुफिया कमांड सेंटर बना रखे हैं। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की हर हलचल और रणनीति पर नजर रखने के लिए ऊंची पहाड़ियों के भीतर बेहद चालाकी और तकनीक से ‘ऑब्जर्वेशन पॉइंट’ तैयार किए थे, जो बाहर से बिल्कुल सामान्य पहाड़ दिखते हैं। जमीन के नीचे ऐसे संकरे फॉक्स होल बनाए गए जहां नक्सली लड़ाके कई दिनों तक बिना किसी हलचल के राशन-पानी के साथ छिपे रह सकते थे। इन ठिकानों का इस्तेमाल न केवल छिपने के लिए, बल्कि सुरक्षा बलों को फंसाकर उन पर अचानक अंधाधुंध घात (एंबुश) लगाने के लिए किया जाता था।

श्रीलंका के ‘लिट्टे’ से ली थी विनाश की तकनीक

नक्सलियों के इस घातक और जानलेवा नेटवर्क का काला इतिहास 1980 और 1990 के दशक के दौर से जुड़ा है। नक्सली संगठन के पूर्व टॉप कमांडर बसवाराजू ने श्रीलंका के कुख्यात उग्रवादी संगठन ‘लिट्टे’ (एलटीटीई) से आईईडी बनाने और फॉक्स होल तैयार करने की घातक और आत्मघाती तकनीक सीखी थी। इसके बाद वह इस खूनी तकनीक को बस्तर के जंगलों में लेकर आया।

‘लिट्टे’ से भी अधिक खतरनाक और मारक

समय के साथ नक्सलियों ने बस्तर की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और घने जंगलों के हिसाब से इस तकनीक को इस हद तक अपग्रेड और मॉडिफाई कर दिया कि यह मूल ‘लिट्टे’ से भी अधिक खतरनाक और मारक बन गई। यही कारण है कि आज भी जंगलों में चल रहे खोजी अभियान के दौरान हमारे जवानों को सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं भूमिगत आईईडी नेटवर्क से उठाना पड़ रहा है।

‘कर्रेगुट्टा हिल्स’: नक्सलियों का अभेद्य कंक्रीट किला

बीजापुर जिले में स्थित ‘कर्रेगुट्टा हिल्स’ नक्सलियों का सबसे बड़ा, सुरक्षित और आधुनिक अंडरग्राउंड मॉडल माना जाता है। पिछले साल सुरक्षा बलों ने यहां लगातार 15 दिनों तक एक व्यापक और आक्रामक ऑपरेशन चलाया था। इस दौरान पहाड़ियों को काटकर बनाए गए भीतर के बंकरों की बनावट और उनकी मजबूती देखकर खुद जवान और सैन्य अधिकारी हैरान रह गए थे।

लंबे समय तक युद्ध करने की तैयारी थी

ये बंकर कंक्रीट और प्राकृतिक पत्थरों के कॉम्बिनेशन से इस तरह ढके गए थे कि इनके ऊपर से पैर रखकर गुजरने पर भी नीचे किसी सुरंग या इंसानी वजूद के होने का अंदाजा लगाना नामुमकिन था। इन बंकरों के भीतर आधुनिक स्वचालित हथियार, भारी मात्रा में गोला-बारूद, वायरलेस संचार उपकरण, आपातकालीन जीवन रक्षक दवाइयां और महीनों का सूखा राशन जमा था। इससे साफ है कि नक्सलियों ने इसे लंबे समय तक चलने वाले सीधे और बड़े युद्ध (वॉर ज़ोन) के लिए तैयार किया था।

मिल रहा है अंधाधुंध कैश और गोल्ड

जैसे-जैसे सुरक्षा बल बीजापुर से लेकर अबूझमाड़ के उन अबूझ जंगलों के भीतर दाखिल हो रहे हैं जहां कभी सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंचती थी, वैसे-वैसे नक्सलियों के इस साम्राज्य के बड़े आर्थिक पहलू और खजाने भी उजागर हो रहे हैं। अब इन खुफिया ठिकानों और डंपिंग पॉइंट्स से केवल बंदूकें, जिलेटिन या बारूद ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में बेनामी नकदी (कैश) और शुद्ध सोना (गोल्ड) भी बरामद हो रहा है।

30 हजार जवान महा-अभियान में शामिल

अधिकारियों के अनुसार, यह नक्सलियों का ‘वार चेस्ट’ (आर्थिक नेटवर्क) था, जिसे उन्होंने संगठन के भविष्य और दोबारा खड़े होने के लिए जमीन के नीचे छिपाकर रखा था। अकेले बीजापुर जिले के भूमिगत ठिकानों से अब तक 20 करोड़ रुपए से अधिक की नकदी और भारी मात्रा में कीमती सामग्री जब्त की जा चुकी है। अधिकारियों का साफ कहना है कि 30 हजार जवानों का यह महा-अभियान तब तक थमेगा नहीं, जब तक बस्तर की पावन धरती के नीचे दबे इस अंतिम बारूदी तंत्र को पूरी तरह उखाड़कर हमेशा के लिए दफन नहीं कर दिया जाता।

नीचे था खुफिया कमांड सेंटर, भारी मात्रा में बारूद मिला

नारायणपुर: सुरक्षा बलों ने अबूझमाड़ के काकुर (सोनपुर) में नक्सलियों के एक रणनीतिक ‘अंडरग्राउंड हाउस’ (भूमिगत तहखाने) को ध्वस्त कर दिया है। यह गुप्त अड्डा ऊपर से सामान्य जमीन जैसा दिखता था, लेकिन भीतर इसके सुरक्षित बैठक कक्ष और आपातकालीन रास्ते बने थे, जहां से नक्सली अपनी गतिविधियों का संचालन करते थे। नक्सलवाद कमजोर पड़ने के बाद अब सुरक्षा बल जंगलों में वर्षों से दबे विशाल हथियारों, गोला-बारूद और आईईडी (IED) डंप्स को खोजकर निष्क्रिय कर रहे हैं। इस कार्रवाई से नक्सलियों की लॉजिस्टिक सप्लाई और छिपने की क्षमता टूट चुकी है, जो सुरक्षा बलों की बड़ी रणनीतिक जीत है।

बस्तर के जंगलों में मिले प्रमुख नक्सली ‘डेथ डंप’

हथियार और बारूद डंप (अनुमानित 1,200 स्थान): सुरक्षा बलों को अब तक एक हजार से अधिक ऐसे गुप्त ठिकाने मिले हैं जहां भारी मात्रा में जिलेटिन रॉड्स, डेटोनेटर, गन पाउडर, रॉकेट लॉन्चर के शेल और आईईडी बनाने की सामग्री जमीन के नीचे ड्रमों में भरकर छिपाई गई थी।

कर्रेगुट्टा और अबूझमाड़ के कंक्रीट बंकर (50 बड़े ठिकाने): पहाड़ियों को काटकर बनाए गए ये बंकर नक्सलियों के मुख्य कमांड सेंटर थे। यहां से हाई-टेक वायरलेस सेट, सोलर चार्जिंग सिस्टम और मिलिट्री ग्रेड की दवाइयां बरामद हुई हैं।

मुख्य घटना: नारायणपुर जिले के काकुर (सोनपुर क्षेत्र) के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक ‘अंडरग्राउंड हाउस’ (भूमिगत तहखाने) को खोजकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

इन जिलों में इतने डंप और नकद राशि की बरामदगी

बीजापुर: 8 डंप – 20 करोड़

सुकमा: 5 डंप – 8 करोड़

दंतेवाड़ा: 2 डंप – 6 करोड़

नारायणपुर: 4 डंप – 5 करोड़

कांकेर: 2 डंप – 2 करोड़

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