नक्सल गढ़ से खुशियों का रंग, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में महिलाएं हर्बल गुलाल बनाकर लिख रही आत्मनिर्भरता की नई कहानी

नक्सल गढ़ से खुशियों का रंग, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में महिलाएं हर्बल गुलाल बनाकर लिख रही आत्मनिर्भरता की नई कहानी

राजनांदगांव। प्रदेश का वनांचल क्षेत्र, विशेषकर मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला, जो कभी अपनी भौगोलिक जटिलताओं और नक्सली हिंसा के साये के कारण पूरे देश में सुर्खियों में रहता था, आज विकास और खुशहाली की एक नई इबारत लिख रहा है। जहां कभी खौफ और सन्नाटा पसरा रहता था, आज वहां होली के त्योहार की उमंग महिलाओं के हाथों बने ‘हर्बल गुलाल’ के रूप में बिखर रही है। यह बदलाव केवल रंगों का नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण का प्रतीक है।

जिला प्रशासन और विशेष रूप से जिला पंचायत सीईओ भारती चंद्राकर के मार्गदर्शन में ‘रोशनी महिला ग्राम संगठन’ की 30 जांबाज महिलाओं ने इस परिवर्तन की कमान संभाली है। मोहला ब्लॉक की ये महिलाएं स्थानीय वनोपज और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रसायन-मुक्त गुलाल तैयार कर रही हैं। यह पहल न केवल पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा कर रही है, बल्कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और समृद्धि का संदेश भी दे रही है।

प्रकृति के खजाने से निकलते रंगसामग्री का चयन: स्थानीय जंगलों और खेतों से पलाश के फूल, गुलाब, गेंदा, हल्दी, चुकंदर और पालक की हरी पत्तियां एकत्र की जाती हैं।प्रसंस्करण: इन सामग्रियों को सुखाकर, पीसकर और विशेष विधि से संसाधित कर चटख और सुरक्षित रंग तैयार किए जाते हैं।सुरक्षा: यह गुलाल त्वचा और आंखों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, जिससे लोग अब रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों से बच रहे हैं।

सफलता की कहानी: सबाना खान की जुबानीसंगठन की सक्रिय सदस्य सबाना खान बताती हैं कि वे पिछले तीन वर्षों से इस दिशा में कार्य कर रही हैं। शुरुआत छोटे स्तर से हुई थी, लेकिन शुद्धता और गुणवत्ता के कारण आज यह गुलाल जिले की सीमाओं को लांघकर अन्य जिलों में भी मांग पैदा कर रहा है।आर्थिक प्रगति के आंकड़ेगत वर्ष की उपलब्धि: महिलाओं ने 200 किलो गुलाल बेचकर लगभग 1 लाख 20 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया।

इस वर्ष का लक्ष्य: मांग को देखते हुए इस साल 300 किलो गुलाल उत्पादन और विक्रय का लक्ष्य रखा गया है।सामाजिक और आर्थिक प्रभावयह आय ग्रामीण महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। इस पैसे से महिलाएं अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं, घर की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा कर रही हैं और परिवार में निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त कर रही हैं। जहां कभी बंदूकों की आवाज से ग्रामीण सहम जाते थे, आज वहां महिलाओं के हंसी-ठिठोली और काम की सुखद गूंज सुनाई देती है।

मोहला-मानपुर की यह पहल साबित करती है कि यदि स्थानीय संसाधनों और महिला शक्ति को सही दिशा दी जाए, तो सबसे कठिन परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है। यह मॉडल न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे रहा है, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को भी धरातल पर उतार रहा है। अब नक्सल गढ़ की पहचान खौफ से नहीं, बल्कि रंगों से सजी खुशहाली और आत्मनिर्भरता से हो रही है।

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