उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जयंती महोत्सव की तैयारी:डुमरांव में बॉलीवुड कलाकार देंगे प्रस्तुति, संगीत कॉलेज भी बनेगा

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जयंती महोत्सव की तैयारी:डुमरांव में बॉलीवुड कलाकार देंगे प्रस्तुति, संगीत कॉलेज भी बनेगा

बक्सर के डुमरांव में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जयंती के अवसर पर “बिस्मिल्लाह खान महोत्सव” की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 21 मार्च 1916 को जन्मे शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को श्रद्धांजलि देने के लिए जिला प्रशासन यह विशेष आयोजन कर रहा है। इसमें बॉलीवुड और स्थानीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। महोत्सव में शबरी ब्रदर्स (जयपुर घराना) और राकेश राज सानू (शहनाई वादन, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान घराना) जैसे कलाकार शामिल होंगे। कार्यक्रम की शुरुआत स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों से होगी, जिसके बाद मुख्य कलाकार मंच संभालेंगे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत को सहेजने का प्रयास यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की संगीत विरासत को सहेजने का एक प्रयास है। प्रशासन का उद्देश्य है कि इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ा जा सके और शहनाई की पारंपरिक धुनें एक बार फिर गूंजें। जिलाधिकारी साहिला ने डुमरांव में “बिस्मिल्लाह खान संगीत कॉलेज” के निर्माण की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि यह संस्थान उस्ताद की स्मृतियों को संरक्षित करने के साथ-साथ युवाओं को संगीत शिक्षा प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म डुमरांव में हुआ था, जहां उनका बचपन का नाम कमरुद्दीन था। उनके पिता पैगंबर बख्श खान एक दरबारी संगीतकार थे, जिनसे उन्हें संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा मिली। महज छह साल की उम्र में वे वाराणसी चले गए, जहां अपने मामा अली बख्श ‘विलायती’ से शहनाई सीखी। काशी के घाटों और मंदिरों में वर्षों तक रियाज करते हुए उन्होंने शहनाई को लोक वाद्य से उठाकर शास्त्रीय संगीत की ऊंचाई पर पहुंचा दिया। काशी विश्वनाथ मंदिर में उनका वादन आध्यात्म और संगीत का अद्भुत संगम बन गया।

जब आज़ादी के दिन गूंजी शहनाई
15 अगस्त 1947—भारत की आज़ादी का ऐतिहासिक दिन। इसी दिन जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने लाल किले से शहनाई बजाकर इस स्वर्णिम क्षण को अमर बना दिया। वह प्रस्तुति आज भी देश की सांस्कृतिक स्मृति में जीवित है।

सम्मान और सादगी की मिसाल
संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 2001 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया। इसके अलावा पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया।
21 अगस्त 2006 को उनके निधन के साथ देश ने एक महान कलाकार ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता के प्रतीक को खो दिया। उन्हें उनकी प्रिय शहनाई के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया—जो उनके संगीत प्रेम की अमर मिसाल है।
विरासत पर सवाल, उम्मीद की किरण
जहां एक ओर महोत्सव और संगीत कॉलेज की घोषणा उम्मीद जगाती है, वहीं स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी भी है कि उस्ताद का पैतृक घर आज भी उपेक्षा का शिकार है। वर्षों से इसकी पहचान और संरक्षण की मांग उठती रही है, लेकिन ठोस पहल अब तक अधूरी है।
फिर भी, डुमरांव में हो रहा यह महोत्सव एक नई शुरुआत का संकेत देता है। शायद यही वह पल है, जब शहनाई की खोती हुई धुन एक बार फिर पूरे शहर में गूंजे—और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहे। बक्सर के डुमरांव में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जयंती के अवसर पर “बिस्मिल्लाह खान महोत्सव” की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 21 मार्च 1916 को जन्मे शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को श्रद्धांजलि देने के लिए जिला प्रशासन यह विशेष आयोजन कर रहा है। इसमें बॉलीवुड और स्थानीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। महोत्सव में शबरी ब्रदर्स (जयपुर घराना) और राकेश राज सानू (शहनाई वादन, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान घराना) जैसे कलाकार शामिल होंगे। कार्यक्रम की शुरुआत स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों से होगी, जिसके बाद मुख्य कलाकार मंच संभालेंगे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत को सहेजने का प्रयास यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की संगीत विरासत को सहेजने का एक प्रयास है। प्रशासन का उद्देश्य है कि इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ा जा सके और शहनाई की पारंपरिक धुनें एक बार फिर गूंजें। जिलाधिकारी साहिला ने डुमरांव में “बिस्मिल्लाह खान संगीत कॉलेज” के निर्माण की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि यह संस्थान उस्ताद की स्मृतियों को संरक्षित करने के साथ-साथ युवाओं को संगीत शिक्षा प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म डुमरांव में हुआ था, जहां उनका बचपन का नाम कमरुद्दीन था। उनके पिता पैगंबर बख्श खान एक दरबारी संगीतकार थे, जिनसे उन्हें संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा मिली। महज छह साल की उम्र में वे वाराणसी चले गए, जहां अपने मामा अली बख्श ‘विलायती’ से शहनाई सीखी। काशी के घाटों और मंदिरों में वर्षों तक रियाज करते हुए उन्होंने शहनाई को लोक वाद्य से उठाकर शास्त्रीय संगीत की ऊंचाई पर पहुंचा दिया। काशी विश्वनाथ मंदिर में उनका वादन आध्यात्म और संगीत का अद्भुत संगम बन गया।

जब आज़ादी के दिन गूंजी शहनाई
15 अगस्त 1947—भारत की आज़ादी का ऐतिहासिक दिन। इसी दिन जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने लाल किले से शहनाई बजाकर इस स्वर्णिम क्षण को अमर बना दिया। वह प्रस्तुति आज भी देश की सांस्कृतिक स्मृति में जीवित है।

सम्मान और सादगी की मिसाल
संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 2001 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया। इसके अलावा पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया।
21 अगस्त 2006 को उनके निधन के साथ देश ने एक महान कलाकार ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता के प्रतीक को खो दिया। उन्हें उनकी प्रिय शहनाई के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया—जो उनके संगीत प्रेम की अमर मिसाल है।
विरासत पर सवाल, उम्मीद की किरण
जहां एक ओर महोत्सव और संगीत कॉलेज की घोषणा उम्मीद जगाती है, वहीं स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी भी है कि उस्ताद का पैतृक घर आज भी उपेक्षा का शिकार है। वर्षों से इसकी पहचान और संरक्षण की मांग उठती रही है, लेकिन ठोस पहल अब तक अधूरी है।
फिर भी, डुमरांव में हो रहा यह महोत्सव एक नई शुरुआत का संकेत देता है। शायद यही वह पल है, जब शहनाई की खोती हुई धुन एक बार फिर पूरे शहर में गूंजे—और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहे।  

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