ज्योति यादव को एक राजनीतिक असाइनमेंट पर उनकी संस्था की ओर से लखनऊ भेजा गया था। उन्हें मुलायम सिंह यादव पर स्टोरी करनी थी, लेकिन यह हो नहीं पा रही थी। 2022 में यूपी में चुनाव होने थे। इसके मद्देनजर यह अच्छी स्टोरी हो सकती थी। खास कर तब जब उन्हें हाल ही में मुलायम की बीमारी की खबर पता चली थी। लेकिन, मुलायम या अखिलेश से संपर्क की उनकी सारी कोशिशें नाकाम जा रही थीं। वह समाजवादी पार्टी के दफ्तर गईं तो वहां फोन जमा करने के लिए कहा गया। इससे नाराज होकर वह वहां से लौट आईं।
कहानी की तलाश में एक रास्ते पर सफलता नहीं मिलती देख, उन्होंने रास्ता बदल लिया। उस असफल रास्ते पर चलते हुए उन्हें काफी कुछ ऐसा दिखा जिससे यह एहसास हो गया था कि दूसरे रास्ते पर कई ऐसी कहानियां मिल जाएंगी, जो दुनिया को बताना जरूरी है।
एंबुलेंस, सायरन और लाशें
उन्होंने कई एंबुलेंस को लाशें ढोते देखा था। 10 अप्रैल (2021) की रात वह खाना नहीं खा पाईं। सायरन बजाते एंबुलेंस और उनमें लदी लाशें उनकी आंखों के सामने घूम रही थीं। 11 अप्रैल को उनके पास कुछ करने को नहीं था। तय मुलाकातें रद हो चुकी थीं। ऐसे में ज्योति बाहर निकल गईं। वह अपने आसपास जिन्हें भी देख रही थीं सब के चेहरे पर भयानक खौफ दिख रहा था। उन्होंने कोविड मरीजों का आंकड़ा चेक किया। तब उन्हें इस खौफ का कारण समझ में आ गया।
11 अप्रैल को नए मरीजों की संख्या 15,353 आई थी। कुल मरीजों में से 27 फीसदी अकेले लखनऊ में थे। इनकी संख्या 1 अप्रैल को 3912 थी, जो 11 अप्रैल को 20,195 हो गई थी। उसी दिन लखनऊ के डीएम का एक वीडियो भी वायरल हो गया था, जिसमें वह एक अस्पताल के डॉक्टर्स को आईसीयू बेड बढ़ाने और ‘जो कुछ भी कर सकते हैं, करने’ के निर्देश दे रहे थे। तभी ज्योति ने मुलायम की स्टोरी छोड़ कर कोविड की रिपोर्टिंग करने का फैसला कर लिया।
हर दस मिनट पर एक शव
ज्योति बैकुंठ घाट गईं। यह लखनऊ के सबसे बड़े श्मशान घाटों में से एक है। वहां लाशों की कतार लगी थी। लोग अपने परिजन के दाह संस्कार के लिए दस-दस घंटे से इंतजार कर रहे थे। चौबीसों घंटे शव जलाने का सिलसिला चल रहा था। जो अस्पताल में नहीं मरे थे, उन शवों को अलग कतार में रखा गया था। इस कतार में हर दस मिनट पर एक शव आ जाता था। अस्पताल से आने वाले कोविड पॉज़िटिव शवों को अलग रखा गया था।
सुबह के लिए रात में ही चिताओं का इंतजाम
नगर निगम के आयुक्त अजय द्विवेदी को छोड़ कर जिला प्रशासन से बात करने के लिए कोई अफसर उपलब्ध नहीं था। आधिकारिक जानकारी का एक मात्र स्रोत वही थे। ज्योति ने द्विवेदी को फोन किया और मुलाक़ात का अनुरोध किया। उन्होंने अनुरोध मान लिया। यह अपने आप में हिम्मत का काम था। कोई अफसर इस तरह किसी से नहीं मिल रहा था। द्विवेदी गज़ब का जज्बा दिखा रहे थे। उनकी पत्नी गर्भवती थीं। उन्होंने अपने सरकारी क्वार्टर में पत्नी और अपने माता-पिता को अलग कमरे में रख रखा था। खुद ऑफिस में कैंप किए हुए थे।
द्विवेदी ने बताया कि एक दिन में 69 शव दाह संस्कार के लिए आए थे। उन्होंने दो शिफ्ट में किराए के लोगों से काम करवा कर दाह संस्कार करवाया। 13 अप्रैल तक उन्होंने बाहर से लगाए गए कर्मचारियों के द्वारा रात में 50 चिताएं तैयार करवा कर रखीं, ताकि सुबह शवों की लंबी कतार न लगे। लकड़ियां कम पड़ीं तो द्विवेदी ने पड़ोस के सीतापुर जिले से दस ट्रक लकड़ियां मंगवाईं। अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक पांच नए विद्युत शवदाह गृह चालू करने पर काम शुरू हो चुका था।
पैर पर प्लास्टर, फिर भी शव जलाने की मजबूरी
करीब 27-28 साल का नौजवान सुरेश गुलाला श्मशान घाट पर लगातार शव जलाने के काम में लगा था। एक हादसे में उसका पैर टूट गया था, पैर पर प्लास्टर चढ़ा था, फिर भी उसे आराम करने का मौका नहीं था।
ज्योति ने किताब में उस संघर्ष का भी ब्योरा दिया है जो उन्हें श्मशान घाट पर जलाए गए शवों की सही संख्या जानने के लिए करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जो आंकड़े दे रहे थे और राज्य सरकार जो जारी कर रही थी, उनमें अंतर होता था। राज्य सरकार के आंकड़ों में संख्या कम दिखाई जाती थी, जबकि श्मशान घाट की पूरी ज़िम्मेदारी द्विवेदी के ही जिम्मे थी।


