बंदूक तंत्र से जनतंत्र तक:जल-जंगल-जमीन और अधिकारों की बात तो अब भी करेंगे, लेकिन जरिया संवाद होगा

बंदूक तंत्र से जनतंत्र तक:जल-जंगल-जमीन और अधिकारों की बात तो अब भी करेंगे, लेकिन जरिया संवाद होगा

बस्तर के घने जंगलों और पथरीले रास्तों में दशकों तक गोलियों के बीच रणनीति बनाने वाले हाथों ने अब कलम थाम ली है। 31 मार्च की डेडलाइन के बीच नक्सल आंदोलन का चेहरा रहे दो बड़े पूर्व माओवादी नेता सीसी मेंबर रूपेश और माड़ डिवीजन सचिव रनिता ने दैनिक भास्कर के लिए अपनी बात लिखी है। इसमें उन्होंने आंदोलन की सच्चाई, रणनीतिक विफलता और मुख्यधारा में लौटने के अनुभव साझा किए हैं। रूपेश- लोकतांत्रिक तरीकों से ही स्थायी न्याय और वास्तविक विकास संभव यह आंदोलन समाज में व्याप्त असमानता, ज़मींदारी शोषण, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा आम लोगों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ शुरू हुआ था। बस्तर के जंगलों और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए हमने हथियार उठाए। उस समय हमें लगा कि यही रास्ता न्याय दिला सकता है। कुछ मुद्दों पर सरकारों ने ध्यान भी दिया और नीतियों में बदलाव हुए, लेकिन आंदोलन अपनी दिशा और रणनीति तय करने में पीछे रह गया। समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि कई लक्ष्य व्यावहारिक नहीं थे और उन्हें लागू करने में भी हम सफल नहीं हो सके। हिंसा के इस दौर में आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और स्थानीय युवाओं ने भारी कीमत चुकाई। इस संघर्ष में हमने भी बहुत कुछ खोया। आज भी आदिवासियों, जल-जंगल-जमीन और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। लेकिन अब यह स्पष्ट है कि बंदूक के रास्ते से स्थायी समाधान संभव नहीं है। आने वाले दिनों में हम जैसे सरेंडर कर चुके नक्सली, आदिवासियों के हितों की सुरक्षा, बस्तर के जंगलों के संरक्षण और सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के लिए सरकार से सीधे संवाद करेंगे। हम नीतियों में आवश्यक सुधार के लिए अपनी बात रखेंगे, ताकि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बन सके। हमें विश्वास है कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों से ही बस्तर और आदिवासी समाज के लिए स्थायी न्याय और वास्तविक विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। रूपेश, सेन्ट्रल कमेटी मेंबर (आत्मसमर्पित) रनिता- सशस्त्र संघर्ष टिकाऊ समाधान नहीं देते, इससे नुकसान ही हुआ समाज में मौजूद असमानता और सामाजिक समस्याओं से प्रभावित होकर हमने वैकल्पिक रास्ता चुना। उस समय लगा कि यही संघर्ष न्याय दिला सकता है, लेकिन बाद में समझ आया कि इन मुद्दों का समाधान संवैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यमों से ही अधिक प्रभावी और स्थायी होता है। करीब 28 साल नक्सल आंदोलन में काम करते हुए कई चुनौतियों का सामना किया। संगठन में महिला-पुरुष सभी समान रूप से काम करते थे, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि सशस्त्र संघर्ष टिकाऊ समाधान नहीं है और इससे स्थानीय समुदायों को ही नुकसान हुआ। इस दौरान शीर्ष नेतृत्व से लेकर निचले स्तर तक कई साथियों को खोना पड़ा और गांवों में स्वशासन की अवधारणा भी कमजोर हुई। इन परिस्थितियों में सभी कैडरों ने हिंसात्मक और गैर-कानूनी गतिविधियां छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। 16 अक्टूबर को सरेंडर किया और 17 अक्टूबर को जगदलपुर में पुनर्वास हुआ। अब पांच महीने से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान रायपुर और तेलंगाना के गांवों में जाकर लोगों से संवाद किया। मुख्यधारा में लौटते समय हमने सरकार से कहा था कि अब संविधान के तहत समाज के साथ मिलकर काम करेंगे। आगे भी आदिवासियों के हित, बस्तर के जंगलों की सुरक्षा और सामाजिक समानता के लिए सरकार से संवाद कर नीतिगत सुधार की दिशा में काम करेंगे। रनिता उर्फ सुकमती धुरवा, डीकेएसजेडसी सदस्य व माड़ डिविजन कमेटी सचिव (आत्समर्पित)

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