एमपी कैडर के दो रिटायर्ड अफसरों ने देश-प्रदेश में आरक्षण के चलते बढ़ती जातीय लड़ाई और आपसी अपनापन घटने पर तंज कसा है। पूर्व अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने आत्महत्या की घटनाओं में जाति देखने को लेकर राजनीति करने वालों को घेरा है, तो सचिव स्तर के पूर्व आईएएस राजीव शर्मा ने आरक्षण के नाम पर कमजोर (एससी-एसटी) वर्ग को बढ़ावा देने और सामान्य वर्ग की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं। पूर्व अपर मुख्य सचिव और राज्य निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष मनोज श्रीवास्तव ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि लोग हर बात में जाति-जाति करते हैं, लेकिन विद्यार्थियों की आत्महत्या के देशव्यापी आंकड़ों का जातीय विवरण कभी क्यों जारी नहीं किया गया। उन्होंने पिछले दस वर्षों के आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि कुल विद्यार्थी आत्महत्याएं इस प्रकार हैं। 10 साल में स्टूडेंट्स सुसाइड संख्या (एनसीआरबी डेटा) किसानों से ज्यादा विद्यार्थी कर रहे आत्महत्या मनोज श्रीवास्तव ने लिखा है कि यह पता तो चले कि ये हो क्या रहा है? 2013 से तुलना करें तो इन विद्यार्थियों की आत्महत्याओं में 65% वृद्धि हुई है। नए उपलब्ध NCRB (National Crime Records Bureau) डेटा के अनुसार, छात्रों की आत्महत्याएं, किसानों की तुलना में अधिक हैं। 13,892 के मुक़ाबले 10,786 किसानों ने आत्महत्या की हैं। जिनमें कृषि मजदूर शामिल हैं। श्रीवास्तव ने सवाल उठाते हुए कहा है कि वे किस हृदय के लोग हैं, जिनके लिए एक वर्ग-विशेष के ही विद्यार्थी की जान विशेष महत्त्व की है और दूसरे वर्ग के विद्यार्थी की जान बस खरच होने के लिए ही बनी है? पूर्व आईएएस राजीव शर्मा बोले- 1947 के विभाजन के बाद हमारा विभाजन जारी है दूसरी ओर एमपी कैडर के एक अन्य आईएएस अधिकारी और सचिव पद पर सेवा के दौरान वीआरएस लेने वाले राजीव शर्मा ने आरक्षण पर कटाक्ष करते हुए फेसबुक वॉल पर लिखा है कि 15 अगस्त 1947 तक हम भारतीय थे, उसके बाद विभाजन प्रारम्भ हुआ और हम अनुसूचित जाति और जनजाति में बंट गए। विभाजन बढ़ता गया, हम अगड़े और पिछड़े हो गए, विभाजन रुका नहीं, अब अति पिछड़े ईजाद हुए। सामान्य में आर्थिक पिछड़े यानि निर्धन वर्ग पहचाना गया। विभाजन रुका नहीं, जनजातियों में भी अति पिछड़ी जनजाति अलग की गईं, अब सभी दुःखी हैं। राजीव शर्मा बोले- दौड़ आगे बढ़ने की थी, हम पीछे जाने लगे शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि दर्द बढ़ता गया -ज्यों ज्यों दवा की, हम सवर्ण हुए अवर्ण हुए। अगड़े हुए पिछड़े हुए। दौड़ होनी थी, आगे होने की और हमने चढ़ाई की जगह लुढ़कना चुना। कोई न कोई तो हमेशा पीछे छूटेगा। पांच उंगलियों में भी एक बड़ी है, दो मध्यम हैं, एक सबसे छोटी है और एक थोड़ा मोटी यानि अंगूठा है। घर में कमजोर बच्चा सहज ही ज्यादा लाड़ का हकदार है, पर स्वस्थ बच्चे को पीटने से यह कमजोर सबल नहीं होगा। उन्होंने यह भी लिखा है कि राजनीति का अपना गणित है, पर समाज समरसता के बिना चल नहीं सकता। जनजीवन में आज भी खूब समरसता है। सहजीविता के बिना भारत संभव नहीं। ‘हमें विदेशियों से उतनी घृणा और नाराजगी नहीं, जितने अपने भाइयों से है’ रिटायर्ड आईएएस राजीव शर्मा ने यह भी लिखा है कि ब्रिटिश दुष्टता के गहरे जाल की पकड़ अब पहले से अधिक मजबूत है, पर हमें उन विदेशियों से उतनी घृणा और नाराजगी नहीं, जितनी अपने ही भाइयों से है। समता और न्याय, संवाद और सूझ-बूझ से आधुनिक भारत आगे बढ़ा है और यह बढ़त सभी जातियों, सभी धर्मों, सभी क्षेत्रों, सभी भाषाओं, सभी राजनीतिक दलों, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, उद्यमियों, शासकीय मशीनरी, सरकारों और देश के हर वर्ग के नागरिकों के अथक परिश्रम से ही संभव हुई है। अभी भी कितना रास्ता बाकी है, यह हम सब जानते हैं। आइए, समरसता की ओर बढ़ें।


