भगवान भोले की पावन एवं पवित्र मणिमहेश यात्रा आधिकारिक रूप से आज से शुरू हो गई है। इसके लिए सोमवार शाम को ही बड़ी संख्या में देशभर से श्रद्धालु भरमौर पहुंच चुके हैं। बिना पंजीकरण किसी को भी श्रद्धालु को यात्रा पर जाने की अनुमति नहीं होगी। भरमौर से मणिमहेश के लिए रोजाना 5000 श्रद्धालु भेजे जाएंगे। हड़सर बेस कैंप में सभी श्रद्धालुओं की मेडिकल जांच की जाएगी। अस्वस्थ पाए जाने पर या 75 वर्ष से अधिक उम्र के अस्वस्थ लोगों को आगे जाने की अनुमति नहीं मिलेगी, क्योंकि यह यात्रा एशिया की कठिन धार्मिक यात्राओं में से एक है। फिटनेस टेस्ट पास करना अनिवार्य समुद्र तल से 13385.83 फीट की ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश यात्रा के लिए श्रद्धालुओं को फिटनेस टेस्ट पास करना अनिवार्य होगा। मणिमहेश पहुंचने के लिए खड़े पहाड़, ग्लेशियर, खतरनाक रास्तों और नालों से होकर गुजरना पड़ता है। यहां पर कई बार ऑक्सीजन की भी कमी हो जाती है। भरमौर प्रशासन ने इस दौरान के दौरान एक हजार पुलिस जवान और होमगार्ड तैनात किए है। इसी तरह 40 से ज्यादा ITBP जवान भी पहली बार तैनात किए गए है। 4 हेली टैक्सी सेवाएं देगी श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हेली टैक्सी सेवा भी शुरू हो गई है। इस बार चार हेली टैक्सी श्रद्धालुओं को मणिमहेश ले जाने व वापस लाने का काम करेगी। इसकी उड़ान मौसम पर निर्भर करेगी। खराब मौसम और धुंध की सूरत में हेली टैक्सी सेवा रोकी जा सकती है। इसी तरह, श्रद्धालु घोड़े व खच्चरों से भी यह यात्रा कर सकेंगे। हालांकि ज्यादातर श्रद्धालु पैदल चलकर इस यात्रा को करते है। यहां बनाए गए कैंप भरमौर प्रशासन ने मणिमहेश यात्रा के लिए भरमौर, हड़सर, धनछो, सुंदरासी और गौरीकुंड में 5 जगह कैंप स्थापित किए है। इन कैंप में मेडिकल टीमें तैनात की गई है। इस यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के खाने-पीने के लिए लंगर और जगह जगह रहने के लिए टैंट की व्यवस्था की गई है। इस यात्रा के लिए हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, जम्मू, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और चंडीगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है। मणिमहेश के कैलाश शिखर में शिव का निवास ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव मणिमहेश के कैलाश शिखर पर निवास करते हैं, जो झील से दिखाई देता है। यह यात्रा हर साल, आमतौर पर अगस्त या सितंबर के महीने में हिंदू त्यौहार जन्माष्टमी के अवसर पर होती है। माना जाता है कि यह यात्रा 9वीं शताब्दी में शुरू हुई थी जब एक स्थानीय राजा, राजा साहिल वर्मन को भगवान शिव के दर्शन हुए थे जिन्होंने मणिमहेश झील पर एक मंदिर स्थापित करने का निर्देश दिया।

