आदेश दरकिनार, 16वें वित्त आयोग की राशि सिर्फ एसबीआई में रखने पर अड़ा विभाग बिहार के गांवों में विकास काम के लिए 16वें वित्त आयोग से अगले 5 साल में करीब 52 हजार करोड़ रुपए मिलने हैं। यह भारी-भरकम राशि इसी महीने से अगले 5 साल तक अलग-अलग किस्तों में मिलेगी। लेकिन इस पैसे के खर्च को लेकर पंचायती राज विभाग और 2.55 लाख पंचायत प्रतिनिधियों के बीच ठन गई है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय का सीधा नियम है कि इस राशि के लिए सबसे नजदीकी किसी भी सार्वजनिक (सरकारी) बैंक में खाता खोल सकती हैं। इसके बावजूद विभाग केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में ही खाता खोलने का दबाव बना रहा है।
इस फैसले से राज्य की 8053 ग्राम पंचायतों, 8053 ग्राम कचहरियों के साथ-साथ पंचायत समितियों के 11497 और जिला परिषदों के 1162 प्रतिनिधि बेहद नाराज हैं। त्रिस्तरीय पंचायत एवं कचहरी प्रतिनिधि महासंघ ने मुख्यमंत्री और विभाग के सचिव को चिट्ठी भेजी है। महासंघ नेता मिथिलेश राय और आमोद निराला ने इसे मनमाना फरमान बताया है। प्रतिनिधियों की एक सुर में मांग-विभाग पंचायतों के हित में नियम बनाए सवाल: जब 14वें-15वें आयोग का पैसा सभी बैंकों में जमा हुआ, तो अब क्यों नहीं?
महासंघ ने सीधा सवाल उठाया है कि जब पिछले 14वें और 15वें वित्त आयोग का पैसा सभी सरकारी बैंकों में जमा हुआ था, तो इस बार रोक क्यों? केंद्र सरकार का भी साफ आदेश है कि पंचायतें पास के किसी सार्वजनिक बैंक में खाता खोलें। फिर विभाग सिर्फ एसबीआई के पीछे क्यों पड़ा है? क्या किसी को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया जा रहा? समस्या: दूर बैंक होने से रोज के काम अटकेंगे, पुराना खराब अनुभव भी याद
गांवों में एसबीआई की शाखाएं कम हैं। इससे रोज के छोटे खर्च, मजदूरों की मजदूरी और ठेकेदारों का भुगतान अटक जाएगा। पहले 15वें वित्त आयोग के समय एसबीआई में खाता खोला गया था। तब खराब सर्विस और समय पर भुगतान न होने से पंचायत प्रतिनिधियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी थी। दूसरे बैंकों में खाता खोलने की छूट मिली थी। हकीकत: गांवों में ग्रामीण बैंक की 2105 शाखाएं, एसबीआई केवल शहरों-कस्बों तक
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गांवों में अकेले बिहार ग्रामीण बैंक की 2105 शाखाएं हैं। इनके अलावा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की करीब 410, बैंक ऑफ बड़ौदा की 380 और बैंक ऑफ इंडिया की 296 शाखाएं देहाती इलाकों में हैं। वहीं एसबीआई की 1205+ शाखाओं में से ज्यादातर शहरों या ब्लॉक मुख्यालयों में हैं। आदेश दरकिनार, 16वें वित्त आयोग की राशि सिर्फ एसबीआई में रखने पर अड़ा विभाग बिहार के गांवों में विकास काम के लिए 16वें वित्त आयोग से अगले 5 साल में करीब 52 हजार करोड़ रुपए मिलने हैं। यह भारी-भरकम राशि इसी महीने से अगले 5 साल तक अलग-अलग किस्तों में मिलेगी। लेकिन इस पैसे के खर्च को लेकर पंचायती राज विभाग और 2.55 लाख पंचायत प्रतिनिधियों के बीच ठन गई है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय का सीधा नियम है कि इस राशि के लिए सबसे नजदीकी किसी भी सार्वजनिक (सरकारी) बैंक में खाता खोल सकती हैं। इसके बावजूद विभाग केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में ही खाता खोलने का दबाव बना रहा है।
इस फैसले से राज्य की 8053 ग्राम पंचायतों, 8053 ग्राम कचहरियों के साथ-साथ पंचायत समितियों के 11497 और जिला परिषदों के 1162 प्रतिनिधि बेहद नाराज हैं। त्रिस्तरीय पंचायत एवं कचहरी प्रतिनिधि महासंघ ने मुख्यमंत्री और विभाग के सचिव को चिट्ठी भेजी है। महासंघ नेता मिथिलेश राय और आमोद निराला ने इसे मनमाना फरमान बताया है। प्रतिनिधियों की एक सुर में मांग-विभाग पंचायतों के हित में नियम बनाए सवाल: जब 14वें-15वें आयोग का पैसा सभी बैंकों में जमा हुआ, तो अब क्यों नहीं?
महासंघ ने सीधा सवाल उठाया है कि जब पिछले 14वें और 15वें वित्त आयोग का पैसा सभी सरकारी बैंकों में जमा हुआ था, तो इस बार रोक क्यों? केंद्र सरकार का भी साफ आदेश है कि पंचायतें पास के किसी सार्वजनिक बैंक में खाता खोलें। फिर विभाग सिर्फ एसबीआई के पीछे क्यों पड़ा है? क्या किसी को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया जा रहा? समस्या: दूर बैंक होने से रोज के काम अटकेंगे, पुराना खराब अनुभव भी याद
गांवों में एसबीआई की शाखाएं कम हैं। इससे रोज के छोटे खर्च, मजदूरों की मजदूरी और ठेकेदारों का भुगतान अटक जाएगा। पहले 15वें वित्त आयोग के समय एसबीआई में खाता खोला गया था। तब खराब सर्विस और समय पर भुगतान न होने से पंचायत प्रतिनिधियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी थी। दूसरे बैंकों में खाता खोलने की छूट मिली थी। हकीकत: गांवों में ग्रामीण बैंक की 2105 शाखाएं, एसबीआई केवल शहरों-कस्बों तक
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गांवों में अकेले बिहार ग्रामीण बैंक की 2105 शाखाएं हैं। इनके अलावा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की करीब 410, बैंक ऑफ बड़ौदा की 380 और बैंक ऑफ इंडिया की 296 शाखाएं देहाती इलाकों में हैं। वहीं एसबीआई की 1205+ शाखाओं में से ज्यादातर शहरों या ब्लॉक मुख्यालयों में हैं।

