इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करते समय हर मामले में सुरक्षा बांड जमा कराने की शर्त आवश्यक नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने कानपुर की अलका सिंघानिया की याचिका पर दिया है।
मामले के तथ्यों के अनुसार कानपुर नगर के जनरलगंज मोहल्ला निवासी शकुंतला देवी का 30 अक्टूबर 2008 को निधन हो गया था। उनकी बेटियां अलका सिंघानिया और शिल्पी अग्रवाल ही उनकी कानूनी उत्तराधिकारी हैं। मृतका के नाम पर रिलायंस इंडस्ट्री के शेयर थे, जिन्हें प्राप्त करने के लिए अलका सिंघानिया ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की मांग में वाद दाखिल किया था।
सिक्योरिटी बांड और पर्सनल बांड को कहा था कानपुर नगर के सिविल जज सीनियर डिवीजन ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति तो दे दी लेकिन साथ ही उतनी ही राशि का सिक्योरिटी बांड और पर्सनल बांड जमा करने की शर्त लगा दी। इस शर्त को चुनौती देते हुए अलका सिंघानिया ने हाईकोर्ट में याचिका की। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 375 के अनुसार सुरक्षा बांड का उद्देश्य संभावित अन्य दावेदारों के हितों की रक्षा करना होता है लेकिन उत्तराधिकारियों में कोई विवाद नहीं है और अन्य दावेदार मौजूद नहीं हैं तथा सभी कानूनी वारिस सहमत हैं तो हर मामले में यांत्रिक रूप से सिक्योरिटी बांड की शर्त उचित नहीं है। कोर्ट ने सिविल जज के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि याची को सिक्योरिटी बांड देने से छूट दी जाती है। केवल पर्सनल बांड के आधार पर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किया जाए।


