अलवर में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के नाम पर की गई सरकारी घोषणाएं राजनीतिक दिखावे का दस्तावेज बनकर रह गई हैं। वर्ष 2021-22 और 2022-23 के बजट में जिले में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (पीएचसी) और 20 उप स्वास्थ्य केन्द्र (एसएचसी) खोलने का ऐलान हुआ था, लेकिन इनमें से एक भी स्वास्थ्य केन्द्र नहीं खुला। न तो समय पर बजट जारी हुआ और न ही अधिकतर स्थानों पर जमीन उपलब्ध कराई गई। स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने का दावा कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया। महज एक-दो स्थानों पर ही भूमि आवंटन हुआ है, बाकी प्रस्ताव अब भी फाइलों में बंद है।
यह है स्थिति
गोविन्दगढ़ तहसील के खरसानकी, तेलड़ और रोणपुर, खेरली के घोसाराना, कुतीन शाहबादास व रामपुर पाटन, लक्ष्मणगढ़ के नांगल खानजादी, नारनौल खुर्द, थुमरेला व टोडा नगर, मालाखेड़ा के इंदौक, अहीर का तिबारा, बंदीपुरा, दादर, खेड़ला, रामगढ़ के बेरावास, डाबरी, लालवांडी, नांगल टप्पा व तेहगी का बास में उप स्वास्थ्य केन्द्रों की घोषणाएं आज भी अधूरी हैं। राजगढ़ तहसील के राजोरगढ़ में प्रस्तावित पीएचसी का काम भी अभी शुरू नहीं हो सका है।
सरकारी मानकों को दरकिनार कर लिए फैसले
स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की घोषणाओं में निर्धारित मानकों को भी नजरअंदाज किया गया। नियम कहते हैं कि 5 हजार की आबादी पर उप स्वास्थ्य केन्द्र, 20 से 30 हजार की आबादी पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और 50 से 80 हजार की आबादी पर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र होना चाहिए। घोषणाएं करते समय इन मानकों का पालन नहीं किया गया। योजनाएं जमीनी जरूरतों के बजाय राजनीतिक प्राथमिकताओं के तहत बनाई गईं।
जमीनी हकीकत
जिले में पहले से संचालित स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति भी आदर्श नहीं है। उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक सीएचओ और एक एएनएम की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन कई जगहों पर केवल एएनएम ही पूरे केन्द्र का जिम्मा संभाल रही हैं। इन केन्द्रों पर 14 प्रकार की जांच सुविधाएं देने का नियम है। इसी तरह पीएचसी पर 10 से 15 कर्मचारियों का स्टाफ और सीएचसी पर करीब 50 कर्मचारियों के साथ 50 प्रकार की जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। लेकिन चिकित्सा केन्द्रों पर पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध नहीं है।
ग्रामीणों के लिए सुलभ इलाज का वादा अधूरा
स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना बजट, बिना योजना और बिना आधारभूत तैयारियों के हुई घोषणाएं अब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये घोषणाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगी, या कभी ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की असली पहुंच भी बनेगी? बहरहाल चुनावी घोषणाओं ने ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद जगाई थी, लेकिन जमीनी अमल के अभाव में यह उम्मीद अब निराशा में बदल चुकी है। दूर-दराज के गांवों के लोग आज भी छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं।


