सांवलिया सेठ मंदिर में 56 भोग और मोरपंख चढ़ाने की परंपरा पर रोक, श्रद्धालुओं के लिए नई व्यवस्था शुरु

सांवलिया सेठ मंदिर में 56 भोग और मोरपंख चढ़ाने की परंपरा पर रोक, श्रद्धालुओं के लिए नई व्यवस्था शुरु

चित्तौड़गढ़: मंडफिया स्थित प्रसिद्ध सांवलिया सेठ मंदिर में दर्शन की व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव किया गया है। जिसका असर लाखों श्रद्धालुओं पर पड़ेगा। भक्तों की आस्था का केंद्र माने जाने वाले इस मंदिर में कई वर्षों से चली आ रही 56 भोग लगाने की परम्परा पर अब रोक रहेगी। इसके साथ ही भगवान को मोरपंख चढ़ाने पर भी रोक लगा दी गई है। मंदिर प्रशासन का कहना है कि यह फैसला मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा, मंदिर की स्वच्छता और व्यवस्था को ध्यान में रखकर लिया गया है।

मंदिर में दर्शन करने आने वाले भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे लंबी कतारें लगने लगी थीं। इसलिए यह व्यवस्था लागू की गई है। यदि किसी श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है या कोई भी मन से भेंट चढ़ाना चाहता है, तो नकद राशि, सोना और चांदी पहले की तरह दानपात्र की व्यवस्था अभी भी सुचारु है। इसके साथ एक नई व्यवस्था शुरु की गई है अगर भक्त भोग लगाना चाहते हैं, तो मंदिर के काउंटर से रसीद कटवाकर राजभोग लगा सकते हैं। इससे हजारों लोगों की लाइन न रुकवा कर मंदिर प्रशासन भोग करवा देगा।

56 भोग में लग रहा था ज्यादा समय, रुक रही थी दर्शन करने की लाइन

मंदिर मंडल के अनुसार, जब कोई भक्त निजी रूप से 56 भोग चढ़ाता था, तो पूरी प्रक्रिया में करीब 1 घंटा लग जाता था। दिन में कई बार ऐसा होने से सामान्य श्रद्धालुओं की दर्शन लाइन काफी देर तक रुक जाती थी। इससे हजारों भक्तों को परेशानी होती थी। मंदिर मंडल अध्यक्ष हाजरी दास वैष्णव ने बताया की देश के कई बड़े मंदिरो में ऐसी व्यवस्था पहले से लागू है और साथ ही इसे बेहतर प्रबंधन की दिशा में जरूरी कदम बताया है। अब भक्तों को मंदिर परिसर के अधिकृत काउंटर से ही शुद्ध बालभोग और राजभोग उपलब्ध कराया जाएगा। इससे प्रसाद की गुणवत्ता बनी रहेगी और गर्भगृह भी साफ-सुथरा रहेगा। हालांकि इस फैसले के बाद मंदिर के पुजारी संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि वे इस निर्णय के विरोध में ज्ञापन सौंपेंगे।

स्वच्छता बनी रहे इसलिए मोरपंख पर भी रोक

मंदिर प्रशासन ने केवल 56 भोग ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक वाले मोरपंख चढ़ाने पर भी रोक लगाई है। प्रशासन का मानना है कि बाजार में बिकने वाले मोरपंख की गुणवत्ता ठीक नहीं होती, जिससे मंदिर की पवित्रता और स्वच्छता खराब होती है। इसको ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है।

क्यों खास है सांवलिया सेठ मंदिर?

मेवाड़ का यह प्रसिद्ध मंदिर केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी परंपरा के लिए भी जाना जाता है। यहां कई व्यापारी भगवान सांवलिया सेठ को अपने व्यापार का भागीदार मानते हैं और मुनाफे का एक हिस्सा मंदिर में अर्पित करते हैं। इसी वजह से इसे राजस्थान के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिना जाता है। हर महीने यहां करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, जिसमें नकद, सोना और चांदी शामिल होते हैं। हाल ही में मंदिर में एक बार फिर भक्तों की आस्था ने रिकॉर्ड बना दिया। मंदिर के मासिक भंडार की सात चरणों की गिनती शुक्रवार को पूरी हुई। मंदिर में एक महीने में कुल चढ़ावा 41 करोड़ 67 लाख 38 हजार 569 रुपए इकट्ठा हुआ।

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