जांच में लापरवाही… सिविल कोर्ट ने कहा-क्यों न हाईकोर्ट को बता दें

जांच में लापरवाही… सिविल कोर्ट ने कहा-क्यों न हाईकोर्ट को बता दें

नीट छात्रा की संदिग्ध मौत की जांच में लापरवाही को लेकर शनिवार को कोर्ट ने फिर एसआईटी और सीबीआई को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि जांच में हुई चूक की जानकारी हाईकोर्ट को क्यों न दे दी जाए। साथ ही सीबीआई से पूछा कि पॉक्सो की धाराओं में केस दर्ज क्यों नहीं किया गया। इस पर सीबीआई के पास संतोषजनक जवाब नहीं था। सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि एसआईटी ने अब तक केस से जुड़े सभी साक्ष्य और दस्तावेज उसे नहीं सौंपे हैं। इधर, पीड़िता के परिजनों ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट से कहा कि आपराधिक षड्यंत्र के तहत अभियुक्त को पुलिस बचा रही है और निष्पक्ष जांच नहीं की जा रही है। शनिवार को इस मामले में पटना सिविल कोर्ट में करीब तीन घंटे (सुबह 11:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक) सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस दौरान एसआईटी और सीबीआई के अधिकारियों से पूछताछ की। एसआईटी सदस्य व एसडीपीओ सचिवालय डॉ. अनु कुमारी तथा चित्रगुप्त नगर थाने की तत्कालीन थानेदार और केस की पहली आईओ, निलंबित एसआई रौशनी कुमारी से भी सवाल-जवाब किए गए। कोर्ट ने हॉस्टल संचालक मनीष रंजन की जमानत अर्जी पर भी सुनवाई की, लेकिन शनिवार को जमानत नहीं दी। कोर्ट ने एसआईटी और सीबीआई दोनों को लिखित पक्ष दाखिल करने का निर्देश दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 2 मार्च को होगी। पूरे मामले में जगह-जगह लापरवाही… कुछ उदाहरण 1. मोबाइल फॉरेंसिक जांच में देरी 10 जनवरी को छात्रा का मोबाइल जब्त किया गया, लेकिन 17 जनवरी तक उसे फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। केस डायरी में चित्रगुप्त नगर थाने की पुलिस ने मोबाइल जब्ती का उल्लेख किया है। 10 से 17 जनवरी के बीच मोबाइल को एफएसएल न भेजे जाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट का मानना है कि इस अवधि में डिजिटल साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 17 दिनों से हॉस्टल संचालक जेल में क्यों? कोर्ट ने पूछा कि 15 जनवरी को हॉस्टल संचालक मनीष रंजन को चित्रगुप्त नगर थाने की पुलिस ने जेल भेजा। 17 जनवरी को जांच एसआईटी को सौंप दी गई। 12 फरवरी को सीबीआई ने केस टेकओवर किया। ऐसे में 12 से 28 फरवरी तक मनीष रंजन की न्यायिक हिरासत किस आधार पर बढ़ाई गई? इस सवाल का स्पष्ट जवाब न पटना पुलिस दे सकी, न ही सीबीआई। पटना पुलिस ने कहा कि केस सीबीआई को सौंप दिया गया है, इसलिए अब उसे अभियुक्त की आवश्यकता नहीं है। सीबीआई ने भी कहा कि फिलहाल उसे भी आवश्यकता नहीं है। इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई और पूछा कि फिर जमानत क्यों न दे दी जाए? कोर्ट ने पटना एसएसपी, सीबीआई एसपी और जेल सुपरिटेंडेंट को नोटिस जारी कर पूछा है कि अभियुक्त मनीष के खिलाफ क्या साक्ष्य हैं? जांच अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास चित्रगुप्त नगर की तत्कालीन थानेदार रौशनी कुमारी और एसडीपीओ डॉ. अनु कुमारी के बयानों में भी अंतर सामने आया। रौशनी कुमारी ने कहा कि उनकी टीम ने 17 जनवरी तक जांच कर साक्ष्यों के साथ रिपोर्ट एसआईटी को सौंप दी थी। वहीं डॉ. अनु कुमारी ने कोर्ट को बताया कि छात्रा का मोबाइल उन्हें 24 जनवरी को सौंपा गया। इस विरोधाभास को लेकर भी कोर्ट ने सवाल उठाए। वीडियोग्राफी नहीं कराई गई रौशनी कुमारी ने बताया कि उन्होंने छात्रा के माता-पिता का बयान लिया। कोर्ट ने पूछा कि इसकी वीडियोग्राफी क्यों नहीं कराई गई। उन्होंने यह भी कहा कि हॉस्टल में एक व्यक्ति ने उन्हें नींद की गोली का रैपर दिया था। इस बरामदगी की भी वीडियोग्राफी नहीं कराई गई। जबकि नए आपराधिक कानूनों में बयान और महत्वपूर्ण साक्ष्य की वीडियोग्राफी जरूरी है। जांच में ढिलाई से केस पर असर संभव कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि जांच में हुई देरी और प्रक्रियागत चूक से केस की मजबूती पर असर पड़ सकता है। कोर्ट के कई सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। अब सभी की नजर 2 मार्च की अगली सुनवाई पर है, जब एसआईटी और सीबीआई को अपना लिखित पक्ष रखना होगा। नीट छात्रा की संदिग्ध मौत की जांच में लापरवाही को लेकर शनिवार को कोर्ट ने फिर एसआईटी और सीबीआई को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि जांच में हुई चूक की जानकारी हाईकोर्ट को क्यों न दे दी जाए। साथ ही सीबीआई से पूछा कि पॉक्सो की धाराओं में केस दर्ज क्यों नहीं किया गया। इस पर सीबीआई के पास संतोषजनक जवाब नहीं था। सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि एसआईटी ने अब तक केस से जुड़े सभी साक्ष्य और दस्तावेज उसे नहीं सौंपे हैं। इधर, पीड़िता के परिजनों ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट से कहा कि आपराधिक षड्यंत्र के तहत अभियुक्त को पुलिस बचा रही है और निष्पक्ष जांच नहीं की जा रही है। शनिवार को इस मामले में पटना सिविल कोर्ट में करीब तीन घंटे (सुबह 11:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक) सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस दौरान एसआईटी और सीबीआई के अधिकारियों से पूछताछ की। एसआईटी सदस्य व एसडीपीओ सचिवालय डॉ. अनु कुमारी तथा चित्रगुप्त नगर थाने की तत्कालीन थानेदार और केस की पहली आईओ, निलंबित एसआई रौशनी कुमारी से भी सवाल-जवाब किए गए। कोर्ट ने हॉस्टल संचालक मनीष रंजन की जमानत अर्जी पर भी सुनवाई की, लेकिन शनिवार को जमानत नहीं दी। कोर्ट ने एसआईटी और सीबीआई दोनों को लिखित पक्ष दाखिल करने का निर्देश दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 2 मार्च को होगी। पूरे मामले में जगह-जगह लापरवाही… कुछ उदाहरण 1. मोबाइल फॉरेंसिक जांच में देरी 10 जनवरी को छात्रा का मोबाइल जब्त किया गया, लेकिन 17 जनवरी तक उसे फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। केस डायरी में चित्रगुप्त नगर थाने की पुलिस ने मोबाइल जब्ती का उल्लेख किया है। 10 से 17 जनवरी के बीच मोबाइल को एफएसएल न भेजे जाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट का मानना है कि इस अवधि में डिजिटल साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 17 दिनों से हॉस्टल संचालक जेल में क्यों? कोर्ट ने पूछा कि 15 जनवरी को हॉस्टल संचालक मनीष रंजन को चित्रगुप्त नगर थाने की पुलिस ने जेल भेजा। 17 जनवरी को जांच एसआईटी को सौंप दी गई। 12 फरवरी को सीबीआई ने केस टेकओवर किया। ऐसे में 12 से 28 फरवरी तक मनीष रंजन की न्यायिक हिरासत किस आधार पर बढ़ाई गई? इस सवाल का स्पष्ट जवाब न पटना पुलिस दे सकी, न ही सीबीआई। पटना पुलिस ने कहा कि केस सीबीआई को सौंप दिया गया है, इसलिए अब उसे अभियुक्त की आवश्यकता नहीं है। सीबीआई ने भी कहा कि फिलहाल उसे भी आवश्यकता नहीं है। इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई और पूछा कि फिर जमानत क्यों न दे दी जाए? कोर्ट ने पटना एसएसपी, सीबीआई एसपी और जेल सुपरिटेंडेंट को नोटिस जारी कर पूछा है कि अभियुक्त मनीष के खिलाफ क्या साक्ष्य हैं? जांच अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास चित्रगुप्त नगर की तत्कालीन थानेदार रौशनी कुमारी और एसडीपीओ डॉ. अनु कुमारी के बयानों में भी अंतर सामने आया। रौशनी कुमारी ने कहा कि उनकी टीम ने 17 जनवरी तक जांच कर साक्ष्यों के साथ रिपोर्ट एसआईटी को सौंप दी थी। वहीं डॉ. अनु कुमारी ने कोर्ट को बताया कि छात्रा का मोबाइल उन्हें 24 जनवरी को सौंपा गया। इस विरोधाभास को लेकर भी कोर्ट ने सवाल उठाए। वीडियोग्राफी नहीं कराई गई रौशनी कुमारी ने बताया कि उन्होंने छात्रा के माता-पिता का बयान लिया। कोर्ट ने पूछा कि इसकी वीडियोग्राफी क्यों नहीं कराई गई। उन्होंने यह भी कहा कि हॉस्टल में एक व्यक्ति ने उन्हें नींद की गोली का रैपर दिया था। इस बरामदगी की भी वीडियोग्राफी नहीं कराई गई। जबकि नए आपराधिक कानूनों में बयान और महत्वपूर्ण साक्ष्य की वीडियोग्राफी जरूरी है। जांच में ढिलाई से केस पर असर संभव कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि जांच में हुई देरी और प्रक्रियागत चूक से केस की मजबूती पर असर पड़ सकता है। कोर्ट के कई सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। अब सभी की नजर 2 मार्च की अगली सुनवाई पर है, जब एसआईटी और सीबीआई को अपना लिखित पक्ष रखना होगा।  

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