लखनऊ में मोबाइल और इंटरनेट की शुरुआत ने सरकारी कामकाज की दिशा बदल दी। देश में मोबाइल फोन 1995 में आया, जबकि लखनऊ में पहला मोबाइल कनेक्शन जुलाई 1996 में सूचना निदेशक के नाम जारी हुआ। इंटरनेट की शुरुआत भी यहीं से हुई, जब पहला कनेक्शन सूचना विभाग ने लिया। उस दौर में सूचना विभाग सरकार की आंख और कान माना जाता था, और आज भी तकनीक व लेखनी के मेल से इसकी भूमिका उतनी ही अहम बनी हुई है। ये बातें सूचना भवन ऑडिटोरियम में ‘रिटायर्ड इन्फॉर्मेशन जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन’ के पहले सम्मान समारोह में पूर्व सूचना निदेशक रोहित नंदन ने कहीं। कार्यक्रम में पूर्व सूचना निदेशक सुधेश ओझा, अजय उपाध्याय और पूर्व अपर निदेशक डॉक्टर अनिल पाठक भी मौजूद रहे। अहमियत को करीब से समझा रोहित नंदन तीन बार सूचना निदेशक पद संभालने वाले इकलौते अधिकारी रहे हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वह इस पद पर आना नहीं चाहते थे, लेकिन लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने इसकी अहमियत को करीब से समझा। उनके मुताबिक, सूचना विभाग सरकार की छवि गढ़ने का काम करता है और आम लोगों के मन में सकारात्मक छवि बनाना आसान नहीं होता। मोबाइल और इंटरनेट जैसी नई तकनीकें सबसे पहले इसी विभाग तक पहुंचती हैं, जो इसकी भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाती हैं। पूर्व मुख्य सचिव और चुनाव आयुक्त रहे अनूप चंद्र पांडेय ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि कई बड़े पदों पर रहने के बावजूद सूचना निदेशक का कार्यकाल सबसे यादगार रहा। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि बजट से जुड़ी एक प्रेस विज्ञप्ति में दर्ज जानकारी पर विधानसभा में बहस हो गई थी और अंततः सरकार को विभाग की बात माननी पड़ी। इससे इस पद की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। एसोसिएशन की पत्रिका ‘रिजवा’ का विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति राघवेंद्र कुमार ने सूचना विभाग के कामों को सराहनीय बताया। इस दौरान एसोसिएशन की पत्रिका ‘रिजवा’ का विमोचन हुआ।रोहित नंदन को अशोक प्रियदर्शी स्मृति सूचना सम्मान और अनूप चंद्र पांडेय को उमेश कुमार सिंह चौहान स्मृति सम्मान दिया गया।साथ ही विभाग के कई अन्य पूर्व अधिकारियों को भी सम्मानित किया गया।


