96.23 लाख की खरीद मामले में HC की अहम टिप्पणी:कहा- जांच एजेंसी की राय से असहमति पर चार्जशीट का आदेश नहीं दे सकती कोर्ट

96.23 लाख की खरीद मामले में HC की अहम टिप्पणी:कहा- जांच एजेंसी की राय से असहमति पर चार्जशीट का आदेश नहीं दे सकती कोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने क्लोजर रिपोर्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि कोर्ट केवल इस आधार पर जांच एजेंसी को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकती कि वह जांच के निष्कर्ष से सहमत नहीं है। जांच पूरी होने के बाद आरोप पत्र दाखिल करना है या क्लोजर रिपोर्ट पेश करनी है, इस संबंध में राय बनाना जांच एजेंसी के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, कानून के तहत सक्षम अदालत के न्यायिक अधिकार बरकरार रहते हैं। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने यह टिप्पणी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर फैसला सुनाते हुए की। याचिका में स्पेशल जज, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम द्वारा 12 फरवरी 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। स्पेशल जज ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार करते हुए आगे की जांच के निर्देश दिए थे। 96.23 लाख की खरीद में अनियमितता का आरोप मामला उज्जैन स्थित औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के तत्कालीन प्राचार्य एस.एम. कुंभारे से जुड़ा था। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ को शिकायत भेजी गई थी। जांच में सामने आया कि कुंभारे के कार्यकाल के दौरान करीब 96.23 लाख रुपए की सामग्री सीमित निविदा प्रक्रिया के जरिए खरीदी गई, जबकि नियमों के मुताबिक इसके लिए खुली निविदा की प्रक्रिया अपनाई जानी थी। जांच में यह भी सामने आया कि लघु उद्योग निगम के लिए आरक्षित सामग्री, जिसमें फर्नीचर भी शामिल था, उसकी खरीद भी सीमित निविदा के जरिए की गई। आरोप था कि तीन फर्मों से प्राप्त कोटेशन एक ही व्यक्ति से संबंधित थे और आपूर्तिकर्ता के साथ कथित मिलीभगत के कारण सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ। मामले में IPC की धारा 420 और 120-बी के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से संबंधित अपराध दर्ज किए गए थे। दो बार खारिज हुई क्लोजर रिपोर्ट जांच पूरी होने के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने सरकार को मामला बंद करने की अनुमति देने की सिफारिश की। जांच एजेंसी का निष्कर्ष था कि सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाए जाने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। हालांकि, क्लोजर रिपोर्ट पहली बार अदालत में पेश होने पर भी मामला बंद नहीं हुआ। 27 अक्टूबर 2021 को स्पेशल जज ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार करते हुए कई बिंदुओं पर साक्ष्य जुटाने और आगे की जांच के निर्देश दिए। इसके बाद दूसरी क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई, जिसे 17 मई 2025 को फिर खारिज कर दिया गया और जांच अधिकारी को आगे की जांच के निर्देश दिए गए। इसके बाद दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका का निपटारा करते हुए स्पेशल जज को सुप्रीम कोर्ट के अबिनंदन झा बनाम दिनेश मिश्रा मामले में दिए गए सिद्धांतों के अनुरूप मामले पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा- क्लोजर रिपोर्ट खारिज होना आरोप साबित होने का प्रमाण नहीं हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित आरोप सिद्ध हो गए हैं। बेंच ने कहा कि अदालत जांच एजेंसी को अपनी पसंद की राय बनाने या अदालत की राय के अनुरूप चार्जशीट दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। जांच के नतीजे के संबंध में राय बनाना जांच एजेंसी के वैधानिक क्षेत्र में आता है। हालांकि, सक्षम अदालत के पास कानून के तहत उपलब्ध न्यायिक अधिकार बने रहते हैं। विभागीय गलती और आपराधिक जिम्मेदारी में अंतर हाई कोर्ट ने विभागीय अनियमितता और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि केवल विभागीय अनियमितता को आपराधिक जिम्मेदारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आपराधिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत होती है और इसके लिए संबंधित व्यक्ति को अपराध से जोड़ने वाली ठोस सामग्री होना जरूरी है। धोखाधड़ी के आरोप पर कहा धारा 420 के आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि लेनदेन की शुरुआत से ही संबंधित व्यक्ति की मंशा धोखाधड़ी या बेईमानी की थी। केवल खरीद प्रक्रिया में अनियमितता या बाद में किसी नियम का पालन नहीं किया जाना अपने आप में धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता। साजिश के आरोप के लिए मिलीभगत का ठोस आधार जरूरी आपराधिक साजिश के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का किसी लेनदेन से जुड़ा होना मात्र पर्याप्त नहीं है। साजिश के लिए ऐसी सामग्री होना जरूरी है, जिससे किसी गैरकानूनी काम को करने या किसी वैध काम को गैरकानूनी तरीके से करने के लिए आपसी सहमति अथवा मिलीभगत का संकेत मिले। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि खरीद प्रक्रिया में विभागीय स्तर पर कोई चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की हो सकती है। केवल इस आधार पर ठेकेदारों या आपूर्तिकर्ताओं पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

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