Iran-US Peace Talks: पाकिस्तान एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आने की कोशिश कर रहा है। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता की खबरें गर्म हैं। (Pakistan) अपनी छवि सुधारने और (USA) के प्रति वफादारी साबित करने के लिए इस मध्यस्थता को ढाल बना रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या (Israel) की अनुपस्थिति में यह बातचीत सफल होगी? जबकि हालिया (War) में ईरान पर हुए हमले अमेरिका और इजराइल की साझा रणनीति का हिस्सा थे। इधर ईरान ने इस्लामाबाद वार्ता में शामिल होने के संकेत दे दिए हैं। क्या बिना (Ceasefire) की ठोस गारंटी के ईरान झुकने को तैयार होगा?
पाकिस्तान की ‘डबल गेम’ कूटनीति (Pakistan Diplomacy)
पाकिस्तान खुद को अमेरिका का बड़ा मददगार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। सूत्रों की मानें तो इस्लामाबाद को वार्ता के लिए एक सुरक्षित ‘वेन्यू’ के रूप में पेश किया जा रहा है। हालांकि, यह वही पाकिस्तान है जिसने ईरान पर हमले की स्थिति में इजराइल को निशाना बनाने की बात कही थी। अब अपनी आर्थिक बदहाली और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच, पाकिस्तान अपनी ‘चमचागिरी’ वाली छवि के साथ अमेरिका को खुश करने में जुटा है।
वार्ता से इजराइल की दूरी: सबसे बड़ा पेच (Israel Absence)
इस पूरी इस्लामाबाद वार्ता में सबसे चौंकाने वाला पहलू इजराइल की गैर-मौजूदगी है। जब अमेरिका और इजराइल ने मिल कर ईरान पर हमला किया था, तो शांति समझौते की मेज से इजराइल का गायब होना कई संदेह पैदा करता है। जानकारों का मानना है कि जिस देश से पाकिस्तान को नफरत है, क्या वह कभी इस्लामाबाद की सरजमीं पर बातचीत के लिए आएगा? यह मुमकिन नहीं लगता, और यही इस शांति प्रक्रिया की सबसे कमजोर कड़ी है।
ईरान का ‘आर-पार’ का संकल्प (Iran War Stance)
दूसरी ओर, ईरान का रुख बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि जब तक वह इस जंग को जीत नहीं लेता, तब तक लड़ाई जारी रहेगी। ईरान इसे केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है। जब ईरान का इरादा जंग खत्म करने का है ही नहीं, तो महज बातचीत की मेजों पर बैठकर सीजफायर की उम्मीद करना बेमानी लगता है।
कैसे मुमकिन होगा सीजफायर ? (Peace Conflict)
असली सवाल यही है कि अगर मुख्य हमलावर (इजराइल) वार्ता में नहीं है और पीड़ित (ईरान) पीछे हटने को तैयार नहीं है, तो पाकिस्तान की यह कोशिश क्या केवल एक दिखावा है? अमेरिका की अंदरूनी राजनीति और पाकिस्तान की मजबूरी ने इस वार्ता को एक ‘पपेट शो’ में तब्दील कर दिया है। बिना किसी ठोस रोडमैप और सभी पक्षों की भागीदारी के, इस्लामाबाद की यह पहल केवल कागजों तक ही सीमित रह सकती है।
पाकिस्तान की छवि सुधारने का प्रयास भर
यह वार्ता शांति की कोशिश कम और पाकिस्तान की ‘इमेज बिल्डिंग’ की कवायद ज्यादा नजर आती है। इजराइल को बाहर रखकर ईरान के साथ किसी भी स्थाई समझौते पर पहुँचना नामुमकिन है। यह कूटनीतिक ड्रामा अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की साख को और भी उलझा सकता है।
चीन और रूस का रुख भी अहम
अब आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका इजराइल को इस वार्ता में शामिल होने के लिए मना पाता है। साथ ही, चीन और रूस का इस ‘इस्लामाबाद समिट’ पर क्या रुख रहता है, क्योंकि ईरान के साथ उनके रणनीतिक संबंध काफी गहरे हैं। एक पहलू यह भी है कि पाकिस्तान इस वार्ता के जरिये अमेरिका से बड़े आर्थिक पैकेज या ‘बैलआउट’ की उम्मीद कर रहा है। वहीं, ईरान इस मौके का इस्तेमाल अपनी सैन्य तैयारियों को और पुख्ता करने के लिए समय जुटाने में कर सकता है।
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क्या पाकिस्तान बनेगा शांति का मसीहा? बिना इजराइल के इस्लामाबाद में शुरू होगी ईरान-यूएस वार्ता
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शांति की मेज या कूटनीतिक खेल? ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की ‘डेंजरस’ मध्यस्थता!


