सहारनपुर में कारी इसहाक गोरा का बयान:बोले-तालिबान का कानून इस्लाम नहीं, औरत पर हाथ उठाना दीन की तालीम नहीं

सहारनपुर में कारी इसहाक गोरा का बयान:बोले-तालिबान का कानून इस्लाम नहीं, औरत पर हाथ उठाना दीन की तालीम नहीं

सहारनपुर में जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक और मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने एक वीडियो बयान जारी किया है। जिसमें उन्होंने कहा-तालिबान द्वारा महिलाओं से संबंधित कानून की कड़ी निंदा की है। इस कानून के हवाले से यह दावा किया गया कि पति को पत्नी की ‘गलती’ पर शारीरिक दंड देने की अनुमति है, बशर्ते हड्डी न टूटे। मौलाना गोरा ने इसे न केवल अमानवीय बताया, बल्कि साफ शब्दों में कहा कि ऐसी सोच को मजहब-ए-इस्लाम से जोड़ना सरासर गलत है। कारी इसहाक गोरा ने कहा-इस्लाम रहमत, इंसाफ और इज्जत का दीन है। किसी भी प्रकार की ज्यादती, अपमान या हिंसा को शरीअत की तालीमात का हिस्सा बताना दीन की गलत तशरीह है। मौलाना ने जोर देकर कहा कि घरेलू जीवन में नर्मी, मोहब्बत और रहम का उसूल बुनियादी है। अगर किसी समाज या गिरोह की सोच इस बुनियाद से टकराती है, तो उसे इस्लामी करार नहीं दिया जा सकता। मौलाना गोरा ने याद दिलाया कि इस्लाम में खवातीन का मर्तबा बुलंद है। उन्होंने हदीस-ए-नबवी का हवाला देते हुए कहा कि पैगम्बर मोहम्मद साहब ने औरतों के साथ हुस्ने-सुलूक की ताकीद फरमाई और उन्हें अल्लाह की अमानत बताया। निकाह को रहमत और सुकून का रिश्ता कहा गया है, न कि ताकत और जबरदस्ती का मैदान। उन्होंने कहा कि जो लोग औरत पर हाथ उठाने को दीन का हिस्सा बताने की कोशिश करते हैं, वे इस्लाम की अस्ल रूह से नावाकिफ हैं। अपने बयान में उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस्लाम का नाम लेकर सख्ती और तशद्दुद को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, जबकि इस्लाम की बुनियादी तालीमात इंसाफ, सब्र और रहम पर कायम हैं। अगर कोई समूह बार-बार दीन का हवाला देता है, मगर उसके अमल इस्लामी उसूलों से मेल नहीं खाते, तो मुसलमानों को चाहिए कि वे होशियारी से फर्क करें और दीन को ऐसे रवैयों से अलग रखें। मौलाना ने कहा कि ये अफसोस की बात है कि दुनिया के सामने इस्लाम की तस्वीर कुछ लोगों के अमल की वजह से धुंधली की जाती है। उन्होंने उलेमा और जिम्मेदार लोगों से अपील की कि वे खुलकर ऐसी सोच की मुखालफत करें और समाज को बताएं कि इस्लाम औरत की इज्जत, हक और हिफाजत की तालीम देता है। मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि दीन की सही समझ और सही तालीम ही समाज को इंतिशार से बचा सकती है। इस्लाम को सियासी या गिरोहबंदी के फैसलों से नहीं, बल्कि कुरआन व सुन्नत की रोशनी में समझा जाना चाहिए। उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला उम्मत को हिकमत, इंसाफ और रहमत के रास्ते पर कायम रखें।

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