बेगूसराय के दिनकर आवास पर गूंजी रश्मिरथी की हुंकार:सिमरिया में सातों सर्गों का पाठ हुआ, पुस्तकालय अध्यक्ष बोले- ये जीवन का दर्शन है

बेगूसराय के दिनकर आवास पर गूंजी रश्मिरथी की हुंकार:सिमरिया में सातों सर्गों का पाठ हुआ, पुस्तकालय अध्यक्ष बोले- ये जीवन का दर्शन है

‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है..’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की लेखनी से निकले ये शब्द आज एक बार फिर उनके पैतृक आवास सिमरिया में गूंजे। अवसर राष्ट्रकवि की 52वीं पुण्यतिथि का था । जिसे उनकी कालजयी कृति रश्मिरथी के हीरक जयंती वर्ष (75 वर्ष) के रूप में बेहद भव्य तरीके से मनाया गया। दिनकर स्मृति विकास समिति और दिनकर पुस्तकालय के संयुक्त देखरेख में आयोजित इस कार्यक्रम में रश्मिरथी के सभी सातों सर्गों का सस्वर पाठ ने उपस्थित श्रोताओं में नई ऊर्जा का संचार किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दिनकर पुस्तकालय के अध्यक्ष विश्वंभर सिंह ने कहा कि रश्मिरथी केवल एक काव्य नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जहां मानवीय मूल्यों में गिरावट आ रही है, वहां दिनकर की रचनाएं और विशेषकर रश्मिरथी के पात्र कर्ण का संघर्ष हमें विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने की प्रेरणा देता है। 75 साल बीत जाने के बाद भी इस कृति का एक-एक शब्द उतना ही प्रासंगिक है, जितना इसके सृजन के समय था। रश्मिरथी के सात अध्यायों को दी आवाज सिमरिया स्थित दिनकर जी के आवास पर आयोजित इस काव्य गोष्ठी में सात अलग-अलग वाचकों ने रश्मिरथी के सात अध्यायों (सर्गों) को अपनी आवाज दी। पाठ की शुरुआत कर्ण के शौर्य और उसके सामाजिक तिरस्कार के चित्रण से हुई और अंत महाप्रयाण के साथ हुआ। पूरा कार्यक्रम अद्भुत था और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। प्रथम सर्ग का पाठ प्रवीण प्रियदर्शी, द्वितीय सर्ग का पाठ संजीव फिरोज, तृतीय सर्ग (कृष्ण की चेतावनी) का पाठ अमन कुमार, चतुर्थ सर्ग का पाठ विनोद बिहारी, पंचम सर्ग का पाठ जितेंद्र झा, छठा सर्ग का पाठ रामनाथ सिंह एवं सप्तम सर्ग (कर्ण का अंत) का पाठ राजेश कुमार सिंह ने किया। विशेषकर तृतीय सर्ग कृष्ण की चेतावनी का पाठ जब छोटे बच्चे अमन कुमार ने किया, तो इस दौरान पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वाचकों ने कविता के भाव वीर, करुण और रौद्र रसको बखूबी प्रस्तुत किया। इस भावुक और प्रेरणादायी क्षण के गवाह दिनकर जी के परिवार के सदस्य और ग्रामीण बने। दिनकर की स्मृतियों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी इस अवसर पर राष्ट्रकवि दिनकर की पौत्रवधू कल्पना सिंह ने दिनकर की स्मृतियों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके साथ ही सुनील कुमार सिंह, प्रदीप कुमार, अश्विनी कुमार समेत बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और स्थानीय ग्रामीण उपस्थित थे। कार्यक्रम ने दिखाया कि राष्ट्रकवि अपनी कविताओं के माध्यम से आज भी जनमानस के दिलों में जीवित हैं। दिनकर पुस्तकालय और स्मृति विकास समिति द्वारा आयोजित इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी साहित्यिक विरासत से जोड़ना है। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वक्ताओं ने कहा कि दिनकर जी की रचनाएं केवल हिंदी साहित्य की धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले हर व्यक्ति का संबल हैं। ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है..’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की लेखनी से निकले ये शब्द आज एक बार फिर उनके पैतृक आवास सिमरिया में गूंजे। अवसर राष्ट्रकवि की 52वीं पुण्यतिथि का था । जिसे उनकी कालजयी कृति रश्मिरथी के हीरक जयंती वर्ष (75 वर्ष) के रूप में बेहद भव्य तरीके से मनाया गया। दिनकर स्मृति विकास समिति और दिनकर पुस्तकालय के संयुक्त देखरेख में आयोजित इस कार्यक्रम में रश्मिरथी के सभी सातों सर्गों का सस्वर पाठ ने उपस्थित श्रोताओं में नई ऊर्जा का संचार किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दिनकर पुस्तकालय के अध्यक्ष विश्वंभर सिंह ने कहा कि रश्मिरथी केवल एक काव्य नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जहां मानवीय मूल्यों में गिरावट आ रही है, वहां दिनकर की रचनाएं और विशेषकर रश्मिरथी के पात्र कर्ण का संघर्ष हमें विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने की प्रेरणा देता है। 75 साल बीत जाने के बाद भी इस कृति का एक-एक शब्द उतना ही प्रासंगिक है, जितना इसके सृजन के समय था। रश्मिरथी के सात अध्यायों को दी आवाज सिमरिया स्थित दिनकर जी के आवास पर आयोजित इस काव्य गोष्ठी में सात अलग-अलग वाचकों ने रश्मिरथी के सात अध्यायों (सर्गों) को अपनी आवाज दी। पाठ की शुरुआत कर्ण के शौर्य और उसके सामाजिक तिरस्कार के चित्रण से हुई और अंत महाप्रयाण के साथ हुआ। पूरा कार्यक्रम अद्भुत था और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। प्रथम सर्ग का पाठ प्रवीण प्रियदर्शी, द्वितीय सर्ग का पाठ संजीव फिरोज, तृतीय सर्ग (कृष्ण की चेतावनी) का पाठ अमन कुमार, चतुर्थ सर्ग का पाठ विनोद बिहारी, पंचम सर्ग का पाठ जितेंद्र झा, छठा सर्ग का पाठ रामनाथ सिंह एवं सप्तम सर्ग (कर्ण का अंत) का पाठ राजेश कुमार सिंह ने किया। विशेषकर तृतीय सर्ग कृष्ण की चेतावनी का पाठ जब छोटे बच्चे अमन कुमार ने किया, तो इस दौरान पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वाचकों ने कविता के भाव वीर, करुण और रौद्र रसको बखूबी प्रस्तुत किया। इस भावुक और प्रेरणादायी क्षण के गवाह दिनकर जी के परिवार के सदस्य और ग्रामीण बने। दिनकर की स्मृतियों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी इस अवसर पर राष्ट्रकवि दिनकर की पौत्रवधू कल्पना सिंह ने दिनकर की स्मृतियों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके साथ ही सुनील कुमार सिंह, प्रदीप कुमार, अश्विनी कुमार समेत बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और स्थानीय ग्रामीण उपस्थित थे। कार्यक्रम ने दिखाया कि राष्ट्रकवि अपनी कविताओं के माध्यम से आज भी जनमानस के दिलों में जीवित हैं। दिनकर पुस्तकालय और स्मृति विकास समिति द्वारा आयोजित इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी साहित्यिक विरासत से जोड़ना है। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वक्ताओं ने कहा कि दिनकर जी की रचनाएं केवल हिंदी साहित्य की धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले हर व्यक्ति का संबल हैं।  

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